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जिंदगी यहां जंग से कहीं ज्यादा है - दिल्ली का हाल

Posted On: 1 Apr, 2010 Others में

चिठ्ठाकारीNew vision of life with new eyes

Manoj

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कहते है जिंदगी एक जंग है अगर आपको विश्वास न हो तो दिल्ली के जीवन का हाल देख लें . दिल्ली यों तो कहने को महानगर है, भारत की राजधानी है, भारत का दिल है , राजनीति का गढ़ है , यहां सभी राजनेता रहते हैं पर शायद यह सब तब झूठा लगे जब आप दिल्ली की सडकों पर निकलें.

बडे-बडे गढ्ढे, लंबे जाम, चारो तरफ अशांति का माहौल, प्रदूषण का चारो तरफ फैलाव, बसों में कंडक्टर की गालियां तो लोकल ट्रेन का गुम होता समय, कुछ ऐसा होता है दिल्ली की सडकों का माहौल.

चारो तरफ खुदाई कहीं स्टेडियम के लिए तो कही मैट्रो के लिए. भला हो बीएसएनएल का जो उन्होंने जमीन की खुदाई बंद कर रखी है, वरना बची-खुची जमीन पर भी होती खुदाई. जगह-जगह मैट्रो का चलता काम और उसकी वजह से नीचे गुजरते लोगों का डर के चलना, कदम कदम आगे देखना की कहीं कोई मैनहॉल या गटर खुला तो नहीं, मानवता की शून्यता ऐसी कि अगर कोई व्यक्ति घायल हो तो लोग उसकी मदद करने से पहले पचास बार सोचते हैं. दया तो तब आती है जब हम भूल जाते हैं कि जो हम दूसरों के साथ करते हैं वही हमारे साथ भी हो सकता है.

सरकार से लेकर जनता तक सब जिम्मेदार हैं इस दिल्ली की दुर्दशा के लिए. सरकार कहने को तो कहती है कि आज की परेशानी कल की खुशियां लेकर आएगी. मैं पूछता हूं जब हमें यह यकीन ही नहीं कि कल क्या होगा तो कल के भरोसे क्यों रहें ?

दिल्ली का दर्द काश यही खत्म हो जाता तो रोना नहीं था.

दिल्ली की सबसे बड़ी और पुरानी कहानी है लंबी लाइनें और फाइलों की सुस्त चाल. सुबह उठकर दूध की लाइन में लगो, फिर बस में कंडक्टर से टिकट लेने के लिए अपने नंबर का इंतजार करो, उतरने के लिए भी लाइन में लगो. यही नहीं कभी-कभी तो पानी के लिए भी लाइन लगती है. मानो महानगर नहीं लाइननगर है दिल्ली. सरकारी ऑफिसों की फाइल अगर कही सबसे चर्चित है तो दिल्ली की. खैर आजकल इसका हाल थोडा सही है.

यह तो हर  शहर की कहानी है मगर मेरा असल मुद्दा है दिल्ली में होते निर्माण कार्य से होने वाली दुर्घटनाएं और बदसूरत होती दिल्ली.

मैट्रो कहें तो आने वाले समय में इससे दिल्लीवासियों की जिंदगी बदल जाएंगी और सही भी कह रहे हैं सब जिंदगी बदलेगी ही. जब रोजाना लेट पहुचने की वजह से नौकरी से निकाले जाएंगे तब जिंदगी बदलना तो वाजिब ही है, किसी को इस निर्माण कार्य की वजह से अपनी जान गवांनी पड़ी तो उसके परिवार की जिंदगी बदलेगी ही.

आज तक कई बच्चे दिल्ली सरकार के खोदे हुए मैनहोल में गिर के मर गए उनकी जिंदगी बदलेगी ही.

प्रतिदिन कई बच्चे और बुजुर्ग प्रदूषण की वजह से सांस की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं, उनकी जिंदगी बदलेगी ही.

जहां अंडरपास होना चाहिए वहां तो होता नहीं और जहां जरुरत नहीं वहां होता है. कभी कभी उस डिजाइनर के लिए गालियां आती हैं जिसने दिल्ली की सडकों को डिजाइन किया है, रोजाना घर से निकलते और  घर जाते समय उस आदमी को कोसता हूं जिसने मेरे घर के पास (बदरपुर के फ्लाईओवर) को डिजाइन किया है. और सिर्फ बदरपुर ही नही नरायणा, नोएडा, ओखला आदि के लोग भी उस इंजीनियर और डिजाइनर की तलाश में रहते हैं जिसकी वजह से वह प्रतिदिन घंटो जाम में फंसे रहते हैं.

अब आप समझ गए न कि जिंदगी एक जंग है और दिल्ली में तो यह जंग कितनी भयानक है. जहां हर कदम मानो मौत खडी रहती है. यहां एक गाना फिट बैठता है “ए भई जरा देख के चलो आगे ही नहीं पीछे भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी” सुबह रोड पर निकलते हुए प्रतिदिन ज़ाम का सामना और शाम को फिर वही हाल, लगता है डेली एक ही फिल्म चल रही हो.

उपाय: कहते हैं जहां प्रॉब्लम होती है वहीं उपाय भी होता है, ज़ाम दिल्ली की सबसे बडी प्रॉब्लम है और इसका उपाय है पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन. सोचिये सड़क पर जाम लगा हुआ है और कई बडी-बडी कारों में सिर्फ एक या दो लोग बैठे हुए हैं. उस कार की जगह में एक बस आ जाती जिसमें शायद 50 लोग आते हैं. सिर्फ एक बार सोच कर देखिए जवाब मिल जाएगा, उपाय सूझ जाएगा , दो कार की जगह में आती है एक बस. कितना कम हो सकता है ट्रैफिक जाम.

लाइनों में लगो तो सब्र रखो, बचपन के सबक को याद करो कि सब्र का फल मीठा होता है.

पर सबसे बडी मुश्किल मैट्रो की वजह से होने वाली परेशानी और इसका कोई उपाय नही है. जी हां, इस का कोई उपाय नही है. मैट्रो ने कहने को तो दिल्ली की सूरत बदल दी है और यह सच भी है. मगर इस सुन्दर से राज्य को बदसूरत करने का दोष भी मैट्रो के ही माथे पर है. आने वाले समय में काश दुबारा मैट्रो का काम शुरु न हो वरना इससे होने वाली परेशानी से न जाने कितने लोग संघर्ष करेंगे . जिंदगी की इस को जंग और खतरनाक होने से कैसे बचाएं ?

क्या सिर्फ सावधानी ही उपाय है , क्या सरकार कुछ कर नहीं सकती, आखिर कब तक इसी तरह जंग लड़ेंगे दिल्लीवासी, कब तक चलेगा यह मैट्रो का निर्माण कार्य ?

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