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नोट बंदी पर विपक्ष का विरोधी रवैया

Posted On: 20 Nov, 2016 Others में

NAV VICHARTO ENLIGHTEN & IMPROVE THE SOCIETY

MANOJ SRIVASTAVA

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जिस प्रकार से केंद्र सरकार के कालेधन और नोट बंदी के फैसले का विरोध विपक्षी पार्टियां संसद के भीतर और बाहर कर रही है वो तो देश की जनता देख ही रही है पर जनता का रुख देखकर ये आभास होने लगा है की विपक्षी पार्टियों का ये दाव उल्टा पड़ने लगा है . नोट बंदी के विरुद्ध उनकी आवाज जनता को बरगलाने में सफल नहीं हो पा रही है. जागरण द्वारा आयोजित रिसर्च तो फिलवक्त यही दर्शा रहा है . वैसे भी कतारों में लगे नवजवान , महिलायें और बुजुर्ग भले ही परेशानी में है पर सभी के मन में इसके अंत की एक सुखद अनुभूति अवश्य ही है . यद्यपि अभी भी दूसरी पार्टिया जनता की नब्ज पहचाने बगैर उसकी तकलीफों को उजागर कर विरोध की धार को पैना करने की कोशिश कर रही है पर ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा है . बैंको के बाहर लंबी कतारें देखकर हालाँकि अब केंद्र सरकार को इस बात का एहसास होने लगा है की उनकी तयारी में कहीं न कहीं कोई न कोई कमी अवश्य रह गयी . शायद इसी लिए संसद शुरू होने के पहले ही देश के प्रधान मंत्री को जनता को भरोसा दिलाने की जरूरत पड़ी .
“आप” , तृणमूल कांग्रेस सहित सभी दलों ने संसद में जनता की मुश्किलों का हवाला देकर नोट बंदी के फैसले को वापस लेने का दबाव बनाने की कोशिश की लेकिन केंद्र की अडिगता साफ़ है . विपक्षी पार्टिया आम जनता की परेशानियों के बाद भी उनकी सकारात्मकता नहीं देख पा रही है . कांग्रेस के गुलाम नबी आज़ाद के साथ ही साथ अन्य बड़े नेताओं के बेतुके बयान इसी बात की ओर संकेत कर रहे है की उन्हें ये फैसला पसंद नहीं आया . इसमें उन्हें अपनी हानि ज्यादा नज़र आ रही है . कुल मिलाकर देश इस समय एक प्रकार से विरोध के दौर से गुजर रहा है . कहीं भी सकारात्मकता नहीं दिख रही है . अब तो ऐसा लगने लगा है की अपने देश की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू बन गया है “विरोध” . सरकार का काम अच्छा हो या बुरा ,इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। सत्ताधारी पार्टी की योजना जनहित में हो , उनकी सोच सकारात्मक हो , इससे विपक्षी पार्टी को क्या , उसे तो उसका विरोध ही करना है। ये अपने भारत की बहुत बड़ी कमजोरी रही है। संसद में विपक्षी पार्टियों के बड़े नेताओं के बयान उनकी हताशा का प्रतीक है . ये वही पार्टिया है जो अभी तक काले धन के सम्बन्ध में कोई सफलता न हासिल कर पाने के लिए मोदी सरकार को कटघरे में खड़ी कर रही थी और ये कह रही थी की कालाधन अगर बाहर से नहीं ला पा रहे तो देश के अंदर के काले धन को बाहर निकलवाया जाये और अब जबकि सरकार ने ये ऐतिहासिक फैसला ले लिया तो ये उन्हें रास नहीं आ रहा . आखिर शुरुआत कही से तो होनी ही थी . ये विपक्षी पाटियों की हताशा और निराशा को ही दर्शाता है। देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की संकीर्ण सोच और मानसिकता ही है कि वह एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाने में फेल ही रही है । पार्टी ने अपनी कट्टर विरोधी सोच के साथ ये भी प्रकट कर दिया की उनकी पार्टी में लोकतान्त्रिक विचार वाले लोगों की बहुत कमी है। विरोध करने वालों को ये समझना होगा की बड़ी मात्रा में काला धन बेकार हो रहा है , साथ ही बैंको में पैसे जमा हो रहा है जो बैंकों की स्तिथि तो सुधरेगा ही साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा . लोगो के पास घरों में बेकार पड़े पैसों का जनता के लिए कल्याणकारी योजनाओ में इस्तेमाल हो सकेगा . समय की मांग तो ये है की सभी विपक्षी पार्टियां सरकार के साथ रचनात्मक भूमिका निभाए और बजाय विरोध करने के , इस योजना को सफल बनाने में और क्या कुछ करना बेहतर होगा इस पर विचार करे और कुछ सकारात्मक उपाय दौड़ने में साकार की मदद करें

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