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मंगल पर मंगल ( भारत का प्रयास)

Posted On: 5 Nov, 2013 Others में

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Madan Mohan saxena

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मंगल पर मंगल ( भारत का प्रयास)

मंगल ग्रह के बारे में जानने की उत्सुकता पूरी दुनिया को है
देश-दुनिया के खगोलविदों के बीच अध्ययन के लिए
यह बेहद रोमांचक विषय रहा है.
अमेरिका और रूस समेत कई यूरोपीय देश
पिछले कुछ दशकों से मंगल ग्रह पर पहुंचने
और वहां इनसान को बसाने की संभावनाओं का पता लगाने में जुटे हुए हैं.
इस अभियान में भारत भी शामिल होना चाहता है.
आज
भारत ने अपने पहले मंगल ग्रह परिक्रमा अभियान (एमओएम) के लिए
ध्रुवीय रॉकेट को आज यहां स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से
सफलतापूर्वक प्रक्षेपित करके इतिहास रच दिया.
चुनिंदा देशों में शामिल होने के प्रयास के लिए
भारत का यह पहला अंतर ग्रहीय अभियान है.
गल ग्रह के बारे में जानने की उत्सुकता पूरी दुनिया को है
देश-दुनिया के खगोलविदों के बीच अध्ययन के लिए
यह बेहद रोमांचक विषय रहा है.
अमेरिका और रूस समेत कई यूरोपीय देश
पिछले कुछ दशकों से मंगल ग्रह पर पहुंचने
और वहां इनसान को बसाने की संभावनाओं का पता लगाने में जुटे हुए हैं.
इस अभियान में भारत भी शामिल होना चाहता है.
उम्मीद की जा रही है कि यह अंतरिक्ष यान
इस ग्रह के दोनों हिस्सों की जानकारी मुहैया करा पाने में सक्षम होगा.
भारत इस मिशन के जरिये दुनिया को
यह संदेश देने के साथ ही यह भरोसा दिलाना चाहता है
कि उसकी तकनीक इस लायक है, जिसके सहारे
मंगल की कक्षा में अंतरिक्ष यान को भेजा जा सकता है.
इसके अलावा, इस मिशन का कार्य
मंगल पर जीवन की संभावनाओं का पता लगाना
इस ग्रह की तस्वीरें खींचना
और वहां के पर्यावरण का अध्ययन करना है.
इस अभियान में
अत्यधिक धन खर्च होने की आशंका जतायी गयी है
जिसके चलते इस अभियान की आलोचना भी की जा रही है
अंतरिक्ष यान के साथ कई प्रकार के प्रयोगों को अंजाम देने के लिए
अनेक उपकरण भी भेजे जा रहे हैं
इन सभी उपकरणों का वजन तकरीबन 15 किलोग्राम है
मंगल की सतह, वायुमंडल और खनिज आदि की जांच के लिए
उपकरण भेजे जा रहे हैं.
यह अंतरिक्ष यान मुख्य रूप से मंगल पर
मीथेन गैस की मौजूदगी बारे में पता लगायेगा.
मीथेन गैस को जीवन की संभावनाओं के लिए
एक अहम कारक माना जाता है.
यह बताया गया है कि लॉन्च होने के बाद
मार्स सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकलने के बाद
करीब 10 महीने तक अंतरिक्ष में घूमता रहेगा.
इस दौरान वह अपने प्रोपल्शन सिस्टम का इस्तेमाल करेगा
और सितंबर, 2014 तक उसके मंगल की कक्षा तक पहुंच जाने की संभावना है.
किन्तु मौलिक चिंता का विषय
ये है कि
भारत में भले ही
हर गांव को पक्की सड़क से जोड़ने की योजना पूरी नहीं हुई हो
लेकिन देश का शीर्ष नेतृत्व और हमारे वैज्ञानिक
मंगल पर इनसान को बसाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं
इतना ही नहीं
देश में करोड़ों की आबादी शौचालय की सुविधा से महरूम हो
तो ऐसे में इस तरह के अभियान पर
अरबों रुपया पानी की तरह बहाना
कुछ हद तक चिंतनीय जरूर लगता है.
कुछ लोगों ने चिंता जतायी है
कि उन्हें यह समझ नहीं आ रहा
कि आखिरकार भारत मंगल मिशन को इतनी तवज्जो क्यों दे रहा है
जबकि देश में आधे से अधिक बच्चे कुपोषण का शिकार हैं
और अब तक देश में आधे से अधिक परिवारों को
सरकार समुचित शौचालय
और स्वच्छ मौलिक सुविधाएं नहीं मुहैया करा पायी है.
इस अभियान के आलोचकों का तो यहां तक मानना है
कि एशिया में अब तक किसी भी देश ने
मंगल अभियान शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटायी
तो भारत क्यों इस दिशा में आगे बढ़ रहा है
इसके जवाब में
इसरो के मुखिया राधाकृष्णन का कहना है
कि मंगल अभियान एक ऐतिहासिक जरूरत है
खासकर जब यहां पानी की खोज की जा चुकी है
तो इस ग्रह पर स्वाभाविक जीवन की संभावनाएं भी तलाशी जा सकती हैं.

प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना

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