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"नहीं तगाई कोई रजाई"

Posted On: 3 Jan, 2018 Others में

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meenakshi

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प्रस्तुत काव्य रचना में वर्तमान स्थिति उजागर हुई है . गाँव से लेकर शहर तक पढे -लिखे लड़कों का जो हाल है वह किसी से छिपा नहीं है . ऐसे ही कुछ भावास्थिति की अभिव्यक्ति का प्रयत्न किया है । एक माँ जो बेटे संग अपने पौत्रों संग रहने का ख्वाब सजाती है; हौसला बढ़ाकर गया बेटा वर्षों बीत गये ..वह अपनी माँ को लेने नहीं आया. ..पर उस माँ की आस नहीं टूटती है..वह प्रति दिन प्रतीक्षा करती है , और ….अब.. आगे पढिये ..

“नहीं तगाई कोई रजाई”

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नहीं  तगाई   कोई  नयी  रजाई
नहीं   बुनाई  ढीली पड़ी  चारपाई
डीवट  पर रोज  ढिबरी    जलाई
आस   में   बैठी  बेचारी      माई
*
मीठे  बोल से  भर  गया  था
जाते  – जाते  गले  लगा  था
माँ  का हौसला  बढ़ा गया था
आशा के  दीप  जगा गया था
*
नहीं जलाया  कोई अलाव था
नहीं  मंगाया कोई  जुराब  था
बेटे संग जाने का मन बना था
नया स्वैटर पोते का बुना  था
*
व्यथित मन क्या किससे गाए
आस में  दिन रात बीतते  जाए
आखों  के  तारे  सब  बदल  गए
आस पड़ोस   सब   जान  जाए
*
इतने  रईस  सब बन  गए हैं
मातृभूमि को   भूल   गए हैं
देस विदेस में  बस  गए   हैं
‘लहू के  रंग’   बदल  गए  हैं
*

वक्त की चाल अब बदल  गई
रोजी  रोटी बड़ी  कठिन   भई
पति-पत्नि मिल   करें   कमाई
जीवन में  सुकून न पड़े दिखाई

*
सोच समझ  की  है  लाचारी
मुश्किल में पड़ी है  रिश्तेदारी
हाय !  ये  कैसी है  मारामारी
मजबूरी है या ना समझदारी ?
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मीनाक्षी श्रीवास्तव
(स्वरचित )

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