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सनातन एवं धर्म

Posted On: 7 Jun, 2018 Spiritual में

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रजनीश मैत्रेय

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दुर्भाग्य से तुमने धर्म के कुछ और ही अर्थ ले रखे हैं। तुम वाद को धर्म समझ बैठे हो। तुम्हारे सारे धर्म हिन्दू, ईसाई, इस्लाम, जैन सभी एक वाद से अधिक कुछ भी नहीं। तुमने कुछ निश्चित मान्यताओं को धर्म की संज्ञा दे रखी है। तुम्हारे सभी धर्म एक निर्दिष्ट मान्यता में बंधे हैं। वे दावा करते है मोह माया से मुक्ति का। लेकिन उन्होंने स्वयं धर्म का मायाजाल फैला रखा है। तुम इस तरह बंध चुके हो कि अपने दीवारों के बाहर झांकने में भी पापबोध महसूस करते हो। तुम्हारा बोध ही खो चुका है कि इन दीवारों के बाहर भी धर्म फैला हुआ है।

 

 

तुम्हारा ये कैसा धर्म है जो तुम्हे भय से मुक्त करने की बजाय पाप का भय दिखा रहा है। ये कैसे धर्म हैं जो मुक्त करने के बजाय तुम्हे और भी सशक्त बंधन में बांधे जा रहे हैं। समाज और परिवार के बंधन शायद तुम तोड़ भी लो। धर्म के बंधन तोड़ने का तुम साहस भी नहीं कर पाते। अगर हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई धर्म हैं तो अब धरती से धर्म को विदा करने का समय आ गया है। अब धरती पर इन धर्मो के बने रहने का कोई प्रयोजन नहीं। दुनिया फैल चुकी है। पृथ्वी पर भाषा, देश, संस्कृति की वर्जनाएं टूट रही हैं। तुम अब भी अपने धर्म लिए बैठे हों। इन्हें भी फैलाओ। मिल जाने दो। एक हो जाने दो। लेकिन ये तुम तभी कर सकते हो जब तुमने धर्म का असली अर्थ जाना हो। तुम हिन्दू घर मे पैदा हुए तो गीता रामायण तुम्हारा धर्म हो गयी। तुम मुसलमान घर मे पैदा हुए तो कुरान तुम्हारा धर्म हो गयी। यही तुम्हारी धर्म की समझ है।

 

धर्म तो जीवंतता का नाम है, चैतन्यता का नाम है। धर्म वो प्राण है जो जिसमे ब्रम्हाण्ड गुथा हुआ है। और वो एक ही है। सनातन है। वो हिन्दू या इस्लाम नहीं है। वही धर्म है, वही सत्य है, वही प्रेम है, वही भगवान है। उसे ही बाइबिल में गॉड कहा गया है, उसे ही कुरान में अल्लाह कहा गया है, उसे ही इस देश में परमात्मा कहा गया है।

 

आज जो हिन्दू धर्म के रक्षक हैं वे वास्तव में अपनी सनातन धार्मिकता को नष्ट कर रहे हैं। वे अनजान है क्योंकि उन्हें धर्म का कोई अनुभव नहीं। इस्लाम और ईसाइयत के विरोध में वे गलती से हिंदुत्व को भी धर्म समझ बैठे हैं। हिंदुत्व शब्द अपने आप मे एक मिथ है। एक भ्रम है। हिंदुत्व जैसी कोई चीज नहीं। इस धरती का धर्म भी हिन्दू नहीं। इस धरती का धर्म सनातन है। जिसका कोई नाम नहीं। यहां धर्म एक बहती नदी के समान रहा है। जिसमे सदैव ऋषि, मुनि, मनीषी, प्रबुद्ध और ज्ञानी अपने अपने तप और ज्ञान की धारा मिलाते रहे। और ये धारा अविरल बनी रही। वे धर्म पर चिंतन, मनन करते थे। अनुभव पर प्रयोग करते थे। लेकिन आज तुमने प्रश्नों को नास्तिकता का नाम दे दिया।

 

धार्मिकता बहने का नाम है और जिसे तुम धर्म कहते हो वो रुक गयी है। तालाब बन गयी है। नदी बहती रहती है तो ही शुद्ध रहती है। बहती है तभी जीवित है। बहती है तभी सागर से मिलती है। निर्वाण होता है। जो लोग आज हिंदुत्व, ईसाइयत या इस्लामियत की रक्षा कर रहे हैं, जो अपने धर्म मे अब नया कुछ सोचने, विचारने, बोलने सुनने को राजी नहीं। वे धर्म की हत्या में लगे हैं। यदि तुम्हारे धर्म मे कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता तो तुम्हारा धर्म मृत हो चुका है। यदि तुम्हारे धर्म मे बीता समय श्रेष्ठ था तो अब वह समय जा चुका है और उत्थान का कोई उपाय नहीं है। फिर तो मनुष्य के लिए सारे रास्ते ही बंद हो जाते हैं।

 

बुध्द ने धर्म को कोई नाम नहीं दिया। उसे मात्र “धम्म” कहा। धम्म अर्थात धर्म। लेकिन बुद्ध के जाने के बाद वह भी बौद्ध धर्म हो गया। इस पृथ्वी पर एक ही धर्म है। उसे कोई भी नाम दो। बौद्ध, इस्लाम या हिन्दू ये तो उनका धर्म था जिन्होंने वास्तविक धर्म का अनुभव किया। तुम्हे धर्म चाहिए तो अपना धर्म ढूंढो। उसका अनुभव करो। जो तुम्हारा अनुभव होगा। वही तुम्हारा धर्म होगा।

 

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