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आपदाओं के भंवर में फंसती मानवता

Posted On: 12 Oct, 2017 Others में

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mangalveena

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मानवता के हत्यारों में एक और नाम स्टीफन पैडक जुड़ गया। अमेरिका के लॉस वेगास शहर में संगीत कॉन्सर्ट देख रहे आम जन समूह पर इस क्रूर हैवान ने पास के एक होटल के बत्तीसवें तल पर स्थित कमरे से चंद मिनटों में इतनी गोलियाँ बरसाई कि पचास के आसपास लोगों की जानें गई और कई सौ लोग गंभीर रूप से घायल हुए।


humanity


इस भयावह मास शूटिंग की घटना को सदियों तक भूला नहीं जा सकेगा। घटना के बाद रस्मी तौर पर हम तथाकथित सभ्य लोग मृतकों की आत्मा की शान्ति के लिए पूर्व की भाँति प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं, परन्तु भविष्य में ऐसी कृतिम आपदाएँ कहर न ढायें, इसके लिए न तो हम मतैक्य से सुदृढ़ व्यवस्था बनायेंगे, न अपराध बोध के लिए प्रभु से क्षमा माँगेगे। न ही मानवता को सन्मति देने के लिए महात्मा गाँधी की भाँति नियमित समूह प्रार्थना करेंगे।


यह दुखद, किन्तु सत्य है कि तकनीक के वर्तमान दौर में कृत्रिम या मानव निर्मित आपदाएँ धरती के हर हिस्से में प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में ज्यादा भयावह और दिल दहलाने वाली कहर ढा रही हैं। मजबूर एवँ असहाय मानवता, जब, और जहाँ, कृत्रिम आपदाओं से हत हो रही है, पीड़ित लोग अश्रु भरे आँखों से एक ही प्रश्न पूछते हैं कि उनकी गलती क्या थी ?


उत्तर सभी को पता है, परन्तु निदान के नाम पर सारे राष्ट्र व सारी संस्थाएँ अंधकार में लाठी पीटने जैसा स्वाँग कर रही हैं। अधिक क्या कहा जाय, अमेरिका जैसा संपन्न एवं शक्तिशाली राष्ट्र भी ऐसी कृत्रिम आपदाओं को रोकने में दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखा पा रहा है। इस धरती पर बसने वाली सम्पूर्ण मानवता न जाने किस दिन की प्रतीक्षा कर रही है।


वैसे तो प्राकृतिक आपदाओं जैसे अतिवृष्टि, जलप्रलय, बादलों का फटना, भूकंप, ज्वालामुखी, समुद्री या चक्रवाती तूफान इत्यादि को मनुष्य अपने उद्भव काल से आज तक अनवरत झेलता आ रहा है और ये आपदाएँ वैसी ही भयावह और विनाशकारी बनी हुई हैं। फिर भी इन्हें हम इस लिए झेल जाते हैं, क्योंकि ये प्रकृति प्रदत्त हैं, जिन पर मनुष्य का दैव-दैव कहने के सिवा कोई वश नहीं है।


दूजे इन आपदाओं से निपटने में सारी मानवता सामंजस्य बिठाकर एक साथ खड़ी हो जाती है और तीजे सभ्यता एवं वैज्ञानिक प्रगति के साथ मनुष्य ने इनके प्रभाव को कमतर करने में दक्षता भी प्राप्त कर ली है। परन्तु इनसे भी विनाशकारी आपदाओं का कहर आदमी, आदमी पर, बार -बार और लगातार ढा रहा है, जिसके लिए न हम दैव-दैव कर सकते हैं न प्रकृति को कोस सकते हैं।


सुरक्षा या संहार के नाम पर मानव निर्मित एटमी हथियार आज दुनिया में किसी भी प्राकृतिक आपदा से ज्यादा प्रलयंकरी आपदा हैं। सबसे बड़ा डर है कि कहीं मानव निर्मित नाभिकीय आपदाएँ कभी इस प्यारी धरती को पूर्णरूपेण मानव विहीन न कर दें। वस्तुतः इतिहास प्रमाण है कि जहाँ कहीं कृत्रिम आपदाओं से नरसंहार हुए हैं या हो रहे हैं, उनके पीछे विचारधारा या सत्तात्मक वर्चस्व, धार्मिक या नस्‍लीय द्वेष, लापरवाही या संवेदन शून्यता जैसे मूल कारण ही पाए गए हैं।


वर्तमान समय में इस विश्व व्यापिनी आपदा ने पूरी एशिया और विशेषतया भारत को अपने ताण्डव की रंगभूमि बना डाली है। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़, सूखा, शहरों में जल प्रलय, समुद्री तूफान इत्यादि से तो हम दो चार तो होते ही रहते हैं, परन्तु कृत्रिम आपदाएं तो पूरे देश को निरन्तर रुला रही हैं। राजनीति से निर्मित आपदा का ज्वलंत उदहारण सन उन्नीस सौ सैतालिस में हुआ भारत का विभाजन है, जिसने लाखों लोगों की जाने ले ली और करोड़ों लोगों को जन्मभूमि छोड़ने व बेघर होने को विवश किया।


पीढ़ियाँ उस आपदा के दंश से अब भी पीड़ित हैं। उसी आपदा के पार्श्व प्रभाव में आए दिन पश्चिमी सीमा पर आज भी गोलीबारी से वहाँ के निवासियों व सीमा प्रहरियों की जानें जा रही हैं। धार्मिक कट्टरवाद व देश विघटन के लिए प्रायोजित आतंकवाद या नक्सलवाद जैसी जघन्य और अमानवीय आपदाएँ मानव निर्मित ही तो हैं। धार्मिक आपदाओं का तो कहना क्या।


स्नान, दर्शन और प्रवचन श्रवण के लिए भीड़, अव्यवस्था फिर भगदड़ और अनगिनत मौतें, इस देश में प्रायः सुनाई देती हैं। मानवीय लापरवाही के चलते अस्पताल, रेल, बस-कार व अन्य सड़क दुर्घटनाओं द्वारा प्रति वर्ष कई हजार लोग काल कवलित हो रहे हैं। जाँच होती रहती है, सीख़ लेने और भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति न होने देने की बात भी होती है, परन्तु ये आपदाएं हैं कि मानती नहीं और यत्र-तत्र सर्वत्र कहर बरपाती ही रहती हैं।


इस समाज में कहीं भी किसी बेटी या बहन का किसी दरिन्दे द्वारा बलात्कार हो जाना, उस पीड़ित परिवार के लिए सबसे दुसह आपदा है। और तो और जिस देश में गौतम और महात्मा जैसे महामानवों ने अहिंसा का सीख दिया हो, उस देश में हिंसक प्रवृत्ति का बढ़ना किस आपदा से कमतर है।


इन सारी आपदाओं के बीच मानव सभ्यता के पास कुछ ऐसी संजीवनी विशेष तो है कि परिस्थितियों से जूझते और उन पर विजय पाते हुए वह सभ्यतर होती रही है। यह संजीवनी ही परिणामी रूप में व्यवस्था है, जिसे सदैव हर रचनात्मक या विध्वंसक उपलब्धि से ज्यादा सक्षम और चुस्त-दुरुस्त बनाना होगा, ताकि व‍िपरीत परिस्थितियों में मानव निर्मित आपदाओं को घटने की स्थिति ही न आने दे।


इस समूची धरती पर मनुष्य के लिए मनुष्य के प्रति प्रेम, सहकार तथा सहयोग से ऐसी व्यवस्था साकार हो सकती है। यह ठीक है कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना में अभी हम वाँछित सफलता नहीं पाए हैं। फिर भी प्रयास जारी रहना चाहिए, क्योंकि प्रयासी कभी असफल नहीं होते। ऐसे ही राह पर आई कैन नामक संस्था, धरती को नाभिकीय आयुधों से मुक्त करने के लिए,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयासरत है।


वर्ष 2017 के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार इंटरनेशनल कम्पेन फॉर अबॉलिशन ऑफ़ न्यूक्लियर वेपन (ICAN) को देकर नोबेल समिति ने इस प्रयास पथ पर मुहर लगा दिया है। अतः उसे साधुवाद और सराहना मिलनी ही चाहिए। ऐसे ही समन्वित प्रयास से उपजी व्यवस्था हमें आपदाओं के भँवर से सदैव बाहर निकालती रहेगी और बेहतरी की यात्रा आगे बढ़ेगी। अनादि काल से न जिंदगी कभी थमी है, न कभी थमेगी, क्योंकि यह धरती परमेश्वर और प्रकृति की अनूठी कृति है।

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