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एक बुड्ढे की हकीकत

Posted On: 27 May, 2012 Others में

साधना के पथ परअद्य की स्याही

सूफ़ी ध्यान श्री

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मैं हूँ अलीन मैं हूँ अलीन, जो पिछले कई दिनों से इस मंच पर उथल-पुथल मचाया हुआ है. इस मंच की मान-मर्यादा और शांति को जहाँ-तहाँ ऐसे बिखेरे हुए है. मानो कोई बच्चा किसी दुकानदार की शीशे की गोलियों के थैले से सारी गोलिया निकालकर जमीन पर बिखेर दी हो. मैं वो योद्धा हूँ जो हारने की चाह लिए युद्ध के मैदान में उतरता है परन्तु सामने वाला मुझे हराने की चाह में स्वयम हारते चला जाता है. मुझे लोगों की हार बर्दाश्त नहीं होती और ऐसे लोगो की हार तो कभी नहीं जो खुद को मर्यादित बताते हैं. अतः उनकी एक जीत की इच्छा लिए हमेशा उनसे लड़ता रहता पर अफ़सोस वो ह़र बार ही अपने अभिमान और खोखले आदर्शों से वशीभूत होकर अपनी ही तलवार अपने गर्दन पर मारते रहते हैं. आज पहली बार मुझे हार का सामना करना पड़ा हैं. अतः मेरे लिए यह जश्न मनाने का मौका है.

एक बुड्ढा, जो सागर की तरह गंभीरता, पर्वत की तरह स्वाभिमान, हवा की तरह चंचलता, सूरज की तरह तेज, चन्द्रमा की तरह शीतलता, नदियों की तरह गतिशीलता धारण किये हुए, जे जे मंच के नौजवानों के साथ-साथ छोटे-बड़े सबको अपने साहित्य, सेवा और सदाचार से प्रभावित किये हुए है. उसकी आकाश की तरह विशाल बाहें इस मंच के सभी ब्लागर्स को प्यार और भाई चारे के बंधन में जकड़े हुए और सिने से लगाये हुए है. वो हमेशा ही इस मंच पर हार कर जीतता रहता है और मैं ह़र बार ही उससे जीत कर हारता रहता हूँ. अतः मुझे भीख में मिली अपनी यह हार बर्दाश्त नहीं हुई. कई दिनों से उससे मिलने का मौका ढूंढ़ रहा था ताकि मैं देख सकू कि आख़िरकार क्या है उसके अन्दर जो वह हरबार ही मुझसे जीतता रहता है. इसी चाह में कल सुबह उसके कार्यालय जा धमका.

वह अपने केबिन से १०० कदम से भी अधिक दुरी चलकर मेरे स्वागत में खड़ा था. सहसा मेरे दिमाग में एक विचार आया, “लगता है बुड्ढा डर गया है”. यह सोचकर ज्योहीं उसकी तरफ बढ़ा, उसने अपने हाथ मेरे तरफ बढाकर मुझे अपने ह्रदय से लगा लिया. वो पल मेरी जीत थी या मेरी हार इसे आपसे बेहतर कौन समझ सकता है? मैं खुद को उससे अलग करते हुए बोला, “यहाँ ह्रदय से लगने नहीं बल्कि ह्रदय चीरने आया हूँ.” यह सुनकर उसने हँसते हुए कहाँ, “ठीक है नाती जी, पहिले चाय-पानी कर लीजिये. फिर मेरा ह्रदय भी चीर लीजियेगा.” बात तो सही थी परन्तु सहज नहीं. अतः मैं बोला, ” मेरी उम्र चाय पीने की नहीं, बल्कि दारू पीने की है.” यह सुनकर बुड्ढा एकदम तिलमिलाते हुए बोला, ” नाती जी, यह जागरण जन्शन नहीं है जहाँ आप चिल्लाते रहते हैं. यह नाना का कार्यालय है. इतनी मार पड़ेगी की आपका सारा नशा उतर जायेगा. आप बच्चे हो बच्चे की तरह रहो, बाप बनने की कोशिश मत करो.” इतना सुनकर तो बड़ो-बड़ो का नशा उतरना लाजिम है. तबतक नाश्ता आ चूका था और हम दोनों एक साथ नाश्ता करने में लग गए. नाश्ते के दौरान बस एक ही बात सोचता रहा कि इस बुड्ढे की हिम्मत कैसे हुई मुझे बच्चा कहने की. जबकि पिता श्री कहते हैं, “अलीन, तुम अब बच्चे नहीं हो जो बच्चों की हरकते करते फिरते हो. अभी शादी कर दिया जाय तो एक-आध दर्ज़न बच्चों के बाप बन जाओगे.” कितना फर्क है एक बाप और एक नाना होने में. परन्तु इसे एक बाप को कैसे समझाया जाय कि जब एक बच्चा बाप बन जायेगा तो बाप भी बाप नहीं बल्कि दादा हो जायेगा.

नाश्ता करने के बाद उसने अपने हाथ-पैर मेरे तरफ करते हुए कहाँ, ” अब जो तोड़ना-जोड़ना है तोड़-जोड़ लो नाती जी.” मैं उस समय बुड्ढे की हकीकत देखकर हैरान था जो पहिले से ही टुटा हो उसे क्या तोड़ना? हाथ और पैरों में गर्म पट्टिया पड़ी हुई थी ताकि पुरे शारीर में रक्त का संचार सुचारू रूप से हो सके. नहीं तो एक-कदम भी चलने की शक्ति उस बुड्ढे के पास नहीं थी. मैं तो बस यही सोचता रहा, मेरे लिए वह कैसे १०० कदम चल गया. इसके अलावा भी जाने कितने शारीरिक और मानसिक, सामाजिक और घरेलु समस्याएं फिर भी माथे पर चिंता की एक लकीर भी नहीं. फुल-सा मुस्कुराता हुआ चेहरा जिसके हौशले के आगे सारी मुश्किलें और उलझने दम तोड़ती रहती हैं. ह़र पीड़ा और दर्द खुद को उसके आगे असहाय पाती है. आज मुझे एक बात समझ में आ चुकी थी कि क्यों मेरी हार और उसकी जीत असली थी. आज मैं बहुत खुश हूँ कि आख़िरकार जे जे रणक्षेत्र में कोई तो ऐसा योद्धा मिला जिसके आगे मैं अपनी हरेक बाजी हारा हूँ. वरना यहाँ तो हारने की चाह में हारते ही आया हूँ. यह पहली बार है जब मेरे हारने की चाह जीत में तब्दील हो पायी. आज ख़ुशी के मारे मेरी आखें नम है. मुझे तो अबतक यकीन नहीं होता कि दुनिया भर के सारे गम लिए कोई इंसान इतना प्यार और खुशियाँ बाट सकता है……..क्या आपको यकीन है……………………?

एक बुड्ढे की हकीकत

चंद सिक्कों की खन-खनाहट पर
सैकड़ों कदमो की आहट देखी.
सच से मुँह मोड़कर,
पूजना बेजान पत्थरों को,
लोगो की यह एक अजीब सी चाहत देखी.
सुकून मिला है आज मेरे दिल को बहुत कि
एक बुड्ढ़े के चेहरे पर सच्ची
मुस्कुराहट देखी.

सुबह, २५/ ०५/२०१२ ……………… …………………………………………………………………………………………..अनिल कुमार, ” अलीन”

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