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देश में नाचता नरवादी पिशाच

Posted On: 1 Oct, 2013 Others में

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manoranjanthakur

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भीड़ से बचकर भागती, निकलती स्त्री। पुरुषों की पिपासा, प्यास में तडफ़ड़ाती, काम लिप्सायी नजरों से बस, रेल में रिहाई की उम्मीद पालती, बचती स्त्री। वहीं, उसी किनारे, कोने में नरवादी ताकत में निचुड़ती, सिकुड़ती, कराहती देह से रस नष्ट करती स्त्री। स्कूलों से घर लौटती किसी बच्ची के अंगों की छलनी, लहू के रिसाव, मूक, नि:शब्द भावों से आपबीती सुनाती मासूम चेहरों के घाव, जख्म अब हमें विचलित नहीं करते। नहीं फूटते देह में अंगार के कहीं कोई ज्वार। विद्रोह की आग अब नहीं पजरते, जलते, सुलगते हमारे अंदर। घरों से बाहरी दहलीज तक सुरक्षित स्त्रीत्व का निर्विकार, निश्छल चेहरा हमें भाता कतई नहीं। हम छूना, भोगना चाहते हैं स्त्रीत्व का आंतरिक स्पर्श। सुनता चाहते हैं उसकी मोम सी पिघलती सिसकियां। कहीं-कोई रोती-बिलखती स्त्री, लहूलुहान उसका शरीर हमें नहीं सुहाता। उसके चेहरे पर नाखूनों की खींची लकीरों में रक्त के वो लाल कतरे का तिनका-तिनका धब्बा अब हम सूखने, मुरझाने नहीं देना चाहते। कोई स्त्री कहीं बलात्कारी की पहुंच, सामीप्य होती, आती है। हमारे अंगों के रोंगटे भी उठ खड़े, बोल पड़ते हैं सीनाताने। तू भी तो एक पुरुष है। तुम्हारे अंदर भी तो वही गंध, पुरुषिया सर्वांगीण तत्व के अंश, अनुपाती बीज हैं। फिर, तू बोना क्यों नहीं चाहते। खेतों में फसल उगाने की बाजीगरी, अपराध के सबसे कठिन कार्य, किसी स्त्रीत्व को बझा, पास सुला लेने की चाहत, सोचते-पालते क्यों नहीं। जहां बीघों में उग सकें एक साथ बलात्कारियों के असंख्य दानें। मज्जे से भरपूर। एक टुकड़ा, एक अंश। खिल-खिला उठे कहते हुए हां मैं, मेरा धर्म, समाज, मेरा संपूर्ण देश, एक-एक पुरुष बलात्कारी की खेती करने, उसे उपजाने में व्यस्त हैं। यह स्वीकारते, देश कृषि नहीं बलात्कार प्रधान हो गया है। सोच, मंशा यही, दुष्कर्म अब शर्म करने की चीज रही नहीं। इस देश के यशोगान, उत्सवी स्वरूप, पूजनोत्सव की मिजाजी में शामिल उसी में रचा-बसा नरवादी पिशाच हमारे समाज को लगातार भेदता, तोडऩे को आमादा सामने है। जिस ताकत के आगे पूरा तंत्र नतमस्तक ही नहीं बल्कि हमें सहर्ष स्वीकार, निजी जीवन में समाहित, शामिल हो चुका है। हमारा अपना कोई खून, संबंध बुनता कोई रिश्तेदार जिसका नाम बलात्कारी है। हमारे ही घर के कोने,पड़ोस, समाज, देश में ही तो रहता है।
जमाना हाल तलक था। बलात्कारी हादसा को अनहोनी समझ शोक मनाने की जरूरत आन पड़ी थी। समूचा राष्ट्र एकबारगी जाग गया था। आज, उससे इतर फिर यह हमारे बीच, साथ सत्कार की श्रेणी में है। किसी महिला चाहे उसकी उम्र नवजात की शक्ल में हो या 75 साला झुर्रीदार। कोई पुरुष उसे अंदर से तोड़ता, देहिक मरोड़ देता है तो इसमें हया, मनहूसी कतई नहीं। अब इसका स्वरूप उसी मोड़, मुकाम पर है जब लोग बलात्कार की घटनाओं को फिल्मों में चाव से देखते। अखबारों की सुर्खियों में खोजते। आंखें पिरो-पिरो कर पढ़ते-सुनते। चटकारे लेते, स्वाद बांटतें मिलते थे। चाहे उत्तर प्रदेश के कुशीनगर थाने का वह थानेदार जैसराज यादव बलात्कार होने पर शिकायत करने पहुंची पीडि़ता से कपड़े उतारने को कहता ही क्यों ना मिले। हम उसी मोड़ पर फिर खड़े होकर मौजूदा परिवेश को जीने लगे हैं जहां दिल्ली कांड के दोषियों, गुनाहगारों को फांसी की सजा के बाद या पहले थे। स्त्रीत्व की रक्षा किए बगैर। जुवनाइल जस्टिस पर चुप्पी साधे बिल्कुल चुप। वक्त के थपेड़ों के साथ सुस्त पड़ती न्यूनतम आयु 16 साल करने की मांगों के बीच। न्यायपालिका के आगे बेबस पड़ते, दिखते। आंदोलनकारियों के स्वर आरोप मढ़ते भी कि पुरुषों को खुद भड़काती हैं महिलाएं। दामिनी, गुडिय़ा की बातें न्याय मांगने जहां पहुंचती पहले से सबूत मिटाए आरोपी वहीं मिलतें हाथ मिलाते। लड़कियों पर लांछन के बैनर उठाए। कहीं गृहलक्ष्मी की पूर्व संपादक 65 वर्षीय सुनीता नाइक मुंबई के फुटपाथ पर कुत्ते को क्रोसिन की गोलियां खिलाती गुरुद्वारे के बाहर सोयी मिलती हैं। वहीं स्त्रीत्व पर झाग फेंकते दिखते हैं बुजुर्ग। जो सच था सच के सिवा कुछ नहीं। बात हो रही थी वहां शहीदों की। देशभक्ति गीतों की सरिता में नाटक व नृत्य से शहीद जाबांजों की स्मृति में गान हो रहा था। ऐन मौके पर लखनऊ के संत गाडगे प्रेक्षागृह में एनडी तिवारी का पौरुष जाग उठा। मंच संचालन कर रहीं बाला के साथ उनका बहकना, रस मुग्ध हो जाना हमारी वर्तमान संस्कृति, संस्कार, कर्म इसकी जरूरत भविष्य में चिंतन पर एक तमांचा से कम नहीं। रांची में स्कूल बस से घर लौटती पांच साल की बच्ची के साथ बस की पिछली सीट, कोने में गोद में बैठाकर खलासी आठ किमी का सफर बलात् तय करता है। समस्तीपुर में टेम्पो से उतारकर ससुराल से मायके जा रही महिला तीन लोगों की हिस्से में बंट जाती है। वैशाली में जलावन चुनकर घर लौटती दो किशोरी पांच बदमाशों के शरीर में समा जाती हैं। सवाल वहीं, हम सुधर कहां रहे। बिगड़ ही रहे। फिसल, ढलान पर ही उतरते जा रहे। जहां दुष्कर्म की घटनाएं कम होने की बजाए बढ़ रही। हालात यह, दुष्कर्म अब गांव पहुंच चुका है। बिहार के जाले में नाबालिग के साथ तीन दिनों तक भुसकार में पांच मनचलें सामूहिक निस्तारण करते रहे। ये महज चर्चा, हमारे दिनचर्ये की बानगी भर है। चर्चा तो मोदी की भी हो रही। चट्टानों से छलांग लगाते। उड़ते, दौड़ते हुए मोदी के गेम में सभी जमें, मजे ले रहे हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, राजस्थान, केरल, कर्नाटक, असम, तमिलनाडु, एमपी, यूपी में होने वाली चुनौतियों को दौड़ते, पार करते, एंड्रायड मोबाइल पर गेम प्लान बनाते सुपर हीरो का किरदार निभाते। छोटी स्क्रीन के मोदी। मोबाइल के मोदी। दीगर यह, एकता परिषद की बैठक में फुसफुसाते आडवाणी-नीतीश को फुर्सत में बतियाने का मौका देते। अच्छा किया नीतीश जी, मोदी के नाम पर भाजपा का साथ नहीं दिया बहुत-बहुत शुक्रिया। इसमें शुक्रिया कैसी आडवाणी जी, मैंने तो आपको पहले ही कहा था, आपका वफादार हूं, नमक अदा कर दिया। या फिर वहानवती को धमकाती कोई फर्जी सोनिया बनी महिला जिसे शर्म नहीं आती। कुछ मुजफ्फरपुर की रेड लाइट एरिया की नर्तकी, शरीर बेचने का धंधा करने वाली वेश्या से भी नहीं सीखती, दिखती। जो वेश्यालय में बिकने आयी पटना की 18 साला युवती को खरीदने से तौबा करती खुद पुलिस को फोन घुमाती पकड़वाती है उसी बिचौलियों को जो उसी के हाथों उस लड़की को बेचने के लिए लाए थे। ऐसी महिलाएं और ऐसी घटनाएं देश में दुलर्भ। यह भी इसी देश में ही संभव जहां मुंबई गैंग रेप के एक आरोपी जेल से गायब हो जाता हो। सिराज उर रहमान एक ठाणे जेल से गायब कैसे हो गया पुलिस को भी इस बात की भनक कोई जानकारी तक नहीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या यूपी के युवा अखिलेश यादव सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश करते मिलते हैं और इसी देश में नरेंद्र मोदी कांग्रेस शासन का पर्दाफाश करने के लिए सोशल मीडिया को हथियार बनाने। उसी के सहारे भ्रष्टाचार की पोल खोलने की वकालत करते नहीं थकते। जम्मू की वादियां गोलियों की तड़तड़ाहट से कांप रही हैं। कठुआ व सांबा में दोहरे आतंकी हमले में कई जवान-अधिकारी मरते-कटते मिलते हैं। देश के प्रधानमंत्री श्री सिंह इन नरवादी पिशाच की कतई चिंता किए बगैर नवाज शरीफ से अमेरिका में मिलने की तैयारी करते, उसी में मशगूल। बिना यह सोचे, एक सिख मानवाधिकार कार्यकर्ता समूह वहीं न्यूयार्क में तैयार बैठा है हाथों में समन लिए। यानी 1990 की घटना के 23 सालों बाद चिट्ठा खोलते द सिख फॉर जस्टिस पंजाब में चलाए गए आतंकवादी विरोधी अभियान के दौरान मानवता का तिलाजंलि देने के खिलाफ नाराजगी जताते। इस सबके बीच सुखद यही, भारतवंशी महिला इंदिरा तलवानी की अमेरिकी न्याय प्रणाली में सशक्त होकर उभरना उनका वहां जज बनना। यह गौरव के साथ यकीन के लिए भी काफी, बहुत कुछ उम्मीद लिए। शायद किसी मुहाने, कोने में ही सही नरवादी पिशाच पर अंकुश तो लगेगा। मुजफ्फरनगर में दंगे की आग के बाद अब पछतावे की पंचायत सरीखे। बसीकलां, शाहपुर व जौला के राहत कैंपों में रह रहे शरणार्थियों की दिलों में बरकार डर दूर करते कि कल तलक जो सड़कें सुनसान, मकान खाली, सन्नाटा, गांव में कोई पुरुष नहीं। चंद खिड़कियों से झांकती महिलाएं भी गुमसुम सेना के जवानों को मार्च करते, देखते, उस निरवता को तोडऩे इस जाट बहुल गांव में एक पंचायत ही सही। कमोबेश एक पहल, अमन व शांति के लिए नरवादी पिशाचों के खिलाफ। देश में हालात यही, पुरुषों में मुंह के कैंसर के बढ़ते मामले सीधे ओरल सेक्स से जुड़े भयावह रूप में सामने है। जहां ओरल सेक्स के दौरान संक्रमित हयूमन पैपिलोमा वायरस नरवाद के खिलाफ दुश्मन बन बैठा है। उसी सरीखे गोया, अखिलेश यादव से मिलने पहुंचती, अपना पक्ष रखती मिल जाती हैं दुर्गा शक्ति। सत्ता के आगे झुकती, माफी मांगती। फलसफा, वो फिर से बहाल कर ली जाएं एक नए अध्याय की शुरुआत करने। उसी छिंदबाड़ा स्थित आश्रम की वार्डन शिल्पी के मानिंद, आसाराम को निर्दोष बताती और इतराते आसाराम जेल में अन्न-जल त्यागने की धमकी देते। पिशाची हक की आवाज बुलंद करते कि हमें फंसाया गया है। जानते-समझते कि वो लड़की नाबालिग थी। यह देखते, समझते कि इसलाम के संबंध में जवाब नहीं देने और मुहम्मद की मां का क्या नाम है? नहीं बताने पर अबुजा में अल कायदा से संबंधित शबाब व हथियारों से संबंध रखने वाले सोमालियाई नरवादी पिशाच एक भारतीय को गोली मार देता है। बावजूद, शिल्पी आसाराम को झूठ की ओढऩी में लपेटती साफ संकेत देती कि महिलाएं आज भी बला की परिधि, परिभाषा से मुक्त नहीं हुई हैं। ऐसे में, राजस्थान व हरियाणा सरकार की शराबखोरी से निबटने के लिए जो बदलाव की नयी बयार बहायी है निसंदेह सार्थक व स्वागत योग्य कि अब शराबी पति की आधी तनख्वाह पत्नी को मिलेगी। शायद, नरवादी पिशाचों के चंगुल से मुक्त, एक स्वतंत्र माहौल के लिए जरूरी व सार्थक कदम-
महफिल को चार चांद ना बेशक लगा सका
लेकिन जला के चंद दीप जा रहा हूं मैं।

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