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अफसर करते क्या हैं?

Posted On: 3 Jul, 2012 Others में

फंटूशJust another weblog

Madhuresh , Jagran

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मैं कन्फ्यूज्ड हूं। अपनी सहानूभूति का पाला तय नहीं कर पा रहा हूं। मेरे सामने कई तरह के चेहरे हैं। इनको आप भी देखिए, जानिए। ये शिवकरण सिंह हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में बक्सर के डीएम ने इनकी बस जब्त कर ली। 74 दिनों तक इसका इस्तेमाल हुआ। जब्ती के समय कहा गया था कि रोज दिन बारह सौ के हिसाब से किराया मिलेगा। नहीं मिला। बस का उपयोग खगडिय़ा, पटना, सहरसा एवं रोहतास में हुआ। सिंह साहब को किराया पाने के लिए हाईकोर्ट आना पड़ा। कोर्ट के आदेश पर सिर्फ बक्सर जिला प्रशासन ने किराया दिया। उनसे कहा गया कि जिन जिलों में बस का उपयोग हुआ है, वहीं जाकर किराया लीजिए। सिंह साहब फिर कोर्ट आए। कोर्ट ने नोटिस जारी की। जिलाधिकारियों ने इसका जवाब भी नहीं दिया। उनकी कहानी किसी भी आदमी को परेशान कर सकती है। कोई भी उनके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करेगा। मेरे सामने पटना, रोहतास, खगडिय़ा एवं सहरसा के जिलाधिकारी हैं। पटना हाईकोर्ट ने इनका वेतन एवं भत्ता रोक दिया है। मुझे इनसे भी हमदर्दी है। पता नहीं, डेढ़ महीने तक इनका गुजारा कैसे चलेगा? महाजन तगादा करेंगे? बच्चों की स्कूल की फीस कैसे जमा होगी? ऐसा होता है क्या? एक अफसर, आम आदमी जैसा ही जीता है? उसी की तरह प्रताडि़त होता है? इन सवालों पर बात फिर कभी। फिलहाल यह कि डीएम का वेतन-भत्ता रुकना मामूली बात है? मेरी राय में बात वेतन की नहीं है। कोर्ट ने भी कहा है-लोकसेवक करते क्या हैं? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेवा यात्रा का भी कमोबेश यही सवाल है। और यह स्थिति तब है, जबकि यहां लोकसेवा का अधिकार कानून लागू है। बहरहाल, शिवकरण सिंह पहले और आखिरी नहीं हैं। वे व्यवस्था से प्रताडि़त उस आम जमात के प्रतीक हैं, जो कोर्ट को अंतिम आसरा देखता है। दूसरी बात है कि बहुत मायनों में कोर्ट की बात भी नहीं मानी जा रही है। अवमानना के मुकदमों का रिकार्ड है। हर विभाग में मुकदमेबाजी का सेल बना हुआ है। अफसरों के चलते सरकार मुकदमे हार भी रही है। लोकसेवकों से अपनी बुनियादी जरूरतों की अपेक्षा रखने वाली बड़ी आबादी तो कोर्ट जाने लायक ही नहीं हैं। मेरी राय में इस हफ्ते के कुछ संदर्भ इस सवाल को और मजबूती से उभारते हैं कि आखिर अफसर करते क्या हैं? उन्होंने खुद को कोर्ट को नकारने लायक बना लिया है। पटना हाईकोर्ट ने अवमानना के एक मामले में शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को दो जुलाई को हाजिर होने को कहा है। यह मामला डा.भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के कुछ कर्मचारियों की सेवा को नियमित करने से संबंधित है। जब उच्च शिक्षा निदेशक ने कोर्ट की बात नहीं मानी, तो प्रधान सचिव बुलाए गए हैं। मैं इन चेहरों को करीब दो दशक से देख रहा हूं। ये पटना की पब्लिक को पानी पिलाने वाले लोग हैं। हर बार गर्मी में ये कोर्ट के सामने हाथ बांधकर खड़े होते हैं और निकल लेते हैं। बहुत कुछ बड़ा अजीब हो जा रहा है। देखिये-दीपक आनंद, समस्तीपुर के डीडीसी (उपायुक्त) थे। उनके समय में एक अधिवक्ता अनिल कुमार सिंह के साथ हुई बदसलूकी को ले बड़ा बवाल हुआ। वकील आंदोलन पर रहे। कोर्ट के कहने पर दीपक हटाए गए लेकिन उनको प्रमोशन मिल गया। अभी वे बांका के जिलाधिकारी हैं। एक मसला एसी-डीसी बिल का है। सरकार की बदनामी होती रही है। बेशक, इसके जिम्मेदार लोकसेवक हैं। डीसी बिल लंबित रखने वाले निकासी एवं व्ययन अधिकारियों (डीडीओ) के वेतन भुगतान पर रोक लगी हुई है। ये सुधर रहे हैं? इस सजा से कितनों को नसीहत मिल रही है? देशी चिकित्सा के निदेशक को इस महीने के आखिर में हाईकोर्ट में हाजिर होना है। उन्होंने दो वर्ष पहले दिए गए कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया है। यह मामला राय बहादुर टुनकी साह होम्योपैथी मेडिकल कालेज एवं अस्पताल (मुजफ्फरपुर) का है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) गड़बड़ी के दायरे में आ रहा है। अभी शिक्षा विभाग ने जिला शिक्षा अधिकारियों (डीईओ) की बैठक बुलाई थी। ग्यारह अफसर नहीं आए। सिर्फ 15 जिलों से शिक्षकों की रिक्तियों की रिपोर्ट आई है। क्यों? कौन जिम्मेदार है? मैं बिहार लोकसेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग को देख रहा हूं। लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में पूछे गए गलत सवालों का विवाद थमा भी नहीं है कि कर्मचारी चयन आयोग ने भी ऐसी गलती कर दी है। ये क्या हो रहा है? शराब दुकानों की बंदोबस्ती के पहले की निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं की जा रही है। क्यों? मुझे तो सबसे अधिक आश्चर्य डाक्टरों को लेकर है। वे प्रबुद्ध माने जाते हैं। धरती का भगवान कहलाते हैं। अभी उनकी अस्पताल पहुंचने का समय तय हुआ है-सुबह नौ बजे। आखिर इस तल्ख आदेश की जरूरत क्यों पड़ी? और क्या डाक्टर इसे मानेंगे? लोकसेवकों के अजीबोगरीब फैसले हैं, जो कोर्ट के स्तर पर दुरुस्त किए जाते हैं। किसकी काबीलियत कठघरे में है? बिहार विधानसभा के पचहत्तर चतुर्थवर्गीय कर्मियों को पिछले दस महीने से वेतन नहीं मिल रहा है। कोर्ट ने कहा है-दो महीने में वेतन दीजिए। बिहार चैम्बर आफ कामर्स ने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री से वाणिज्य कर अधिकारियों की शिकायत की है। आप भी हो गए न कन्फ्यूज्ड?

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