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कैरेक्टर ढीला है

Posted On: 25 Jun, 2011 Others में

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manoranjanthakur

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क्यों बन रही हैं महिलायें आइटम। क्यों कहलाती हैं वो आइटम। क्यों खुद की सिक्का जमाने के लिये अपने नाम की करेंसी बनाने की चक्कर में पड़ रही हैं आज की बालायें। थोड़ी सी वाहवाही क्या मिली, बोल्डनेस और निखर जा रही है। खूबसूरत और बिंदास लड़की को क्या देखा, फिकरा कसते हैं लड़के, क्या आइटम है बाप। कारपोरेट जगत से लेकर सिनेमा उद्योग या फिर आम जिंदगी में महिलाओं को बतौर एक आइटम ही पेश करने की तिमारदारी हो रही है। आज आइटम का मतलब ही है पैसा वसूल। इस चक्कर में महिलायें कपड़ों की तंग हालत से गुजरने से भी परहेज करना तो दूर रिकार्ड बनाती नजर आ रही हैं। कई नामी महिलायें यह भी कहने से गुरेज नहीं करती, बिंदास जवाब देती हैं, फिगर है तो दिखाने में हर्ज, बुराई कैसी। अब यही हर्ज मुंबई की एक अदालत ने भी ठुकरा दी है। अदालत का साफ कहना है कि जीवन के मौलिक अधिकार में किसी के साथ भी संबंध बनाने की स्वतंत्रता है। रजामंदी से शारीरिक संबंध बनाने में कोई हर्ज नहीं है। बस कोई भी व्यभिचारी न बने। वैवाहिक जीवन में किसी को व्यभिचारी जीवन जीने की इजाजत नहीं दी जा सकती। हां, आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध बनाने को कोई भी स्वतंत्र है और इसी स्वतंत्रता से आज की नारी आइटम होती जा रही हैं। कहीं वह पुरुषों की शैविंग क्रीम की नुमाइश करती दिखती हैं तो कहीं समलैंगिक चेहरों की पड़ताल करती। जिस अनुपात में नारियां बेपर्द हो रही हैं उसी दर से पुरुष भी उस चरित्र के पीछे पड़े हैं। यानी महिलायें आज हर जगह इस्तेमाल हो रही हैं। चाहे वह घर के अंदर हों या बाहर की खुली हवा में। हालात यही है कि अब माता-पिता बेटी को बोल्डनेस और चीप या बल्गर बनाने की जरूरत महसूस कर रहे हैं। आधुनिक स्लोगन ही हो गया है- डेअर टू बेयर। कम उम्र की लड़कियां ही नहीं, अधेड़ औरतें भी नूडल स्ट्रैप्स में ग्लैमरस और सेक्सी नजर आने के लिये कई हथकंडे अपना रही हैं। एक जमाना था जब सत्यजित राय की फिल्मों की नायिकायें कपड़े कम किये बिना ही अपनी सेक्स अपील को जाहिर कर देती थी लेकिन आधुनिक स्त्री के पास गरिमा और ग्लैमर का यह मेल लगता है कम हो रहा है। यहां स्त्री विरोध फिर नहीं है, बल्कि उस विमर्श की जरूरत जरूर है जिसने अंग-प्रदर्शन करने को कहीं न कहीं मजबूरी पैदा कर दी है। अब देखिये, जो नायिकायें अन्य निर्माताओं की फिल्मों में अंग-प्रदर्शन को तैयार नहीं, कतराती दिखती हैं क्या वजह है कि यशराज की फिल्म में तुरंत जींस ढीला कर देती हैं। आज की दुनिया में यह कहना मुश्किल है कि बिकनी क्लचर महिलाओं की मुक्ति है या विवशता। स्त्रियों के लिये यह बिकनी पहननी मजबूरी है या पराधीनता का तोहफा। अब तो सड़कों पर भी दिखता है कम कपड़े पहनने का फैशन। यह महिलाओं का हक है या शोषण इस पर विमर्श कौन करेगा। स्वीजरलैंड समेत अमेरिका, इंग्लैंड के हूटर रेस्तरां में खाने के बाद हुस्न परोसा जाता है। इसमें हूटर गर्ल की छवि प्लेबॉय की बोल्ड सेक्सी छवि की तुलना में थोड़ा मध्यमवर्गीय कही जा सकती है। भारत में यह क्लचर फिलहाल प्रवेश की इच्छुक, घुसने को प्रयासरत है। रातों-रात सेलिब्रेटी बनने के लिये बोल्डनेस व सेक्सी अंदाज को महिलायें भरपूर भूनाने में पीछे नहीं है। उत्पाद बेचती महिलाओं के देह की मादकता से ही फिलिप्स टीवी बेचती महिलायें ही दिखती हैं तो सुंदरता का एहसास कराने ब्रेस्ट केयर के लिये नो साइड इफेक्ट कहती महिलायें खुले अंदाज में अखबारों, टीवी पर विभिन्न ब्रांडों को परमोट करती परोसी जा रही हैं। क्रिकेट कामेंट्री भी खुले बदन वाली महिलाओं के जिम्मे ही आ गया है। बीटेक या अन्य कोर्स की विज्ञापन में नारी देह को ही हाथों में किताब या गले में टाई लगाये दिखाकर कई शिक्षण संस्थायें अपना डिमांड बढ़ा रहे हैं। गरमा-गरम बातों के लिये दस मोबाइल नंबर के कोने में भी स्त्री ही खूबसूरत अदा में मुस्कुराती मिलती है। खेल की दुनिया में विबलडन के फोटो में थोड़ी नग्न खिलाडिय़ों के चेहरे क्यों बड़े-बड़े पोस्टरों में सैलून व पान की दुकानों पर आगे में ही चिपके मिल जाते हैं। सानिया ने खेल के दौरान कपड़ों की शालीनता पर थोड़ा ध्यान क्या दिया उनसे तरह-तरह के सवाल पूछे जाने लगे। बस आकर्षण। जिस वजह से महिलायें आज आइटम बन गयी हैं। रिएलिटी शो में महिलायें पुरुषों के सामने स्वयंवर रचाती हैं। जाहिर है, पैसा, शोहरत और ज्यादा लोगों तक पहुंचने का मौका जो इन दिनों महिलाओं को लगातार मिल रहा या मिला है उसी का नतीजा है कि आज हर क्षेत्र में महिलायें दर्शकों को अनोखेपन का स्वाद दिलाने के लिये पति-पत्नी और वो की भूमिका में दिख रही हैं। इतना ही नहीं, अपराध के क्षेत्र में कदम बढ़ा चुकी महिलायें लेडी डॉन की भूमिका को भी सार्थक कर रही हैं। हाल ही में वाहन चोरों के एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़ हुआ तो उसकी सरगना, उस गिरोह की लेडी डॉन एक इंटर की छात्रा निकली। शानो-शौकत भरी जीवनशैली की ललक में वह छात्रा कार क्वीन बनी, जो महिलाओं के बदलते स्वभाव, चरित्र व सामाजिक ताने-बाने में हो रहे व्यापक बदलाव की ओर समाज को इशारा कर रहे हैं। महिलाओं में सदियों पुरानी पूर्वाभास क्षमता और जैविकीय जरूरत ही है जिसके तहत वह बच्चा पैदा करने के लिये साथियों का चुनाव भी करती है और किसी पुरुष का चेहरा देखकर ही जान लेती हैं कि क्या वह समलैंगिक है। टोरंटो यूनिवर्सिटी में एक शोध ने खुलासा किया है कि जब महिलायें रोमांस के मूड में होती हैं तो इस संबंध में वे एकदम सही अंदाजा लगाती है। थाइलैंड के समाज में महिलाओं के दबदबे का आलम यह है कि वहां पुरुष आपरेशन पर लाखों रुपये खर्च कर अपना लिंग परिवर्तन करवा महिला बन रहे हैं। लेकिन यहां सवाल आइटम का है। उत्तेजनाओं का मिथक तोड़ती महिलायें कहीं आज मुन्नी बन रही हैं तो कहीं शीला। इतना ही नहीं हर दिन नये रूप में वे दिख भी रही हैं। मुन्नी भी मानी, शीला भी मानी, शालू के ठुमकों की दुनिया दीवानी। आइटम के नाम पर खुलापन, बेहतर शौहरत और टिकाऊ बने रहने की गारंटी ही है कि बिग बी आइटम ब्वॉय कहलाने को उतावले हैं क्योंकि अमीर खान ने भी कह दिया है अब आइटम ब्वाय की करेंगे बॉलीबुड पर राज। तो आप भी हो जाइये तैयार और हो जाये एक नया आइटम क्योंकि मैं अकेले करूंगा तो आप कहेंगे… कैरेक्टर ढीला है।

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