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साहित्‍य में वसंत

Posted On: 6 Mar, 2019 Others में

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Madhbendra

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वसंत उत्सव, आनंद और चेतना का ऋतु है। हिंदी साहित्‍य में यह ऋतुराज के रूप में प्रतिष्टित है। धार्मिक, धर्मेतर और विदेशी साहित्‍यों में भी रचनाकारों ने इसे सहज ही स्‍वीकार किया है। वसंत को प्रकृति के सृजन चक्र का ठाम मान सकते हैं, जहां जीवन अपनी जड़ता का त्‍याग करता है। नई कोपलों का प्रस्‍फुटन होता है। प्रकृति का कोना-कोना बसंती हवा से झूम उठता है। केदारनाथ अग्रवाल ने इसे इस रूप में व्‍यक्‍त किया है;
हवा हूं हवा मैं, बसंती हवा हूं…
चढ़ी पेड़ महुआ थपाथप मचाया,
गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा, किया कान में ‘कू’,
उतर के भगी मैं, हरे खेत पहुंची,
वहां गेहुओं में लहर खूब मारी,
पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक,
इसी में रही मैं…’

 

इतिहास में झांके तो वसंत का संभवत: पहला उल्‍लेख कालिकापुराण में मिलता है। शिव के मन में कामविकार पैदा करने के उद्देश्य से देवता काम को शिव के पास भेजना चाहते हैं। इसके लिए कामदेव ने साथी मांगा। तब ब्रह्मा ने वसंत का सृजन किया। इस तरह वसंत के सहज सखा के रूप में काम की उत्पत्ति हुई। वसंतपंचमी को काम के पुनर्जीवन का दिन माना गया है। गुप्‍त अौर गुप्‍तोत्‍तर काल तक में वसंत पंचमी के दिन नृत्य-संगीत और कला की अधिष्ठात्री ,विद्याऒं की देवी सरस्वती के पूजन के साथ प्रारंभ होने वाला मदनोत्सव इसी से जुड़ा है। यह उत्सव फाल्गुनीपूर्णिमा तक चलता था। इस कालखंड में महाराज हर्ष के राजकवि बाणभट्ट ने हर्षचरित और कादंबरी में मदनोत्सव का उल्‍लेख किया है। कामसूत्र में मदनोत्‍सव का नाम सुवसंतक मिलता है। मालविकाग्निमित्रं, दशकुमारचरित और वर्षक्रियाकौमुदी में भी मदनोत्सव वर्णित है। युवतियां आम्रमंजरी लेकर उन्मत्त-नृत्य करती थीं। महाकवि कालिदास ने ऋतुसंहार में वंसत की चर्चा करते हुए लिखा है – वसंते द्विगुने काम:, अर्थात वसंत के समय काम का प्रभाव दोगुना बढ़ जाता है। लोक साहित्‍य में कहा गया है कि वसंत बूढों को भी जवान कर देता है। सल्‍तनत काल में मुख्य रूप से दो कवियों अमीर खुसरो और मलिक मुहम्‍मद जायसी के यहां साहित्‍य वसंत में डूबा हुआ है। जायसी का नागमती विरह वसंत से लिपटा हुआ है। विरह से तृप्‍त नागमती पशु-पक्षी, पेड़-पल्लव से अपना दुख साझा करती है। खुसरो खुद तो वासंतिक हुए ही थे अपने गुरु निजाउद्यीन औलिया को भी इसका अहसास कराया था। तब खानकाहों को भी वसंत के गीत गाए जाते थे। रुसी साहित्‍यकार लियो टॉल्‍सटाय ने करीब-करीब अपनी हर रचना में वसंत का उल्‍लेख किया है, फिर चाहे वह वार एंड पीस हो या अन्‍ना कैरिनिना, क्रूजर सोन्‍नटा और पुनुरुत्‍थान आदि। दुनिया के जिस हिस्‍से में वसंत का अस्तित्‍व है, वहां का साहित्‍य इससे अछूता नहीं है। यहां
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के निबंध ‘वसंत आ गया है’ का उद्धरण वसंत का विस्तार बताता है। “सारी दुनिया में हल्ला हो गया कि वसंत आ गया। पर इन कंबख्तों को खबर ही नहीं… महुआ बदनाम है कि उसे सबके बाद वसंत का अनुभव होता है। पर जामुन कौन अच्छा है। वह तो और भी बाद में फूलता है। और कालिदास का लाडला यह कर्णिकार…? आप जेठ में मौज में आते हैं… मौजी है अमरुद। बारह महीने इसका वसंत ही वसंत है… थोड़ी दूर पर वह पलाश ऐसा फूला है कि ईर्ष्या होती है। मगर उसे किसने बताया कि वसंत आ गया है…? वसंत आता नहीं है, ले आया जाता है. जो चाहे, जब चाहे, अपने पर ले आ सकता है…।

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