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हम दोनों के बीच में इतना सबकुछ; कुछ भी तो नहीं

Posted On: 26 Jun, 2012 Others में

साधना के पथ परअद्य की स्याही

सूफ़ी ध्यान श्री

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तुम, तुम नहीं और मैं, मैं नहीं और हम दोनों के बीच में इतना सबकुछ; कुछ भी तो नहीं सिवाय तुम्हारे इच्छाओं और अवधारणाएं के जो तुमने पाल रखी है. तुमने अपने अन्दर के स्वार्थ, अज्ञानता और डर वश जो अवधारणाएं मेरे प्रति विकसित की है उसका न तो मेरे साथ और न ही तुम्हारे साथ कोई सारोकार है. कभी मेरी बातों पर गौर करना तो तुम पाओगे कि तुम्हारा प्रयास न तो मुझ तक पहुचने का है और न ही खुद तक. यह सब कुछ तुम अपनी स्वार्थ, अज्ञानता और डर वश किये जा रहे हो. तुम्हारी सोच और इच्छाओं का परिणाम है तुम्हारा आज, अतीत और आने वाला कल न कि तुम्हारा या मेरा. कभी तुमने सोचा है जो धर्म तुमने विकसित किया है वह तुम्हारे उद्देश्य के अनुरूप है या नहीं. पहले तुम निश्चित हो जाओ कि इससे तुम मुझे बाँधना चाहते हो या खुद को या फिर अपनी इच्छाओ को. मैं नहीं समझता कि आदि से अब तक तुम हम तीनों में से किसी एक को बाँधने की कोशिश किये. तुम कहते तो आये हो कि तुम्हारा प्रयास इच्छाओं या खुद को बाँधने की रही है पर हकीकत तो यह है कि तुमने सिर्फ परिणाम को बाँधने की कोशिश की है न कि इच्छाओ या खुद को. जहाँ तक मुझे बाँधने का सवाल है तो मुझे बाँधना वैसे ही हैं जैसे बारिश की एक बूंद का सागर की गहराई नापना जो सागर में मिलते ही अपना अस्तित्व खो बैठता है. ऐसे में तुम का होना इंगित करता है कि तुम एक झूठ के सिवाय कुछ नहीं. जिस दिन तुम अपनी सोच और इच्छाओं को बाँधने में कामयाब हो जाओगे उस दिन तुम्हारे और मेरे बीच का सारा अंतर ख़त्म हो जायेगा. यहाँ तक की काल( समय ) का भी बोध नहीं रह जायेगा और इस प्रकार जो कुछ तुम्हारे आस-पास दिख रहा है सब काल मुक्त हो जायेगा. फिर तुम्हारा और मेरा पृथक होना कुछ बेईमानी सी नहीं लगती. तुम अपने स्वार्थ, अज्ञान और डर को छोड़ते हुए अपनी मान्यताओ से दूर तुम्हारे पास आओ, तुम जो विचारों की सीमायें अपने चारों तरफ बना रखे हो उससे बाहर आओ. मैं देख रहा हूँ कि तुम अब भी तुम की बजाय मेरी तलाश में लगे हो जो कि मेरे प्रति तुम्हारा स्वार्थ है, अज्ञान है या फिर डर; वहां मैं कहाँ, कहीं भी तो नहीं जैसा तुमने सोच रखा है. तुम्हारी अवधारणाओं, मान्यताओं और तुम्हारी सोच से कोशों दूर हूँ. हानि-लाभ, धर्म-अधर्म, अपना-पराया, पाप-पुन्य, स्वर्ग-नरक, व्यवस्था-अव्यवस्था इत्यादि यह सब क्या है? यह सब तुम्हारे मन की ऊपज है और यह सब तुम्हारा खेल इसी ऊपज को नियंत्रित करने की है. फिर क्या तुम्हें लगता है कि अपने मन को खुला छोड़कर इसकी ऊपज को नियंत्रित करने की तुम्हारी नाकाम कोशिश कभी कामयाब हो पायेगी.
सच तो यह है कि तुम्हारी कोई कीमत ही नहीं फिर बेशकीमती होने का सवाल ही कहाँ उठता. सामने चाय की एक प्याली है उसे उठाओ और अपनी आखें बंद करके उसे अपने होठों से लगाओ और सबकुछ भूल जाओ……………………..हम दोनों के बीच में इतना सबकुछ;  कुछ भी तो नहीं

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