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अखिलेश के मुकाबले कोई दूसरा चेहरा कहाँ है?

Posted On: 15 Nov, 2016 Politics में

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mithilesh2020

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उत्तर प्रदेश में चुनाव नजदीक आ गए हैं और हर एक पार्टी लगी हुई है वोटर्स को लुभाने में, किन्तु अन्य पार्टियों के नेता जहाँ तमाम प्रयासों के बावजूद चर्चा बटोरने की जद्दोजहद ही कर रहे हैं, वहीं अखिलेश पिछले महीने भर से अख़बारों की हेडलाइन बन रहे हैं. सच कहा जाए तो अखिलेश को मिल रहे समर्थन और जनता की नजदीकी से दुसरे नेताओं को जलन हो रही होगी. घटनाक्रम में आगे देखते हैं तो समाजवादी पार्टी का बहुप्रतीक्षित रजत जयंती वर्ष के कार्यक्रम की खूब चर्चा हुई है. बीते 5 नवम्बर को सपा अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रही थी, इस अवसर पर पुराने समाजवादी नेता एक मंच पर उपस्थित थे तो भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश की सत्ता से दूर रखने के वादे और दावे किए जा रहे थे, पर इस कार्यक्रम में जो सबसे अलग बात दिखी वह था अखिलेश का आत्मविश्वास! पिछले दिनों समाजवादी पार्टी में मची उथल-पुथल से बेपरवाह यह नेता आने वाले चुनाव को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त दिखा तो, एक-एक शब्द पर जोर देकर बोला गया उनका वक्तव्य आत्मविश्वास की नई कहानी गढ़ रहा था. आखिर हो भी क्यों ना, मात्र दो दिन पहले समाजवादी पार्टी की विकास रथ-यात्रा में तकरीबन 20 लाख कार्यकर्ताओं का जुड़ना कोई साधारण बात तो नहीं थी! हालांकि मर्सीडीज़ कंपनी द्वारा बनाया गया रथ, पहले दिन की यात्रा शुरू होने के कुछ समय बाद ही खराब हो गया था, पर इससे अखिलेश को जरा भी फर्क पड़ा हो ऐसा लगा नहीं! रथयात्रा तुरंत ही रोड शो में बदल गई और जिस तरह से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कार्यकर्ता स्वागत कर रहे थे, वह अपने आप में अभूतपूर्व था! राजनीतिक विश्लेषक आश्चर्यचकति दिखे कि वह नेता भी अखिलेश यादव के पीछे पूरे जोश-ओ-खरोश में खड़े दिखे, जिन्हें समाजवादी पार्टी से कुछ ही दिन पहले निष्काषित किया जा चुका है. साफ है कि अखिलेश की अपनी फैन फॉलोइंग बेहद तेजी से आगे बढ़ी है और इस बात को युवा सीएम ने बखूबी भांप भी लिया है.

Akhilesh vs Others in UP Election 2017, Hindi Article, New, Rath Yatra, Political Article

पिछले दिनों तमाम चुनाव पूर्व हुए सर्वे यही दिखला रहे हैं, जिसमें समाजवादी पार्टी में मची हलचल के बावजूद अखिलेश यादव को सबसे लोकप्रिय सीएम के रुप में प्रस्तुत किया गया है. इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अगर प्रदेश का मुख्यमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति की तर्ज पर चुना जाना होता तो उसमें अखिलेश निश्चित रूप से बाजी मार ले जाते. उनके सामने ना तो बसपा की मायावती, ना भाजपा के आदित्यनाथ या वरुण गांधी और तो और खुद उनके पिता मुलायम सिंह यादव लोकप्रियता के मामले में अखिलेश के सामने कहीं ठहर नहीं रहे हैं. यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि पिछले 4 सालों तक अखिलेश ने एक ट्रेनी मुख्यमंत्री के रूप में हर वह चीज सीखी है जिसे राजनीति में आवश्यक माना जाता है. कई लोग अब तक शिकायत करते रहे थे कि प्रदेश में साढ़े तीन मुख्यमंत्री हैं या साढ़े चार मुख्यमंत्री हैं, किंतु उचित समय आने पर अखिलेश ने यह साबित कर दिया कि प्रदेश में केवल एक ही मुख्यमंत्री है, और वह अखिलेश यादव ही हैं. इस रास्ते में जो कोई भी आया, उसकी परवाह किए बिना अखिलेश अपने रास्ते पर चले गए और सबसे बड़ी बात तो यह है कि अखिलेश के इस कदम का जनता ने पूरी तरह से स्वागत किया है. राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई को अखिलेश अब साबित कर चुके हैं और सपा कार्यकर्ताओं के मन मस्तिष्क में सिर्फ उन्हीं का चेहरा है. चुनाव परिणाम जब आएंगे, तब आएंगे किंतु अब की जमीनी सच्चाई यही है कि प्रदेश में चुनाव प्रचार का एजेंडा अखिलेश ही तय कर रहे हैं. अखिलेश रथ-यात्रा शुरू कर रहे हैं तो आनन-फानन में भाजपा की परिवर्तन यात्रा शुरू हो रही है. अखिलेश के ऊपर प्रतिक्रिया देकर ही मायावती अपने चुनाव अभियान का श्रीगणेश कर रही हैं. वैसे भी मायावती ने अगली पीढ़ी के किसी चेहरे को आगे नहीं किया है और खुद उनका चार्म जनता में लगातार कम हो रहा है.

कांग्रेस पार्टी भी अपने रणनीतिकार प्रशांत किशोर के माध्यम से अखिलेश पर ही दांव लगाना चाहती है. सुना गया कि कांग्रेस के चुनावी प्रबंधक अखिलेश से मिलने के लिए लखनऊ में कई दिन तक डेरा डाले रहे, हालाँकि सीएम से उनकी मुलाकात हो न सकी. खबरे तो यह भी बाहर आ रही हैं कि नीतीश से लेकर अजीत सिंह तक अखिलेश को सीएम चेहरे पेश किये जाने पर ही गठबंधन के लिए तैयार होंगे. जाहिर है कि यूपी चुनाव के केंद्र में अखिलेश यादव ही हैं. समाजवादी पार्टी के बारे में बेशक कहा गया उसमें कई लोग मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं या वाद-विवाद है, किंतु जिस तरह से पार्टी के रजत जयंती समारोह में अखिलेश का स्वागत किया गया और उनकी हर बात पर तालियां बजी, उसने काफी कुछ स्वयं ही कह दिया. खुद सपा के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने भी कहा कि अखिलेश प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं और वह जो कुछ भी आदेश देंगे, उसे पूरी तरह से लागू किया जाएगा. यह सभी घटनाक्रम अपने आप में इस बात का द्योतक है कि अखिलेश चुनावी अभियान में काफी आगे बढ़ चुके हैं. सपा के रजत जयंती समारोह में अखिलेश ने संयमित, मगर जिस दृढ़ता से अपनी बात रखी, वह आने वाले दिनों में उनके लिए बेहद सकरात्मक संदेश ला सकता है. लोगों को संबोधित करते हुए अखिलेश ने इस सभा में कहा में सपा के प्रेरणाश्रोत राम मनोहर लोहिया का ज़िक्र करते हुए विचारों की अहमियत बतायी. अखिलेश ने आगे खुलकर कहा कि ‘अगर उनकी कोई परीक्षा लेना चाहता है, तो वह सहर्ष परीक्षा देने को तैयार हैं.’

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रजत जयंती कार्यक्रम की शुरुआत में अखिलेश को तलवार भेंट की गयी थी और उसी का उदाहरण देते हुए अखिलेश ने आने वाले दिनों की तस्वीर खींच दी है कि समाजवादी पार्टी में निर्णय लेते समय उनकी उचित बात अनसुनी नहीं की जा सकती और अगर वह मुख्यमंत्री बनते हैं, तो एक मजबूत मुख्यमंत्री रहेंगे. कहा जा सकता है कि पार्टी के अंदरखाने इससे कार्यकर्ताओं में जोश उत्पन्न हुआ है, जो सपा के लिए चुनाव में वरदान साबित हो सकता है. इसके अतिरिक्त, निश्चित रूप से प्रदेश की जनता में यह एक सकारात्मक संदेश प्रेषित हुआ है कि अब ‘अखिलेश मॉस लीडर के रूप में उभर गए हैं’. देखना दिलचस्प होगा कि तमाम सुगबुगाहटें क्या गुल खिलाती हैं, किन्तु अभी इस बात में दो राय नहीं है कि मामला अखिलेश के पक्ष में ज्यादा झुका नजर आ रहा है. अक्टूबर महीने के आख़िरी दिनों में कराए गए एक सर्वे जिसे मशहूर न्यूज वेबसाइट हफिंगटन पोस्ट ने कराया था, उसके अनुसार 403 विधानसभा क्षेत्रों में 12221 लोगों के मत के आधार पर अखिलेश यादव का नाम सीएम के लिए 83 फीसदी लोगों ने लिया. इस सर्वे में गौर करने वाली बात यह भी रही कि अखिलेश सपा के पारंपरिक वोटरों की सीमा भी मांगते लांघते  दिख रहे हैं. इसी सर्वे में मुलायम से तुलना की बात रखे जाने पर 55 साल से ज्यादा उम्र वाले 70 फीसद लोग अखिलेश को पसंद करते दिखे. बताते चलें कि जिन लोगों के बीच सर्वेक्षण किया गया उनमें से 68 फीसदी लोगों का मानना है कि अखिलेश समाजवादी पार्टी को गुंडा छवि से बाहर निकालने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. खास बात यह भी कि अक्टूबर के पिछले महीने, यानी सितंबर में किए गए सर्वेक्षण के दौरान जिस तरह के लोग ‘नहीं कह सकते’ या ‘कोई राय नहीं’ का ऑप्शन चुन रहे थे, वह भी अखिलेश के साथ जुड़ रहे हैं. हालाँकि, जनता का फैसला आने तक राजनीतिक पार्टियां चुनाव मैदान में जुटी रहेंगी और दावे-प्रतिदावे करती रहेंगी, पर उन सभी दावों-प्रतिदावों पर अखिलेश अकेले भारी दिख रहे हैं, इस बात में दो राय नहीं!

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