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स्पोट्र्समैन स्पिरिट=उफ+आह+आउच

Posted On: 6 Feb, 2012 Others में

फंटूशJust another weblog

Madhuresh , Jagran

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मैंने इसी हफ्ते तीन तरह के खेल को बहुत नजदीक से देखा है। एक घर में, दो मैदान में। आपसे शेयर करता हूं। पहले मेरे घर के खेल को देखिये।
मेरा बेटा तीन-चार दिन तक खेल वाली जर्सी और पैंट के लिए बड़ा परेशान था। उसकी फिजिकल एजुकेशन की परीक्षा थी। परीक्षा में दौडऩा भी है-मेरी पत्नी बड़ी परेशान थी। खैर, बेटा परीक्षा दे आया। दौड़ में चौथे स्थान पर आया। मैं खुश हुआ कि चलो, काम्प्लान ने कुछ तो असर दिखाया। आखिर में पता चला कि मेरे बेटे के साथ सिर्फ पांच बच्चे दौड़ रहे थे। मैं मन को समझा रहा हूं-चलेगा। चल ही रहा है। बेटा, अभी तक फास्ट रिलीफ लगा रहा है। 
जहां तक मैं समझता हूं, यही सिचुएशन बिहार पुलिस के उन लोगों की भी है, जो आल इंडिया पुलिस गेम्स के हिस्सेदार थे। मेरे साथ आप इस हफ्ते के इस दूसरे खेल को देखिये। बिहार, अरसे बाद इस राष्ट्रीय आयोजन का हिस्सेदार था। कुल 26 टीमें आयी थीं। चार तरह के खेल थे-वालीबाल, हैंडबाल, बास्केटबाल और कबड्डी। बिहार को एक भी मेडल नहीं मिला। हां, उसने कबड्डी का एक मैच जरूर जीता। बस। मेरी राय में बास्केटबाल को छोड़ दें, तो पुलिस गेम्स के बाकी तीनों खेल ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं और बिहार गांवों का राज्य है। मेरे घर की तरह सबकुछ बड़े आराम से चल रहा है। चलता रहेगा।
अब इस तीसरे खेल को देखिये। मैं, उस दिन मोइनुल हक स्टेडियम में था। क्रिकेट एकेडमी में बच्चों की ट्रेनिंग, उनका खेल, उनके अरमान, उनका जज्बा देख रहा था। यहां का हर बच्चा महेंद्र सिंह धौनी, सचिन तेंदुलकर …, अपना रोल माडल तय किया हुआ है। बहुत दिन बाद बड़ी खुशी हुई। लेकिन एक गंभीर सवाल कचोटा। अब भी कचोट रहा है-आखिर, इनकी जैसी खुशनसीबी कितने बच्चों की है? कितने बच्चे, उनके बाप इस हैसियत में हैं?
मेरी राय में शहर के अधिकांश बच्चे बहुत सारे खेल जानते भी नहीं हैं। कम्प्यूटर, टीवी और कुरकुरे की दौर में ये देशी खेल (पतंगबाजी, गिल्ली-डंडा, कबड्डी, लुका- छिपी …) खारिज हैं। इनकी चर्चा मुनासिब नहीं मानी जाती है। शहर में खेलने के कितने मैदान हैं? क्यों नहीं हैं? बच्चे पेड़ पर चढऩा नहीं जानते हैं। पटना के कितने मुहल्लों में चढऩे लायक पेड़ हैं? बच्चे आखिर क्या करेंगे? दो-तीन कमरों के बंद घर में कार्टून चैनल ही तो देखेंगे। मेरे बेटे की तरह पांच बच्चों के साथ दौड़ेंगे और चौथे स्थान पर आयेंगे। और गांवों में …, बड़ी लंबी दास्तान है।
खेल की चर्चा के क्रम में कुछ पुरानी बातें याद आ रहीं हैं। फरीदाबाद में 44 वीं नेशनल फुटबाल चैंपियनशिप (अंडर-19) खेली जा रही थी। बिहार के खिलाडिय़ों के पास एक जैसा जूता-मोजा नहीं था। ट्रैक सूट पर आफत। संतोष ट्राफी खेलने गए खिलाड़ी तो गेंद (फुटबाल) देखकर आश्चर्य में पड़ गए थे। ऐसे फुटबाल को उनके पैरों ने कभी टच नहीं किया था। हैदराबाद के राष्टï्रीय खेलों में बिहार का सार्वजनिक अपमान हुआ। बिना ट्रैक सूट के खिलाडिय़ों ने मार्चपास्ट में हिस्सा लिया था। और ऐसे में कोई अपने बूते मेडल लेकर आ जाये तो …! साथ में फोटो खिंचवाने और श्रेय लूटने की मारामारी हो जाती है।
बेशक, जज्बा और जुनून अपनी जगह है। मगर सुविधा और ट्रेनिंग भी चीज होती है। और इस मोर्चे पर बिहार …!
यहां तरह-तरह के खेल हैं। एक से बढ़कर एक खिलाड़ी हैं। खेल एसोसिएशन का खेल, बिहार ओलंपिक संघ का खेल, कमीशन का खेल, कागजी खरीद का खेल, टीए-डीए- जर्सी का खेल, कुर्सी का खेल, किट का खेल, खिलाडिय़ों के चयन का खेल, फूड प्वाइजनिंग का खेल, नौकरी का खेल, एसोसिएशन को अपनी ही जेब में रखने का खेल …, कुछ भी छुपा है? इन सब पर नियंत्रण का अपना खेल है। सभी खेल साथ- साथ चल रहे हैं। बिहार भी चल रहा है।
कई खेल संगठन बहुत कुछ पचाने का खेल मजे में खेलते हैं मगर बड़ी सच्चाई यह भी है कि वे न रहें तो प्रदेश में खेल, खेला ही न जाए। हां, ऐसे भी नमूने हैं कि अगर खेल ठीक से खेले जाएं, तो बेजोड़ खेल हो सकते हैं। खिलाडिय़ों के साथ खूब खेल होता है। सी.प्रसाद, गोपाल प्रसाद, राजेंद्र केवट-इनसे कौन खेलता रहा है?
कुछ दिन पहले राज्य खेल प्राधिकरण का खेल सड़कों पर था। डीजी (महानिदेशक),सरकार से लड़ गये। यह तय करने में बड़ा खेल चला कि डीजी और डायरेक्टर में आखिर कौन अधिक पावरफुल है?
इस खेल को भी देखिये। 1995 से एक भी खिलाड़ी को पुलिस में नौकरी नहीं मिली। सिपाहियों को खिलाड़ी बनाया गया। अब जाकर खिलाडिय़ों को नौकरी मिलनी शुरू हुई है।
हां, अपने यहां पालिटिक्स सबसे बड़ा खेल है। यह स्पिरिट का बेजोड़ गेम है। गोल के शार्टकट तरीके हैं। जनता को पटाने के कई- कई खेल हैं। जाति का खेल, सपने- वायदों का खेल, झूठ का खेल, विकास का खेल …, जमकर फाउल खेलिए। इसमें लंगड़ीमारी पर कार्ड नहीं दिखाया जाता है। यह तो योग्यता है। भूख-गरीबी, जलालत, शिलान्यास, घोषणाओं का भी खेल खेला जा रहा है। तो क्या मान लिया जाये कि बिहार में खेल के मोर्चे पर स्पोट्र्समैन स्पिरिट का मतलब उफ, आह, आउच ही है?

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