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देशप्रेम की सजा : सिजोफ्रेनिया?

Posted On: 17 Nov, 2014 Others में

फंटूशJust another weblog

Madhuresh , Jagran

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एक दिन पहले साइंस कॉलेज का सालाना जलसा था। कॉलेज के प्रतिभाशाली विद्यार्थी सम्मानित हुए। पुराने छात्र भी आए थे। पुरानी बातें-यादें, मस्ती …, यानी सबकुछ खुश-खुश। मगर कॉलेज ने अपने उस छात्र को नहीं बुलाया, जिसने दुनिया भर में उसका नाम कराया। क्यों? इसलिए कि यह छात्र पागल हो चुका है। मैं तो कहता हूं कि उसे पागल बना दिया गया। सबने मिलकर ऐसा किया।

मैं, डॉ.वशिष्ठ नारायण सिंह की बात कर रहा हूं। वही वशिष्ठ, जिनका जमाना था। जो गणित में आर्यभट्ट व रामानुजम का विस्तार माने जाने लगे थे। वही वशिष्ठ, जिनके चलते पटना विश्वविद्यालय को अपना कानून बदलना पड़ा था। इस चमकीले तारे के खाक बनने की लम्बी दास्तान है। मेरी राय में डॉ.वशिष्ठ ऐसी तमाम बड़ी बहसों के विषय हैं, जिसका हर स्तर आदमी से उसके वाकई आदमी होने की घोषित परिभाषा छीन लेता है।

खैर, मेरे एक परिचित बता रहे थे कि डॉ.वशिष्ठ अपने साइंस कॉलेज के जलसे में शामिल होना चाहते थे। उन्होंने जलसा की खबर अखबार में पढ़ी थी। बच्चों की तरह मचल गए। उनके एक रिश्तेदार ने कॉलेज प्रबंधन से इसका आग्रह किया। लेकिन पागल को किसी जलसे में बुलाया जाता है भला? पागल, जलसा और इसकी मस्ती यानी सबकुछ चौपट कर दे सकता है। कॉलेज ने दिमाग से काम लिया। डॉ.वशिष्ठ कॉलेज से बस ढाई-तीन किलोमीटर दूर कमरे में बंद से रह गए।

मैं तय नहीं कर पा रहा हूं कि यह क्या है? क्यों है? कौन जिम्मेदार है? जहां तक मैं समझता हूं- डॉ.वशिष्ठ से बस एक गलती हुई। वे देशप्रेम के जज्बे में डूब गए। अमेरिका से सीधे भारत चले आए। और इस देश, समाज ने उन्हें क्या दिया? डॉ.वशिष्ठ यूं ही पागल बन गए? सिस्टम इनके काम आया? मैंने देखा है-सबने उनको अपनी वाहवाही का जरिया बनाया। नेता, अफसर, डॉक्टर …, सबने।

बर्कले यूनिवर्सिटी ने उन्हें जीनियसों का जीनियस कहा था। उन्हें अमेरिका में बस जाने का बड़ा ऑफर था। नहीं माने। भारत आने पर इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (कोलकाता) की सांख्यिकी संस्थान में शिक्षण का कार्य शुरू किया। कहते हैं यही वह वक्त था, जब उनका मानसिक संतुलन बिगड़ा। वे भाई-भतीजावाद वाली कार्य संस्कृति में खुद को फिट नहीं कर पाए। कई और बातें हैं। शोध पत्र की चोरी, पत्नी से खराब रिश्ते …, दिमाग पर बुरा असर पड़ा। फिर सरकार और सिस्टम की बारी आई। नतीजा सामने है। हां, आज भी उनकी अंगुलियां जब-तब ऐसे हिलने लगती हैं मानों वे कोई जोड़-घटाव कर किसी सूत्र को सुलझाने में लगे हैं।

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अपने जीनियस पागल को देखिए, जानिए …

2 अप्रैल 1946 : जन्म

1958 : नेतरहाट की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान

1963 : हायर सेकेंड्री की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान

1964 : पटना विश्वविद्यालय का कानून बदला। बी.एस-सी.आनर्स में सर्वोच्च स्थान।

आठ सितंबर 1965 : बर्कले विश्वविद्यालय में आमंत्रण दाखिला.

1966 : नासा में

1967 : कोलंबिया इंस्टीटï्ïयूट ऑफ मैथेमैटिक्स का निदेशक

1969: द पीस आफ स्पेस थ्योरी विषयक तहलका मचा देने वाला शोध पत्र (पी.एच-डी.) दाखिल।

1971 :भारत वापस

1972-73: आइआइटी कानपुर में प्राध्यापक, टाटा इंस्टीट्ïूयूट आफ फंडामेंटल रिसर्च (ट्रांबे) तथा स्टैटिक्स इंस्टीट्ïयूट के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन।

आठ जुलाई 1973: शादी

जनवरी 1974 : विक्षिप्त, रांची के मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती।

1978: सरकारी इलाज शुरू

जून 1980 : सरकार द्वारा इलाज का पैसा बंद

1982 : डेविड अस्पताल में बंधक

नौ अगस्त 1989: गढ़वारा (खंडवा) स्टेशन से लापता

सात फरवरी 1993 :  डोरीगंज (छपरा) से बरामद

* तब से इलाज रुक-रुक कर होती इलाज की सरकारी नौटंकी

* आजकल : एक सज्जन की कृपा से राजधानी पटना में बसेरा

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