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श्रवणकुमारों ,तुम्हें नमन

Posted On: 14 May, 2018 Others में

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mangalveena

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बीते मदर्स डे के समापन पर करोड़ों भाइयों ,बहनों और बच्चों , जिनके पास माँ हैं ,को यह सौभाग्य बने रहने की शुभ कामनाएँ तथा हजारों भाई बहनों को कोटिशः नमन जो अपने माँ और बाप के लिए तीन सौ पैंसठ दिन श्रवणकुमार की भूमिका में हैं। हमने मात्र हजारों का अंकन इस लिए किया क्योंकि ऐसे देव एवँ देवी तुल्य लोग इस धरा पर दुर्लभ होते जा रहे हैं। पिछले दिनों व्हाट्सअप तथा फेसबुक पर मदर्स डे के उपलक्ष्य पर सैकड़ों सन्देश मिले।टीवी और समाचार पत्रों ने भी अपनी पहुँच तक सबको व्यापारिक मातृभावना से ओतप्रोत कर दिया। ऐसा लगा कि सतयुग ने भारत भूमि पर दस्तक दे दिया है। पर जब भ्रम से उबरे तथा इनमें से कुछ लोगों के पारिवारिक पटल पर विहंगम दृष्टि डाला तो बड़ी निराशा हाथ आई।काहे के माँ -बाप ;काहे का उत्सव। अपने परिवार के लिए अहर्निश जूझती अधिकांश माताअों को तो इस उत्सव की भनक तक नहीं।यदि भनक है भी इसका उनसे कोई सम्बन्ध नहीं। उनकी पीड़ा तो उनके अंतर्मन में यथावत ही दबी हैं।ऐसे में मदर्स डे पर युग द्रष्टा गोस्वामी जी को भी श्रद्धा सुमन अर्पित करना ही चाहिए जिन्होंने हमारे आचरण का पूर्वानुमान यूँ किया।

—–सुत मानहि मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं ।

—–ससुरारि पिआरि लगी जब तें । रिपु रूप कुटुम्ब भए तब तें । रामचरितमानस

अंततः विदेश की वह संस्कृति भी वधाई की अधिकारिणी है जिसने माँ के लिए तीन सौ पैंसठ दिनों में कम से कम एक दिन आरक्षित तो किया।अच्छा होता कि मदर्स डे के स्थान पर हर दिन कुछ घण्टों के लिए मदर्स आवर होता।थोड़ी देर केलिए नित्य इनके मुखारविंद पर मृदुल मुस्कान होती और हमारे लिए आशीष वर्षा। मानवता साक्षात् दर्शन पाती कि इस धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वह माँ के आँचल तले।

काश ऐसा होता। फिर भी जो है उस बीच, हमारी  सबसे  विनम्र विनती है कि शेष तीन सौ चौंसठ दिनों के लिए माताओं को उनके  नियति , सामाजिक परिस्थियों एवँ जिह्वा सेवादारों पर न छोड़ें क्योंकि हमारे अस्तित्व की कर्ता और कारण वहीँ हैं।माँ तुम्हें नमन। इस अवसर पर अपनी स्वर्गीय माता श्री को भी श्रद्धानत  निर्मल स्मृति गुच्छ अर्पित करता हूँ।

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