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जिस्म की तेज लौ में पिघलती महिलावादी

Posted On: 29 Nov, 2013 Others में

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manoranjanthakur

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तेजपाल की गिरफ्तारी के बीच राजनेता-पत्रकार के गहरे रिश्ते दाग अच्छे हैं, के मानिंद बिल्कुल साफ हो चुके हैं। तहलका दफ्तर में ताला जडऩे की नौबत और आग व गर्मी के इस याराने में तय है, जो जितना ओहदे, नामवाला, ताकतवर पत्रकार वो नेताओं, उद्योगपति, बॉलीवुड के उतने ही खास, उतनी ही करीब, पास-पास जिसके बीच का फासला, पाट उस देह से पटा, भरा है जो एक ऐसी स्त्री चमड़ी से बनी, निर्मित है जिसका कब, कैसे, कहां इस्तेमाल करना है, वो इन साहेबों को बखूबी पता, समझ है। बात गीतिका की हो। चांद की फिजा, भंवरी या फिर न्यायाधीशों की समिति की घुरती संदेह की नजर से देखती, गुजरती नग्न आंखें युवा महिला वकील को निहारती, फरियाद सुनती। वहीं, तहलका की पीडि़ता या जासूसों की निगहबानी से बचती एक लड़की देह को समेटती, उधार की रस्म भी निभाती, अदा करती। सवाल उठाती, क्या दो दशक पूर्व की महिलाएं भी बलात् देह बांटने को विवश, विमर्श को आमंत्रित होती थी? हाय-तौबा की शर्ते पहले कहां लागू थीं? बेटियां दहलीज से बाहर लगातार क्या निकलीं पुरुषों का कैरेक्टर ही ढ़ीला, पंचर होता, लसलसाहट में चिपक सा जा रहा है। जहां, मोदी जैसे ताकतवर भी एक देहरस्म को अदा कर जाते अपने ही आइएएस प्रदीप शर्मा को इस बाबत सस्पेंड की राह दिखाते हों। कहीं उसके पास, हाथ उनका कोई सेक्स सीडी तो नहीं?
बात, एक प्रदेश गुजरात की हो। पत्रिका तहलका की या आसाराम बापू व उनके बेटे नारायण साई की। सभी एक ही रास्ते पर। त्रिया चरित्र जब पुरुषों की काली कमाई में हिस्सेदार बन बैठे। उसमें दैहिक महिलावादी घोल फेंट, मिला दे तो तहलका मचना स्वभाविक। तेजपाल की कहानी आसाराम की धार्मिक कम अर्थ, कामेच्छा कथा पर ज्यादा फोकस की सिक्वल भर है। तीनों जगह बस, एक नायिका के प्रवेश ने अर्श से फर्श की कहानी लिख डाली। जहां आसाराम के नित्य नए गुल खिलने लगे। तेजपाल की पत्रकारिता के नाम पर गोरखधंधे, राजनीतिक दलाली, भयादोहन, दिल्ली से गोवा, नैनिताल तक ऐशगाह व शाम की रंगीनी के बीच दस रुपए की शेयर को लोगों ने तेरह हजार में बिकते देखा। वह गोवा का फेस्ट क्या था? नामवर लोगों का नग्न रूप जिसे रात के अंधेरों में हयात जैसी ठंडक वाली कमरों में आराम से निहारा जा सकता है। ये वही लोग थे जिन्होंने अघोषित तहलका के लिए बहुत कुछ जुटाया है। जमावड़ा कर जाम टकरा गए कौन? क्या कांग्रेस क्या बीजेपी क्या फिल्मी दुनिया के नायक, क्या आम आदमी पार्टी सब उसके हिस्सेदार, करीबी।
बेशर्म हालात यही। गुजरात में लड़की नजदीकी संबंध बुनने को विवश होती है। कहीं वो लड़की कुछ बोल, लिख ना दे। उसकी जासूसी के बीच खुद को सुरक्षित रखने का जुगाड़ खोज लिया जाता है। दूसरा तहलका, जहां लिखने-पढऩे-बोलने की आजादी भी छीन गयी। लिहाजा, वहां विकेट दर विकेट यूं गिरने लगे मानो मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के महासचिव अल्पेश शाह बंद कमरे में आशीर्वाद लेने-देने के नाम पर एक अंडर 19 महिला क्रिकेटर को बुला, उसकी दैहिक गंध सूंघ ली हो। गोवा की मस्ती भरी रात, एक वैसा फेस्ट जो होता, दिखता तो गोवा में है लेकिन उसके पीछे पूरा पृष्ठभूमि लिखा, बुना, बनता है नोएडा, केरेला और नामी कंपनियों के आलीशान दफ्तरों में। माना, अखबार-चैनलों को विज्ञापन की जरूरत है मगर दहलीज के भीतर ही। कहां नोएडा आर्थोरिटी…कहां गोवा में तहलका फेस्ट। कहीं कोई तारतम्य कोई सार्थक संबंध नहीं। तहलका ने हालिया दिनों में खासकर बंगारू लक्ष्मण के स्टिंग के बाद खुद को सौदेबाज बना लिया। कोयला आवंटन की कालिख से लेकर लाइजनिंग, शेयर की खरीद-बिक्री को कैमरे व कागजों में उतार लेने के बाद तेजपाल की तेज, शातिर दिमाग पैसों की भूख में उसे छान लेने को बेताब हो उठा था। हिस्सेदार बन बैठी थी उसकी भागीदार वहीं की महिला संपादक जो आसाराम की शिल्पी या नारायण साई की गंगा-यमुना की भूमिका में तेजपाल की अय्याशी से लेकर काली हाथों को साफ करती आगे मिलेगी, तय है।
चस्का तो साहेब को भी लगा। एक महिला के जीवन के हर क्षण की जानकारी लेने का। अपना सीक्रेट मोबाइल नंबर, मेल आइडी बदलकर कौन बतिया रहा था। वही भारत का प्रधानमंत्री बनने का दावा करने वाला भले दो सदस्यीय जांच कमेटी बना ले। हकीकत यही, यह निष्पक्ष कम साहेब को सुरक्षित आवरण में ढ़कने की कोशिश ज्यादा है। इस जांच कमेटी का भी हाल मुंबई सांप्रदायिक दंगों की जांच करने वाले श्रीकृष्ण आयोग की तरह तय है। कारण, मोदी उस लड़की को कब से जानते थे इस पर भाजपा भी शायद एकमत नहीं। निलंबित आइएएस प्रदीप शर्मा भले बंजारा के बाद मोदी के खिलाफ मुखर हो गए हों और उस लड़की से साहेब के नजदीकी रिश्ते की पर्त खोलकर मोदी को टाइम्स पर्सन ऑफ द इयर में तीसरे पायदान पर लुढ़का भी जरूर दिया हो यह कहते, मोदी उस लड़की को ऐसी एसएमएस भेजते थे जिसे पढ़कर कोई भी शर्म की बूंद में नहा ले।
याद आती है पूर्व सांसद पप्पू यादव की बात। यशवंत सिन्हा ने अटल बिहारी की भाजपा सरकार को बचाने के लिए पैसे बांटे। पद का लोभ भी दिया। भले इस पर भाजपा में चुप्पी हो लेकिन जिसने फायदा उठाया वो गरजा। अब नागमणि उनपर मानहानि का मुकदमा करेंगे। बात वही हो गयी। सुषमा जी कपिल सिब्बल पर तेजपाल को बचाने व तहलका में शेयर रखने के बीच कानपुर में क्रिकेट मैच देखने पहुंचे दर्शकों को मोदी वाली चाय पिला रही हैं लेकिन दिल्ली बीजेपी के नेता विजय जौली ने शोमा के घर के बाहर प्रदर्शन के साथ नेमप्लेट पर आरोपी क्या लिख दिया उसपर कार्रवाई की बात करती हैं। भले, जौली बीजेपी से कार्रवाई की डांट पीकर माफी मांग लिया हो लेकिन यह डांट और माफीनामा बीजेपी के सांकेतिक संस्कृतिवाद के चरित्र से इतर जरूर है? जो बीजेपी अपराध से निबटने के लिए महिला कमांडो बल तैयार करने व फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरु करने के लिए दिल्ली में जिताने की अपील करती चुनावी घोषणा पत्र जारी करती मिलती है उसका जौली पर बेजा कार्रवाई या विरोध का यह रूप एक दाग अवश्य, जरूर है। उसके भावी दिल्ली के मुख्यमंत्री हर्षवद्र्धन कांग्रेस की उम्मीदवार अमृता की तरह फोटो शूट कराने स्टूडियों में ज्यादा व्यस्त यूं ही दिख रहे मानो, तेजपाल लिफ्ट से निकली लड़की के पीछे दौड़ रहे हों। भूल करते कि यह वही दिल्ली है जहां एक सप्ताह पूर्व तक सभी टेम्पो पर झाड़ू निशान व अरविंद ही दिखते थे। आज वहां आप को भगाओ का नारा चस्पा मिल रहा है। एक टेम्पो चालक को दिल्ली विस का टिकट देकर छीन लेना आप को कितना महंगा पड़ेगा यह तो शोमा चौधरी से ही पूछिए कि क्या उन जैसी महिलावादी को कहीं और नौकरी मिलेगी? या सपा के नरेश अग्रवाल जिन्हें महिलाओं को पीए रखने में भी खतरा दिखता हो, सोचनीय। खासकर जब, बलात्कार की राजनीति पर वृत्तचित्र साइलेंट स्क्रमीन्स इंडियाज फाइट अर्गेस्ट रेप को दूरदर्शन व तमाम मीडिया चैनलों पर प्रसारित करने का मौका मिलता दिखे पर मानसिकता के फेरबदल पर खड़ा सवाल वहीं दरकिनार है जहां दिल्ली की एक अदालत के जज वीरेंद्र भट नाबालिग लड़की से बलात्कार में लड़के को तिहाड़ जेल से रिहा होने का हुकुम देते मिलते, कहते हैं, दोनों के बीच यौन संबंधों में सहमति थी। मानो, नीना तेजपाल खुलासा करती मिलती हों, शोमा चौधरी का असली नाम सुपर्णा चौधरी है और वह कंपनी में दस फीसदी की मालकिन हैं। ऐसे में, 34 प्रायोजक कंपनियों से 17 करोड़ का जुटान और कर्मचारियों के तनख्वाह पर खर्च होते महज 1.68 करोड़ के बीच गोवा के मुख्यमंत्री से संबंध व गोवा टूरिज्म से अवैध कमाई, शेयर से करोड़ों के मुनाफे का हिस्सा कहीं दिखता, लिखा मिलना, कहना मुश्किल। विडंबना देखिए, इसी देश में महिलाएं फोन पर वोटर बन मतदान की हक ले सकती हैं लेकिन अपनी जमीनी लड़ाई, अस्तित्व, चरित्ररक्षार्थ कोई पुरुषिया लक्ष्मण रेखा नहीं लांघ सकती क्योंकि वो भी आजकल पार्टनर, व्यापारिक साझेदार जो बन रहीं फिर देह बांटने में हर्ज… बात यहीं आकर ठहर, रूक जाती है।

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