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सर जी, अब बस कीजिए

Posted On: 27 Aug, 2014 Others में

फंटूशJust another weblog

Madhuresh , Jagran

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ये हाल की बातें हैं। विधानसभा उपचुनाव के दौरान जनता के कानों में पड़ीं। जुबान, नेता जी की है। गौर फरमाएंगे …
* चारा घोटाला में लालू प्रसाद जेल गए। जेल में एक महिला का शील भंग किया। मेरे पास इसका पुख्ता सबूत है। मैं सिद्ध कर सकता हूं। लालू, नशे में भाषण देते हैं।
-अश्विनी कुमार चौबे (भाजपा सांसद).
* सुशील मोदी नचनिया है। उसको नाक में नथुनी पहन लेना चाहिए। … लागा झुलनी में धक्का बलम कलकत्ता पहुंच गए।
-लालू प्रसाद (राजद सुप्रीमो).
* रामविलास पासवान कुर्सी के लिए राक्षस से भी हाथ मिला सकते हैं।
-संजय सिंह (प्रदेश प्रवक्ता जदयू).
* लालू-नीतीश एक्सपायरी दवा हैं। रिटायर्ड हॉर्स। … मैं मौसम वैज्ञानिक हूं, तो लालू प्रसाद जेल विशेषज्ञ हैं।
-रामविलास पासवान (केंद्रीय मंत्री व लोजपा सुप्रीमो).
* सुशील कुमार मोदी को झूठ बोलने की बीमारी है।
-श्याम रजक (खाद्य आपूर्ति मंत्री).
* छोटा भाई (नीतीश कुमार) गोर (पैर) पर बैठ गया, तो क्या करता? उठाकर फेंक देता? सीने से लगा लिया।
-(लालू प्रसाद, राजद सुप्रीमो).
* लालू-नीतीश दोनों का नाश तय है।
-(शकुनी चौधरी, जदयू नेता).
* हम तो सहने के लिए ही पैदा हुए हैं। कोई इधर से एक लात मार देता है, तो कोई उधर से।
-(जीतन राम मांझी, मुख्यमंत्री).
* नक्सली, भ्रष्ट नेता और अफसरों को मार डालें।
-(पप्पू यादव, राजद सांसद).
(नोट :- बड़ी लम्बी फेहरिस्त है)।
आपको नहीं लगता कि शब्द, मर्यादा खो रहे हैं? आखिर इस जुबान का मतलब क्या है? जरूरत क्या है? यह उतनी मामूली बात नहीं है, जितनी समझी जा रही है। निश्चित रूप से जब तर्क चूकते हैं, मुद्दे गौण पड़ते हैं, तब इसी जुबान की बारी आती है। पब्लिक को अपने हिसाब से नचाने का यह सबसे सहूलियत वाला तरीका है।
पूरी राजनीतिक व्यवस्था, दलीय सिस्टम कठघरे में है। सभी प्रमुख पार्टियों में ऐसे नेताओं की टोली है। चलिए, यह बड़ी लम्बी बहस की बात है।
मेरी राय में आरोप-प्रत्यारोप हिटलर-गोयबल्स तक भी चलेगा। अभी की दौर में एक-दूसरे के लिए ऐसे विशेषण चल सकते हैं। यह भी कबूला जा सकता है, जब नेता डाक्टर बनकर दूसरे नेताओं की बीमारियां बताता है। यह बात भी समझ में आती है कि नेता, कवि बन जाता है। पूसा या फिर इसरो वाला मौसम वैज्ञानिक तो वह होता ही है। नेता, शोधकर्ता है। नेता जैसी जांच अपने देश की सवाचर््च्च जांच सीबीआइ भी नहीं कर सकती है। नेता, दूसरे नेता के घर में इतना अंदर झांक, सुन लेता है कि घर वाले नेता जी भी अपने घर के बारे में इतना नहीं जानते हैं।
बेशक, नेता सर्वगुणसंपन्न होता है। तमाम कलाओं से परिपूर्ण। उसकी अपनी अदा होती है। मगर नेता द्वारा दूसरे नेता को रंगुआ सियार, सांप, छुछुंदर, बंदर, कुत्ता, पागल, सांढ़, बिना पेंदी का लोटा बताना …, वाकई नेता समाज का पथ प्रदर्शक है? अगर ऐसा है, तो वह जनता को क्या सिखा रहा है? क्या माहौल बना रहा है? यह माहौल, आदमी को आदमी रहने देने लायक है? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका अगला चरण क्या होगा? इसलिए सर जी, बहुत हुआ। अब बस कीजिए; बख्श दीजिए। जनता द्वारा दी गई अपनी हैसियत और जिम्मेदारी का ख्याल कीजिए।

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