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पंकज को पढ़ते हुए ...

Posted On: 3 Nov, 2014 Others में

फंटूशJust another weblog

Madhuresh , Jagran

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एक बहुत बड़ी बात बड़ी चुपके से गुजार दी गई। यह आदमी की आदत है। आदमी से सिस्टम बनता है। इसलिए यह सिस्टम की भी आदत है।

मैं उस बहादुर पंकज कुमार की बात कर रहा हूं, जो पटना में छठ पूजा के पहले वाले अघ्र्य के दिन सांप-सांप की  एकसाथ ढेर सारी आदमियों की आवाजों को कुछ सेकेंड में न सिर्फ शांत किया, बल्कि सही में दिख रहे जहरीले सांप को हाथ से पकड़कर उसे भीड़ से दूर ले जाकर फेंक दिया। मैं नहीं जानता कि यदि पंकज ऐसा नहीं करता, तो क्या-क्या हो जाता? मगर इतना जरूर जानता हूं कि उसकी बहादुरी ने बड़े हादसे को टाल दिया। दो साल पहले इसी पटना में छठ पूजा के दिन तार-तार की कई इक_ी आवाजों को सुन भीड़ बदहवास हो गई थी और अठारह लोग कुचल कर मर गए थे। तार, यानी बिजली का करंट। अभी रावण वध के ठीक बाद यही तार-तार, यहीं गांधी मैदान के बाहर गूंजा और तैंतीस लोग मर गए। पचास से अधिक घायल हुए। उस दिन महेंद्रू घाट गेट के पास पंकज न होता तो …? भारी भीड़ तो थी। उसके साथ भेडिय़ाधसान वाला भाव भी था। और वाकई सांप दिख भी रहा था। कल्पना सिहरा देती है। कोई भी सिहर जाएगा जी।

पंकज जैसे कितने लोग हैं? कितने ऐसे हैं, जिसको बाकरगंज के नटराज गली का यह शख्स याद है? यह सब जानने के बाद कितनों ने उसको याद किया? किसी ने यह भी जाना क्या कि सांप को भीड़ से दूर करने के दौरान वह घायल हुआ था; सांप ने उसे काट लिया था; अब उसकी स्थिति क्या है? और वे लोग क्या कहलाएंगे, जिनके पास पंकज को इलाज के लिए ले जाया गया था। मैंने खबर पढ़ी कि सांप की जहर से मुक्ति के लिए पंकज के परिजन उसको पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले गए। अस्पताल में दवा नहीं थी। डॉक्टर ने जो दवा लिखी, वह कैंपस में नहीं मिली। गोविंद मित्रा रोड से जब दवा आई, तो डॉक्टर नहीं थे। नर्स से इलाज को कहा गया, तो उसका स्वाभाविक जवाब था- डॉक्टर के बिना इलाज कैसे होगा? यह दशहरा हादसे से नसीहत पाए और हाई अलर्ट पर रखे गए प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल का हाल है। पंकज को निजी नर्सिंग होम में ले जाया गया। बस, हो गया। चार दिन गुजर चुके हैं। दूसरों की हिफाजत में किया गया उसका अपना प्रयास उसके और उसके परिजनों की व्यक्तिगत परेशानी है। अगर उसको कुछ हो जाता तो …?

कुछ दिन पहले एक और जानकारी से वाकिफ हुआ। यह तब की बात है, जब नेताओं की एक टोली यह बता रही थी कि चंद्रगुप्त मौर्य कुशवाहा थे। खैर, जानकारी इस प्रकार थी-26/11 हमले के दौरान शहीद हुए मुंबई एटीएस चीफ हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे ने मरकर भी चार लोगों को जिंदगी दी। कविता की दो किडनी दो लोगों को मिली है। लीवर, तीसरे आदमी को मिला। और आंखें चौथे आदमी को। मेरी राय में पंकज व कविता जैसे लोग इस बदहवास भागती भौतिकवादी संसार में, जहां सबकुछ बेहद व्यक्तिवादी है, प्रतीक हैं। दूसरों के लिए जीना या मरकर भी जिंदा इसी को कहते हैं। बेशक, पंकज या कविता बनना असंभव है। अभी का माहौल इसकी इजाजत नहीं देता। लेकिन इनकी जरूरत तो है। सख्त जरूरत है।

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