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नंगों की बस्ती में नंगापन, एक गुनाह!-खंड२

Posted On: 15 Apr, 2012 Others में

साधना के पथ परअद्य की स्याही

सूफ़ी ध्यान श्री

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अजय भैया जरा तम्बू से बाहर देखना सारे मर्यादित लोग इक्कट्ठा हुए या नहीं…..हाँ भैया जी, सभी एकत्रित हो चुके है….तो ठीक है आप मेरा आसन लगा दो. जी बिल्कुल
मेरी प्यारी बहनों और उनके प्यारे भाइयों!
पिछले दिनों हम कहा थे….
बाबा नहीं है ढोंगी है, यह तो मनोरोगी है!…… बाबा नहीं है ढोंगी है, यह तो मनोरोगी है!…..बाबा नहीं है ढोंगी है, यह तो मनोरोगी है!
संतोष भैया यह कौन बदतमीज है जो भैया जी के खिलाफ नारा लगा रहा है. इसे तम्बू के पीछे ले जाकर पेट भर प्रसाद खिलाना जरा. . ….अरे भैया यह तो शराफत चाचा के घर का चिराग है. शराफत चाचा लड़के की चाह में कुल तीन शादियाँ किये थे. बड़की चाची तो बेटी को जन्म देते देते मर गयी. बीचवाली चाची से कोई संतान ही नहीं हुई. छोटकी चाची का भी यही कुछ हाल था. लड़के की चाह में जाने कितने चौखट चूमने और कितने नदी-नाले नहाने के बाद छोटकी चाची ने एक लड़के को जन्म दिया. लोगों के सलाह पर चाचा ने उसका नाम चिराग रखा. कारण स्पष्ट है कि समाज के सामूहिक प्रयास से उनके घर में एक चिराग जला था. अतः लोगो की बात चाचा को तो माननी ही थी. आखिर वह एक सामाजिक प्राणी जो ठहरे. हमको आज तक इ समझ में नहीं आया कि चाचा की बेटी का क्या गलती थी जो उन्होंने उसके प्रेमी के साथ उसे जिन्दा दफ़न करवा दिए. जबकि एक औलाद की खातिर यही चाचा, चाची को जाने कितने घाट का पानी पिलवायें
हैं. इस पर शर्म करने के बजाय कल-तक शान से कहते फिरते थे कि मेरा चिराग है जो मेरे वंश को आगे ले जायेगा. अरे जब वह उनका खून ही नहीं है तो उनकी औलाद कैसी. चलो चाचा और उनकी बेटी तो रहे नहीं…… गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा...अरे भाई कोई हमें भी बताएगा कि क्या हुआ?…..स्वामी जी वो कल रात को शराफत चाचा का इंतकाल हो गया. .....तो भैया आप सभी उसे समझा-बुझाकर बैठा दो. वरना स्वामी जी फूंक देंगे तो बुझ जायेगा हाँ…हाँ….हाँ. अरे रहने दो भाई बोलने दो उसे. अजय भैया यह सब कैसे हो गया. कल सुबह में सुनने में आया था कि चाचा जी ठीक हो चले हैं. भैया जी आप बिल्कुल सही सुने थे. वह क्या है कि कल रात को अस्पताल के चौथी मंजिल पर चाचा जी किसी नर्स को अपनी बाँहों में जकड़ना चाह रहे थे. उसने खुद को बचाने की खातिर चाचा जी को झटका दे दिया. परिणाम स्वरुप चाचा जी चौथी मंजिल से सीधे जमीं पर आ गिरे. गिरने के साथ ही उनका प्राण पखेरू ऐसे निकला मानों कोई तोता वर्षों की मेहनत के बाद पिंजड़ा तोड़कर भागा हो. हाँ…हाँ…..हाँ…..! …..का रे चिरागावा फिर अनुज को दोष काहें दे रहा है. ससुर के नाती यही पर उठाकर पटक देंगे. मछली के माफिक छट-पिटाकर मर जाओगे. अरे दिनेश भैया कितनी बार बोला हूँ कि क्रोध को पालना सीखिए और व्यक्ति के खिलाफ मत जाइये. पर आप हो कि कुछ सुनते ही नहीं हो, रह-रह कर उत्तेजित हो जाते हैं. अनुज कोई तुम्हारे बारे में एक शब्द भी बोले हम बर्दाश्त नहीं कर सकते. अरे भाई यदि भारत भूमि पर यही जज्बा व्यक्ति विशेष के विरुद्ध न होकर बुराई के विरुद्ध रहा होता तो यह स्वर्ग-सा सुन्दर धरती नरक क्यों बनती. शांतिः…शांतिः…लगता है आज भी आप लोग मेरा प्रवचन ख़त्म नहीं होने दोगे. चाचा जी को शमशान का रास्ता भी तो दिखाना है. दिनेश भैया एक काम करिए. आप महिलाओं में अफवाह फैला दीजिये कि स्वामी जी बहुत जगता है. फूंक देते हैं तो बाँझ महिलाएं गर्भवती हो जाती हैं. साथ ही शहर जाकर ५-६ हट्टे-कट्टे बेरोजगार नौजवानों को किराएँ पर ले लीजियेगा. अनुज महिलाओं की बात तो समझ में आ गयी. परन्तु हट्टे-कट्टे नौजवान की क्या आवश्यकता है? जबकि तुम तो अहिंसावादी हो. दिनेश भैया हम दोनों को एक ही पिता ( सामाजिक कुरीति ) ने जन्म दिया है. फिर भी स्वामी की कुर्सी पर आपका अनुज विराजमान है कुछ तो कारण होगा. आप भले ही इन नौजवानों की आवश्यकता न समझ पायें हो. परन्तु सामने वाले सब कुछ समझकर मंद-मंद मुस्कुराएँ जा रहे हैं और साथ ही मनोकामना कर रहे हैं कि काश! स्वामी जी के साथ माताओ और बहनों की सेवा करने का मौका हमें भी मिलता तो कुछ मेवा हम भी खा लेते. अनुज को ज्यादे मुँह नहीं लगाते भैया. अब आप जाइये जैसी विनती किया हूँ वैसा ही करिए. अजय भैया और संतोष भैया आप दोनों मेरे साथ चाचा जी के अंतिम यात्रा में शमशान घाट चलिए. भैया देखों हमारे जाने की बात सुनकर अबोधावा क्यों रोने लगा. जी भैया अभी देखता हूँ. क्या हुआ बेटा ? क्यों रो रहे हो ? वो कहानी…..अच्छा मेरा बाबु कहानी सुनेगा. भैया जी वो आज भी आप नंगो की कहानी शुरू नहीं कर पायें न….उसी को सुनने के लिए रो रहा है. उसे मेरे पास लाओ. बेटा रोना बुरी बात है. अच्छे बच्चे रोया नहीं करते तुम्हें नंगों की कहानी सुननी है न तो हम जरुर सुनायेंगे. शराफत चाचा को ठिकाने लगाकर आता हूँ तो आपको कहानी जरुर सुनायेंगे. तबतक यह लोलीपॉप आप खाते रहिये. ठीक है न ….हम अभी आते हैं और आँखों में आंसू बिल्कुल नहीं आना चाहिए क्योंकि आप इस देश के भविष्य हो. जो कहानी मैं अधूरी छोडूंगा कल उसे आपको पूरी करनी है. है न…अब चलिए अच्छे बच्चों की तरह मुस्कुराइयें. हाँ…हाँ…हाँ…ही..ही…ही...यह हुई न बात.
भाई आप सभी जल्दी चिता को मुखाग्नि दीजिये. भैया जी पंडी जी देर कर रहे है. बोल रहे है कि मुखाग्नि से पहिले २५ ब्राहमण को भोजन, एक गाय, एक तोला सोना, ५ हजार रूपये का संकल्प करना पड़ेगा. तभी चाचा जी के आत्मा को शांति मिलेगी. वरना इनकी आत्मा इस मृत्यु लोक में बिना-अन्न जल के भ्रमण करती रहेगी और युगों-युगों तक मुक्ति नहीं मिलेगी. ठीक हैं पंडी जी को बोल दीजिये कि जब चाचा को शारीर से मुक्त कर दिए तो इस संसार से भी मुक्त कर देंगे. उनकी कोई आवश्यकता नहीं है. भैया जी पंडी जी बोल रहे है कि आप गलत कर रहें है और इसके लिए आपको नरक मिलेगा. ठीक है पंडी जी को बोल दीजिये कि वही अच्छा करके स्वर्ग में जाएँ हमें तो नरक में ही जाना है…… अरे भैया पंडी जी तो सचमुच नाराज होकर चले गए. अब कैसे क्या होगा. अरे हम है न आप सभी चिंता मत करिए. चाचा जी को स्वर्ग तक हम पहुंचाएंगे. भाई चिराग अब मुझसे नाराजगी छोड़ों चाचा जी की मुक्ति का सवाल है. बाद में मेरे खिलाफ नारे लगा लेना.
अरे अजय भैया, चाचा जी की इज्जत दिखाई नहीं पड़ रही. हम कुछ समझे नहीं भैया जी. अरे भाई  हम धोती और पगड़ी की बात कर रहें. भैया शराफत चाचा की इज्जत को तो पंडी जी उतारकर ले गए. यह कैसे हो सकता. चाचा जी की जीवन भर की पूंजी को ऐसे कैसे ले लेंगे. पंडी जी को दौड़कर पकड़िये और चाचा जी की लुटी हुई इज्जत को वापस लेकर आइये. आखिर शराफत चाचा भगवान के पास किस मुंह से जायेंगे. अभी पंडी जी को दौड़ा कर पकड़ता हूँ.  दौडिए पंडी जी! देखते हैं कितना दौड़ते है आप. आज तो दौड़कर आपकी जान ले लेंगे. बहुत जिन्दों और मुर्दों को खा चुके हैं आप. ए…………..हा पकड़ा गए. हम कुछ भी वापस नहीं करेंगे, ब्राहमण को देने के बाद वापस नहीं लिया जाता. नहीं तो मरने के बाद कीड़े पड़ते हैं. पंडी जी हम कह रहे हैं कि चुप-चाप चाचाजी की इज्जतियाँ वापस कर दीजिये नहीं तो यही पर पटक कर चढ़ जायेंगे और आप जिंदगी भर इहाँ पड़े-पड़े कीड़े ही निकालते रह जायेंगे. देता हूँ भाई! मैं तो मजाक कर रहा था,  इ लो! लीजिये भैया जी ….अरे हमको नहीं चाचा जी को वापस दीजिये और चाचा जी से माफ़ी मांगिये. भैया जी हम उनकी इज्जत थोड़े न उतारे हैं कि हम माफ़ी मांगे! अरे भाई, यह हमारी परंपरा है कि यदि किसी की इज्जत उतर रही हो तो उसकी इज्जत की रक्षा के लिए खून की नदियाँ बहा देते हैं. इतना सबकुछ जानने के बाद भी आप चाचा जी की इज्जत उतरने दिए तो गुनाहगार हुए की नहीं. समझ गया भैया जी अभी चाचा जी से दंडवत प्रणाम कर माफ़ी मांगते है. चाचा जी हमको माफ़ी देई दो..ऊं अज्ञानता बस आपकी इज्जत उतरता देखते रहे…..ठीक है-ठीक है, कोई बात नहीं अब रोना बंद करों. रे चाचा जी आप जिन्दा है. अरे भाई चाचाजी नहीं बोल रहे हैं. वह तो हम हैं. जल्दी उठो और इनकी अंतिम क्रिया-कर्म की तैयारी करो. चिराग भाई चाचा जी को मुखाग्नि दो और उसके बाद चिते को आग दो. तो बंधुओं जीवन के इस आखिरी पड़ाव और सबसे बड़े सत्य पर आइये ईश्वर की प्रार्थना के साथ हम सभी एक संकल्प लेते हैं. चूँकि शुरू से लेकर आजतक हम हकीकत को अस्वीकार कर अज्ञान, डर और स्वार्थ से जन्मे तथ्य को ईश्वर मानकर पत्थरों और अंधविश्वासों को पूजते आयें है और साथ ही ईश्वर का तिरस्कार और अपमान करते आये हैं. तो आगे भी हम इसी परंपरा का निर्वाह करेंगे. कहा गया है कि मानो तो देव नहीं तो पत्थर. तो अपनी इस श्रधा और भक्ति को आगे बढ़ाते हैं और मान लेते हैं कि सामने दहकती हुई चिता ईश्वर हैं. आप सभी अब आँखें बंद करिए और मेरे साथ ईश्वर से प्रार्थना कीजिये…


दहकते हुए प्रभु हमारे, भाग्य उज्जवल कीजिये,

शुरू कर दे छल-कपट को, बस इतना वर दीजिये.

धर्म के नाम पर सदा अधर्म हम करते रहें

राम-रहीम के खातिर जीवन पर्यंत लड़ते रहें.

धन-बल के लिए दुर्गा लक्ष्मी का सम्मान हो,

और उसी के दम पर, अत्याचार व बलात्कार हो.

भूखे-प्यासे लोग सभी बाजारों में मरते रहें,

हम खुदगर्ज़ महलों में अपना पेट भरते रहें.

समाज के हितैषी सब, समाज अहित करते रहे,

अगर कोई आये रास्ते में, उसको चित करते रहे.

नियम-कानून की आड़ में अपन धंधा चलता रहे,
हराम की कमाई से हमारा बाग़ फूलता फलता रहे

चंद सिक्कों की खातिर कलम अपनी बिकती रहे,

और दम तोड़ती मानवता सड़को पे सिसकती रहे.

दंडवत प्रणाम कर, हम प्रार्थना यह कर रहे,

मान-मर्यादा और धर्म से स्वार्थ पूर्ति होती रहे.

अब आप सभी आँखें खोलिए. चूँकि चिता अब शांत होने वाली है. अतः चाचा जी की आत्मा की शांति के लिए. हमारे साथ आप सभी एक मंत्र का उच्चारण कीजिये……
ओह्म दयौं शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथिवी शांतिरापः
शांतिरोषधयः शांतिः! वनस्पतयः शांतिः र्विश्वेदेवाह
शांतिर्ब्रम्ह शांतिः सर्वं शांतिः शान्तिरेव
शांतिः सा मा शान्तिरेधि!

!!ओह्म शांतिः शांतिः शांतिः !!

इसी के साथ चाचा जी के आत्मा को शांति मिल चुकी है. आप सभी अपने घर को जाएँ. अगला प्रवचन फिर ४-५ दिनों के बाद शुरू होगा और यदि कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं हुआ तो हम नंगो की कहानी आप को जरुर सुनायेंगे.
तब तक के लिए..
!!ओह्म शांतिः शांतिः शांतिः !!

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