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धरना सत्ता और मुख्यमन्त्री

Posted On: 22 Jan, 2014 Others में

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Madan Mohan saxena

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धरना, सत्ता और मुख्यमन्त्री

दिल्ली की किसी भी सरकार ने केंद्र की किसी भी सरकार के खिलाफ इतनी तीखी लड़ाई कभी नहीं छेड़ी। पहली बार हुआ जब पूरी कैबिनेट ही सड़क पर बैठी और ये भी पहली बार हुआ कि किसी राज्य की पुलिस ने अपने एक मंत्री को प्रदर्शन करने के लिए हिरासत में लिया हो। दिल्‍ली में कड़ाके की सर्दी और बारिश के बीच मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल सड़क पर जमे हुए है और खुले तौर पर ऐलान किया है कि अगर मांगे नहीं मानी गईं तो राजपथ पर जनसैलाब उमड़ेगा। धरने में केजरीवाल का साथ देने उनकी पत्नी सुनीता भी पहुंची है। सुनिता पहली बार केजरीवाल के किसी धरने में शामिल हो रही हैं। इस पूरे मामले में जो सबसे अहम बात है वो ये है कि मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल सत्‍ता पाने से पहले भी सड़क पर थे और सत्‍ता के बाद भी सड़क पर हैं क्‍योंकि राजनीति में अरविंद केजरीवाल का जन्‍म आंदोलन की कोख से हुआ है। अरविंद केजरीवाल ने कल पूरी रात सडक पर सोकर बिताई। आज सुबह जब वो सोकर उठे तो उन्‍होंने कहा कि वह अधिकार की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं बल्कि वह लोगों को पुलिस के अत्याचार से बचाना चाहते है।
यह धरना किसलिए है? उन पुलिसवालों की बर्खास्तगी की मांग करने के लिए जिन्होंने एक मंत्री की ऐसी बात मानने से मना कर दिया, जो कि स्पष्ट रूप से कानून के खिलाफ थी. अगर आज केजरीवाल को यह याद आ रहा है के दिल्ली पुलिस सरकार के नियंत्रण में नही है तो शीला दीक्षित के खिलाफ धरने दे कर और बयान दे कर लोगों को मूर्ख क्यों बना रहे थे। इस धरने से यह भी साबित हो गया कि ” आप” पार्टी कॉंग्रेस, भा .ज.पा और अन्य से कतई अलग नही है. केजरीवाल का मुख्य मकसद आम जनता को सीढ़ी बनाकर सत्ता पाना है. ड्रामेबाजी मे केजरीवाल ने लालू को भी पीछे छोड़ दिया है.केजरीवाल नौसिखिए नहीं हैं। राजनीति में वह बड़े-बड़े दिग्गजों से माहिर साबित होते आए हैं। जब शीला दीक्षित और हर्षवर्धन उनके साथ खड़े होकर बहस करने तक को अपनी तौहीन समझ रहे थे, तब वह उन्हीं के मैदान में उन्हें पटखनी देकर दिल्ली में सरकार बनाने की तैयारी कर रहे थे। हैरत होती थी कि कोई शख्स कैसे इतनी बड़ी दावेदारी कर सकता है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनेगी।आज अगर आम आदमी अपनी आवाज उठा रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ हमारे नेताओं की है। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे नेता आम लोगों की समस्याओं को सुलझाने में फेल रहे हैं। आज मानो क्रांति हो रही है। क्रांति जिसे अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और अलग रास्ते से ही सही, अरविंद केजरीवाल ने हवा दी है। इस क्रांति ने जनता को इज्जत के साथ जीने और गौरवपूर्ण देश के गर्व से भरे नागरिक होने का अहसास कराया।और यह धरना किसलिए है? उन पुलिसवालों की बर्खास्तगी की मांग करने के लिए जिन्होंने एक मंत्री की ऐसी बात मानने से मना कर दिया, जो कि स्पष्ट रूप से कानून के खिलाफ थी। निस्संदेह हम सब अपराध, वेश्यावृत्ति और नशे के व्यापार से मुक्त समाज की इच्छा रखते हैं और पुलिस इन बुराइयों में लिप्त लोगों की मदद करने की जगह (जैसा कि अधिकतर केस में होता है) अगर इनको कम करने में अपनी भूमिका निभाती है,

तो ऐसा करना पुलिस ,समाज और हम सबके लिए सुखद होगा।

अगर कमी कानून में है, तो सत्ता में होने के नाते उस कानून को सुधारने का काम करना चाहियें ताकि वह कानून और प्रभावी तौर पर समस्या का समाधान कर सके, न कि कानून को तोड़ कर । कानून तोड़ना कोई समाधान नहीं है, बल्कि यह समस्या को और बढ़ाएगा ही।और जिन लोगों को केजरीवाल ने अपने साथ न आने को कहा था, उन लोगों के सामने दिए अपने भाषण में उन्होंने पुलिसावालों से आह्वान किया कि वे अपने पुलिस चीफ के खिलाफ विद्रोह करके उनके धरने में शामिल हो जाएं। उनका ऐसा करना न केवल गलत है बल्कि खतरनाक भी है ,समाज के लिए और सत्ता के लिए भी।
पुलिस फोर्स को अनुशासन का प्रतीक माना जाता है, जहां बॉस की इच्छा आदेश होती है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अपने यहां अनुशासन के मामले में पुलिस काफी पिछड़ी हुई है और उस आदर्श परिस्थिति में पहुंचने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, लेकिन पुलिसवालों को अपने अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए उकसाया जाना कहां तक ठीक है? वह भी ऐसे व्यक्ति के द्वारा, जो कि संवैधानिक पद पर बैठा है.अरविंद केजरीवाल का धरना सफल रहा या विफल कहना मुश्किल है। उन्होंने जो हासिल करना चाहा, वही हासिल किया। और उनका मकसद तीन-चार पुलिस अफसरों को हटवाना नहीं हो सकता। उनका गेम प्लान बड़ा था। जब दिल्ली में डैनिश महिला का रेप हुआ तो लोग अरविंद केजरीवाल सरकार की आलोचना करने लगे। निर्भया रेप केस के सड़क पर जमकर विरोध ने आम आदमी पार्टी को मजबूत जमीन दिलाई थी। डैनिश महिला के रेप ने इस जमीन के दरका दिया था। दरार भरने के लिए कुछ बड़ा चाहिए था। और दो दिन के धरने से अरविंद केजरीवाल ने उसी दरार को भरने के लिए मसाला खोज लिया.

अपने इस धरने से उन्होंने कई निशाने एक साथ साधे हैं। सबसे पहले तो डैनिश महिला के रेप को लोग भूल गए। साथ ही, उन्होंने सबको यह बहुत अच्छे से बता दिया कि दिल्ली में कानून-व्यवस्था उनके हाथ में नहीं है। यानी अगली बार जब रेप होगा (और होगा ही, क्योंकि रेप रोकने के लिए कोई कुछ नहीं कर रहा है, केजरीवाल भी नहीं) तो जिम्मेदारी बहुत आसानी से दिल्ली पुलिस के सिर होगी। केजरीवाल ने तो दिखा दिया कि उनके कहने पर तो एक पुलिस अफसर का ट्रांसफर तक नहीं होता। यानी इस ‘कलंक’ से उन्होंने मुक्ति पा ली। उन्होंने लोगों को यह भी दिखा दिया कि वह कुर्सी पर भले ही बैठ गए हों, सड़क को नहीं भूले हैं और जब जरूरत होगी, वह सड़क पर उतर आने, ठिठुरती रात में जमीन पर सोने के लिए तैयार हैं। उन्होंने लोगों तक यह मेसेज पहुंचा दिया कि दिल्ली के पूर्ण राज्य के दर्जे के लिए बीजेपी-कांग्रेस अब तक बस ढकोसला करते आए थे, असली लड़ाई ऐसे लड़ी जाती है।

अपनी जिद से अरविंद केजरीवाल ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए लोकतंत्र और गणतंत्र के मायने राजपथ पर सैनिकों की परेड में नहीं बल्कि बेहद आम आदमी की जरूरतों के लिए लड़ने में है। यानी जब लोग उनकी ‘आंशिक सफलता’ को झेंप बताकर उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं, वह और बड़ी जीत की ओर बढ़ रहे हैं ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगा।

मदन मोहन सक्सेना

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