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वैदिक मंत्र से हाफिज यज्ञ

Posted On: 15 Jul, 2014 Others में

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manoranjanthakur

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मीडिया आज कहां है! कहीं यह दूसरों की ईमान खरीदते,कहीं खुद को बेचते, खरीददार तलाशते, टटोलते, उसी के बहकावे में खुद का चरित्र गढते, बेपर्द आवरण में स्वयं को दोराहे पर खडा करने की जिद पर आमादा उसी में जीने, दिखने,परोसने, सांझा करने की हडबडी लिए उसी कोशिश, कशमकश में कि आओ लाॅगइन करो, पासवर्ड डालो और देखो कि मीडिया की ईमानदार, तमाशाई छवि, उसकी असलीयत, परख, समझ, बेशर्मी आज किस हद, स्तर पर है. पूरा मीडिया ही फिलवक्त हताश, निराशा के दौर में असहज है. हालात यही, आधुनिक आजाद मीडिया का बेशकीमती चेहरा, उसका सरोकार, दैहवरण, सोच, मंशा, जरूरत पाकिस्तान के उस नाजुक, शर्मनाक, नापाक मोड पर दिखता, मिलता है जहां वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच हाफिज से नमो यज्ञ, अनुष्ठान करवाने की कोशिश हो रही है. जिसके पीछे सत्ता लोभ, प्रपंच, कूटनीति, कारपोरेट जगत से अंडरवल्र्ड तक के मीडिया कनेक्शन, सांठगांठ के बीच दौलत, देह व शौहत के खिस्से सामने है. इसके बाद, खबरों से उठता भरोसा, विश्वास, संप्रेषण में बू, अदायगी, उपयोगिता, मारकता पर संदेह, उसकी जरूरत पर प्रश्न चिहृन लगना स्वभाविक. तमाम दोहरे चरित्र में जी रहे मौकापरस्त, राजनीतिक चटाई पर लेटने वाले खबरनवीस बडे-बडे घराने मीडिया के अस्तित्व पर खंजर, नस्तर चलाने की जिद नहीं छोडने का हठयोग करते इसे जिस मुकाम पर उतार, फेंकने को बेचैन, उतारू हैं वहीं से मीडिया का संपूर्ण देह चरित्र, अपवित्र, भनीय,अमर्यादित, अनैतिक, कलंकित दिखता, दिख, मिल रहा है. ऐसे में, दस साल लगातार सुखवाद का भोग लगाने वाली कांग्रेस उसके दरकिनार होते युवराज की आखिर मीडिया मैनेंजमेंट कहां विफल, पीछे छूट गयी यह सोचनीय. मोदी के अवतरण के बाद से मीडिया का कांग्रेस व अन्य दलों से मोहभंग की नौबत, स्थिति का होना, आना अच्छे दिन के जयगान में कहां लुप्त, विलुप्त, डूब, गायब हो गए यह विचारणीय. फलसफा, मोदी के अमेरिका दौरे की मामूली, साधारण, रूटीन की खबर तक तमाम क्षेत्रीय, प्रादेशिक अखबारों के सुर्खियों,लीड में आज दिख, छाने लगे हैं. अचानक मोदी के श्रीकृष्ण अवतरण के खिस्से आम, विशेष तरजीह पाती,लेती उनके व्यक्तित्व, सादगी, नजरिया, रहन-सहन, विचार, सहन-समझशक्ति से एक चाय वाले की दमदार स्टोरी, मायावी बोली तक मीडिया में यूं उछले, कूद रहे मानो, इससे पहले कभी देश जिंदा ही नहीं था! ऐसा मानव व राजनेता अनायास मिल, कहीं से टपक पडा, दिख गया जिसकी उम्मीद ही ना कभी हो. कल तलक हिंदुत्व व दंगाई चेहरे से निकली, उभरी छवि देश की निष्ठा से कब जुड गयी पता ही नहीं चला. यहां तक, मुस्लिम तुष्टिकरणवाद भी सांप्रदायिक अक्स में खो, कब गुम सी हो गयी कहना मुश्किल. बार-बार लगातार ज्ञानवान, गुणवान, व्याख्यान यूं परोसे जाने लगे कि बाकी दलों के लिए कुछ गुंजाइश, समय, स्थान शेष रहा, बचा ही नहीं. ऐन वक्त पर, संपादकों की गिरफतारी से तेजपाल के कारपोरेट, महिलावादी संस्कार, नामचीन हस्तियों के लाॅन से लेकर बिस्तरों पर सिलवटें गरम करने तक फडफडाते, हांफते मीडिया के चेहरे उसके दोयम, दागदार, पक्षपाती शब्दावली से इनकार या स्वीकार करने की गलती में एक वर्ग कदापि नहीं है. पार्टी लाइन पर बडे-बडे मीडिया घरानों की नूराकुश्ती, दौड-भाग करते उनके संपादकों के घनघनाते फोन. कही राज्यसभा पहुंचने की चाहत, जल्दीबाजी. कहीं माल बोरे में भरने, बांटने, बंटोरने की जल्दबाजी से पूरे खबर तंत्र से विश्वास का टूटना जगजाहिर. केजरीवाल को टीवी पर भगत सिंह का अवतार बनाने, दिखाने की कोशिश इसी जरूरत के पीछे की हकीकत भर है. ऐसे में, तटस्थ पाठक, दर्शकदीर्घा चुनाव वक्त जैसे दलगत भूमिका से हटकर एक स्वच्छ छवि को जिताना पसंद करता, दिखा है. उसी की तामीरदारी में बडे-बडे विज्ञापन व सेलेब्रेटी की बातों पर भरोसा करते दिखते ऐसे वर्ग को मीडिया से भी निष्पक्षता की उम्मीद स्वभाविक. जो भाजपा से कांग्रेस, सपा, बसपा, जदयू के चेहरे में फर्क नहीं महसूसे. मोदी का अमेरिका जाना सामान्य प्रक्रिया है. सवाल यह कि वैदिक हाफिज से मिलने क्यों गये. पत्रकारिता की नींव ही स्ंिटग व सनसनीखेज, दुलर्भ खबरों को परोसने से पटी, पडी है.चंदन तस्कर वीरप्पन, फूलन देवी के साक्षात्कार के लिए खबरची महीनों लगातार जुटे, मिलते, मिले और उसका संवाद भी सामने आया. मगर वेद प्रकाश का विजन, उनका उदृदेश्य, वक्त उनके दूत बनने की हकीकत पूरे मीडिया को शक की चैखट पर ला खडा करने को काफी है. एक सैन्य अधिकारी घूस लेता, बलात्कार करता, मिलता, दिखता है. सारी फौज बेशर्म नजरों से निहारी जाने लगती है. आज तो मीडिया का एक बुजुर्ग चेहरा ही उस हाफिज के पास मौजूद है जो भारत के बेगुनाहों के खून से जिंदा है. जो देश का मोस्टवांटेड है. जिसके शब्दकोष में ही मोदी के लिए सिर्फ बदजुबानी, अमर्यादित भाषा, शब्द का ऐसा फरेबी जाल है जिसमें पूरा पाक वहां के हुकुमरान भी फंसा, छटपटा रहा है. मुरादाबाद के एसपी पर यूपी प्रदेश भाजपाध्यक्ष वाजपेयी की नागिन डांस की कडी इसी सुर्खियों को बंटोरने की एक कडी भर है. जहां मानवता का गला घोंट कर मुरादाबाद की पवित्र, नापाक धरती को लहुलूहान महज वोट की रोटी, उन्माद की खेती से हिंदू-मुस्लिम को बंटोरने की चाल, बईमान इरादे से भरी धमकी, अगली बार मोदी सरकार में देख लेंगे सरीखे ही है. मीडिया, उसके कर्ता भले दूत बनने, राजनीतिक इस्तेमाल से इनकार करें हकीकत यही आम आदमी के चहेरे में भी आज हर एक के बाद दूसरा चेहरा एक पत्रकार का ही है जो केजरीवाल की जय जयकार में आकंठ है. ऐसे में, राजनीति, सत्ता व पत्रकारिता गठजोड के उभरे नये अवतार कारपोरेट मीडिया में आज सबकुछ जायज है. कश्मीर भी आजाद हो जाए तो हर्ज कहां, शर्त यही, सौदा लाभ का हो. यही वजह है, मोदी के प्रधानमंत्री बनाने में वैदिक की अपनी आहूति देने की बात, पचती कम, सही ज्यादा लगती है.

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