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मुझ जैसा गुरु या फिर गुरु जैसा मैं......1

Posted On: 13 Sep, 2012 Others में

साधना के पथ परअद्य की स्याही

सूफ़ी ध्यान श्री

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मुझ जैसा गुरु या फिर गुरु जैसा मैंगुरु एक ऐसा शब्द जो भारतीय दर्शन, संस्कृति और समाज में एक विशिष्ट स्थान रखता है. जिसे ज्ञान, विज्ञानं, ध्यान और भगवान तक पहुँचने का आरम्भिक और आखिरी सीढ़ी माना जाता है. पर सवाल यह उठता है कि क्या गुरु मानने पर आधारित है या फिर भारतीय समाज में इसका वही स्थान है जो भारतीय दर्शन और संस्कृति में नीहित है. गुरु का मिलना एक विशिष्ट घटना है जो हमें एक शारीर प्राप्त करने और फिर उसे छोड़ने तक घटित होती है. मैं समझ सकता हूँ कि मेरी बाते आप सभी को कुछ अजीब लग रही होगी. आगे इसे अगले पोस्ट ( मुझ जैसा गुरु या फिर गुरु जैसा मैं -२ ) में स्पष्ट करना चाहूँगा. फिलहाल यदि भारतीय समाज का विश्लेषण किया जाय तो हम पाएंगे कि अक्सर यहाँ गुरु को नज़रन्दाज और तिरस्कार करते हुए किसी विशेष को गुरु बनाया जाता है. किसी ऐसे को जो हमारे स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व से जुड़ा हुआ हो या फिर हम यह विश्वास रखते हैं उसके प्रति कि उसकी कृपा से हमारा स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व हमें हाशिल है या फिर हाशिल होगा. क्या सचमुच वो गुरु है जो हमारे स्वार्थ, वर्चस्व और सत्ता से जुड़ा है. जहाँ यह तीनों का स्थान हो वहां गुरु का तो कोई स्थान ही नहीं. इस प्रकार भारतीय समाज गुरु को भारतीय दर्शन और संस्कृति से खंडित करते हुए अपने स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व के लिए पारम्परिक और व्यवहारिक करता आया है. एक तरफ हम कहते हैं कि गुरु का स्थान भगवान् से ऊपर है, वह ज्ञान का स्रोत है और वह एक सच्चा मार्ग दर्शक है. वही दूसरी तरफ हम गुरु किसी ऐसे शख्स को बनाते हैं जिससे हमारा स्वार्थ, वर्चस्व और सत्ता सिद्ध होती रहती या फिर जिससे स्वार्थ, वर्चस्व और सत्ता के होने का भ्रम बना रहता है. जबकि सत्य यह है कि समय और परिस्थितियों के साथ-साथ गुरु और उसका ज्ञान सदैव एक नए रूप में हमारे जीवन में घटित होते रहते हैं. परन्तु यह हम पर निर्भर करता है कि हम इन दोनों को कैसे लेते हैं. क्योंकि गुरु और ज्ञान कितना भी मिल जाएँ हम अपने मन की सीमा के पार नहीं जा सकते. यदि ऐसे में हम मानसिक रूप से स्वार्थी और अभिमानी है तो बहुत मुश्किल हो जाता है, गुरु और ज्ञान दोनों को पहचानने में. इस प्रकार हम हरेक समय और परिस्थिति में गुरु उसी को बनाते हैं जिससे हमारा स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व सिद्ध होता रहता है. इस प्रकार हम जीवन भर गुरु के पाने की गलत फहमी पाले हुए उसके होने का झूठा दंभ भरते रहते हैं. ऊपर से गलत फहमी और अन्धविश्वास पाले हुए जीना …गुरु के सच्चे और झूठे होने की. जबकि वह तो सच और झूठ से परे है.
मुझ जैसा गुरु या फिर गुरु जैसा मैंहममे से बहुत लोग भारतीय दर्शन और संस्कृति का बेहतर ज्ञान रखते होंगे. फिर भी अपने स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व वश किसी ऐसे शख्श या विचारधारा को गुरु बनाते हैं जिससे उन्हें इन तीनों की पूर्ति होती है. जो दर्शाता अज्ञान, अभिमान, अंधविश्वास और मुर्खता को जिससे गुरु के होने का कोई सम्बन्ध ही नहीं. हममे से कुछ लोग जिन्हें भले ही भारतीय दर्शन और संस्कृति का ज्ञान नहीं है. परन्तु वो हरेक पल इस वातावरण से कुछ कुछ नया सीखते हैं और उनके विचारों में एक प्रवाह हैं..साथ ही वह आभारी हैं इस पूरी कायनात के जिससे आये दिन कुछ नया सीखते हैं. जो स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व से कहीं ऊपर है. यह दर्शाता है गुरु के घटित होने का. गुरु का होना और न होना दोनों ही हमारे स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व से परे की घटना है. जिसे समझने और जानने के लिए हमें अपने आँख, कान, नाक, त्वचा इत्यादि इंदियों के साथ-साथ अपने मस्तिष्क को हमेशा खुला रखना होगा. इससे भी कहीं ज्यादा वातावरण द्वारा दिए गए सन्देश को उसी रूप में समझने की चेतना रखनी होगी……..हमें मानसिक और बौद्धिक चेतना विकसित करनी होगी कि……….हम खुद जैसा गुरु चाहते हैं या फिर गुरु जैसा …………………( क्रमशः )

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