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पुस्तक ज्ञान: एक हिंदुस्तानी की नजर से यूरोप दर्शन

Posted On: 9 Aug, 2015 Others में

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डॉ. विनोद बब्बर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. उनकी अनेक किताबें हम सब पढ़ चुके हैं. आज के मोबाइल इंटरनेट के ज़माने में जहाँ हिंदी साहित्य की समृद्ध विधाओं में शुमार ‘यात्रा-संस्मरण’ लुप्त होते जा रहे हैं, वहीं डॉ. बब्बर का लिखा ‘इंद्रप्रस्थ से रोम’ तक नामक यात्रा-संस्मरण एक सराहनीय प्रयास है. मेरी दृष्टि में इसे सिर्फ एक यात्रा-संस्मरण कहना इस कृति के साथ अन्याय होगा, बल्कि आज के समय में जब तमाम युवा अपनी मातृभूमि से पलायन कर जाते हैं और अपना सामर्थ्य भारत के अतिरिक्त किसी अजनबी देश में लगाते हैं, तब एक ‘हिंदुस्तानी की नजर से यूरोप दर्शन’ का वर्णन उनके हृदय में निश्चय ही मातृभूमि के प्रति प्रेम को अंकुरित करेगा और जिन हृदयों में यह प्रेम, अर्थ-युग में दब गया है, उस पर जमी धुल को हटाने का कार्य करेगा. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पुस्तक के कुल 9 लेखों, जिनमें यूरोप के नौ प्रमुख शहरों/ देशों का विभिन्न प्रकार से चित्रण किया गया है, उन सभी लेखों में लेखक ने भारतीयता का भावात्मक अहसास जोड़ने का सार्थक प्रयास किया है. लन्दन, पेरिस, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, वेनिस, रोम, वेटिकन सिटी, पीसा, मिलान जैसी यूरोपीय पहचानों का वर्णन करते हुए लेखक ने प्रत्येक लेख में, बल्कि मैं तो कहूँगा हर एक पन्ने में भारतीयता के अहसास को सजीव बनाने की पुरजोर कोशिश की है. नवशिला प्रकाशन, नांगलोई, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक, उन दुसरे लेखकों के लिए करारा जवाब है, जो यूरोप इत्यादि देशों का वर्णन करते हुए भारत-भूमि के स्वाभिमान को दांव पर लगाने से परहेज नहीं करते हैं, जबकि इस पुस्तक में आपको व्यक्ति, संस्कृति, स्थान इत्यादि अधिकांश चीजों में लेखक द्वारा भारतीय परिदृश्य में तुलना प्रस्तुत नजर आएगी. हाँ! लेखक ने साफगोई से कई जगहों पर उनको बेहतर बताया है तो कई जगहों पर हमारी संस्कृति इसी पुस्तक में बेहद उम्दा नजर आएगी.

इस पुस्तक की भूमिका सुविख्यात साहित्यकार डॉ.भगवतीशरण मिश्र (पूर्व आईएएस) द्वारा लिखी गयी है, जिन्होंने शुरुआत में ही कहा है कि यह पुस्तक एक सशक्त यात्रावृत्त है. इस पुस्तक की एक और खूबी डॉ.मिश्र द्वारा इसी भूमिका में कही गयी है कि ‘संक्षिप्तता चातुर्य की जननी है’, जिसका दर्शन इस पुस्तक में होता है. एक और विख्यात प्रोफ़ेसर और ना.ए.सो. सायंस कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.अरुणा शुक्ल द्वारा इस पुस्तक के रोचक, प्रभावी और मर्मस्पर्शी होने का संकेत शुरुआत में ही मिल जाता है. डॉ.विनोद बब्बर अपनी भूमिका में इस विश्व को एक विश्वविद्यालय तो साहित्यकार को मधुमक्खी बताते हुए अपनी मंशा शुरू में ही स्पष्ट कर देते हैं, जिसकी पुष्टि आगे के सभी लेखों में एक-एक करके होती चली जाती है.

स्थानों के वर्णन से पहले पुस्तक में यूरोप के भूगोल और इतिहास के बारे में संक्षित्प जानकारी दी गयी है और इसके बाद औपचारिक पहले अध्याय, जिसका शीर्षक ‘टेम्स नदी के तट पर बसा लन्दन है’ की शुरुआत की गयी है. लेखक ने इस शहर और ग्रेट ब्रिटेन के ऊपर ज्ञानवर्धक जानकारी पेश की है, जैसे ब्रिटेन 410 ई. तक रोमन प्रान्त रहा था और इसी युग में ही इसकी उन्नति का अध्याय आरम्भ हो चूका था, जैसे सड़कों का निर्माण, विधिसंहिता का प्रचलन, खानों की खुदाई, कृषि उत्पादों में वृद्धि इत्यादि. आज के आधुनिक लन्दन का तब शुरूआती नाम प्रमुख व्यापारिक नगर के रूप में लंदिनीयम था. यू.के., यानि यूनाइटेड किंगडम चार छोटे देशों इंग्लैण्ड, वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड से मिलकर बना है और इस देश में लन्दन के अतिरिक्त बर्मिंघम और मैनचेस्टर प्रमुख नगर हैं. भाषा के रूप में अंग्रेजी और मुद्रा पौंड स्टर्लिंग स्वीकृत है. लन्दन में घूमने योग्य जगहों में यहाँ का सबसे बड़ा मंदिर श्री स्वामिनारायण मंदिर प्रमुख है, जबकि यहाँ के उद्यान और बगीचे अपनी सुंदरता और स्वच्छता के लिए विश्व प्रसिद्द हैं. लन्दन के अन्य प्रमुख स्थलों में बकिंघम पैलेस, कामनवेल्थ इंस्टीट्यूट, टावर ऑफ़ लन्दन, लन्दन संग्रहालय, विक्टोरिया संग्रहालय, लन्दन ब्रिज और सेंट पॉल चर्च का नाम लेखक ने उद्धृत किया है. लन्दन में लेखक को जिस चीज ने सर्वाधिक प्रभावित किया है, वह टेम्स नदी की सफाई और उससे जुड़ा जनांदोलन हैं. भारत की नदियों के प्रति चिंतित लेखक भारतीय नेताओं और आम जनमानस को लंदनवासियों और टेम्स की सफाई से सीधे-सीधे जोड़ता है. यहाँ के लोगों और सरकार की मेहनत और दृढ इच्छाशक्ति ने पहले काफी गन्दी रही टेम्स को आदर्श के रूप में साफ़ सुथरा करने में सफलता हासिल की है. हालाँकि लेखक गुलामी के उन दिनों को याद करना नहीं भूलता, जब अंग्रेजों ने फुट डालो और राज करो की नीति से हमारी नदियों को प्रदूषित करना शुरू किया था, किन्तु गुलामी से मुक्त होने के इतने सालों बाद भी हमारे नदियों की दुर्दशा पर ढुलमुल होने से हमें बड़ी हानि हो रही है. लन्दन के दूसरे प्रमुख आकर्षण ‘मादाम तुषाद’ के मोम संग्रहालय को देखने की सलाह लेखक देता है, जिसमें लगे विश्व के महान विभूतियों के मोम-चित्र पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. इसके अतिरिक्त रेल सुविधाओं की बेहतरी और कामनवेल्थ इंस्टीट्यूट में शामिल 40 देशों की संस्कृति, जीवन-शैली, संसाधनों की विस्तृत प्रदर्शनी भी आकर्षण का एक केंद्र है. भारत और ब्रिटेन में बायीं ओर यातायात चलने, जबकि शेष यूरोप में दायीं ओर यातायात चलने जैसे अनेक रोचक अनुभव आपको इस पुस्तक में मिलेंगे. लन्दन की सामाजिक संरचना पर प्रकाश डालते हुए लेखक इस शहर को सिर्फ अंग्रेजों का मानने की बजाय एक बहुराष्ट्रीय समाज घोषित करता है, क्योंकि एशियन और अफ़्रीकी लोगों की बड़ी जनसंख्या इस शहर की सांसों में घुल चुकी है. लेखक भारतीय का पुट घोलते हुए यह जानकारी बड़े गौरव से देता है कि पूरे यूके में 8,500 भारतीय रेस्टोरेंट हैं, जो पूरे देश का कुल 15 फीसदी है, जबकि पंजाबी, बंगाली और गुजराती बोलने वालों की एक बड़ी संख्या लन्दन में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराती है. गैर-कानूनी रूप से विदेश जाने की कोशिश करने वाले भारतीयों का दर्द लेखक बड़े मार्मिक शब्दों में व्याख्यायित करता है, जो वहां की जेलों में दुर्दिन देख रहे हैं. इस लेख के अंत में लेखक प्रतिभा-पलायन के बजाय आज के दौर को वापसी का दौर बताते हुए भारतवासियों की समृद्धि को चिन्हित करता है, क्योंकि अब भारतीय लन्दन इत्यादि शहरों में घूमने-फिरने के मकसद से बड़ी संख्या में जाने लगे हैं.

अपने अगले लेख ‘एफिल टावर है पेरिस की पहचान’ में डॉ.विनोद बब्बर ने फ़्रांस को प्राचीनता और आधुनिकता का अनोखा मेल बताया है. और जानकारी देते हुए फ़्रांस की अर्थव्यवस्था को द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले कृषि-प्रधान जबकि आधुनिक समय में उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था होने की पुष्टि की है. साहित्य, कला और खान-पान का फ्रांसीसी जीवन में न केवल विशेष महत्त्व है, बल्कि यहाँ के निवासियों को इन पर अभिमान भी है. इसी कड़ी में भाषा और संस्कृति के अभिमान को लेखक कुछ हद तक अच्छा बताता है, जिससे मेरी दृष्टि में सहमत नहीं होया जा सकता है, क्योंकि अभिमान किसी भी चीज का हो, वह अंततः संघर्ष को ही जन्म देता है. किन्तु इस दृष्टिकोण को भावनात्मक रूप से लेने पर आशंकाएं निर्मूल साबित होती हैं. पेरिस को फ्रेंच भाषा में पारि कहा जाता है, जो विश्व के सुन्दरतम, सुव्यवस्थित और मनोरम शहरों में से एक है. इस शहर के सबसे प्रमुख दर्शनीय स्थलों में ‘एफिल टावर’ के निर्माता फ्रांसीसी इंजीनियर एलेक्जेंडर गुस्ताव एफिल को याद करते हुए लेखक ने इस 985 फुट ऊँचे टावर के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए इसे नेपोलियन की विजय के प्रतीक के रूप में निर्मित बताया है. ‘एन इवनिंग इन पेरिस’ तो हम सब सुनते ही आये हैं, किन्तु लेखक ने जिस रोचक ढंग से पेरिस की खूबसूरत शाम का वर्णन किया है, वह पढ़कर आपके सामने समस्त चित्र सजीव हो उठेंगे. यूरोप जैसे विकसित महाद्वीप में भी अंधविश्वास प्रचलित हैं, इसके उदाहरण लेखक आपको इस पुस्तक में देता है. फ़्रांस में लोकशाही की शुरुआत बैस्तिले दुर्ग के जनता द्वारा ध्वस्त किये जाने के बाद शुरू हुई, जिसे आधुनिक फ़्रांस के जन्म का प्रतीक माना जाता है. लेखक पेरिस में भी भारत से साम्यता ढूंढ ही लेता है, जो दिल्ली में बने इण्डिया गेट जैसा विजयद्वार है. पेरिस की एक विशेषता यह भी है कि वहां साइकिलें किराये पर मिलती हैं. पेरिस में उत्तम कानून व्यवस्था का उदाहरण देते हुए लेखक भारत की ख़राब कानून व्यवस्था के प्रति चिंतित नजर आता है. फ़्रांस के समाज को इसी लेख में लेखक आत्मकेंद्रित होने की तरफ इशारा करते हुए कहता है कि फ़्रांस का विश्व फ़्रांस से आकर फ़्रांस पर ही ख़त्म हो जाता है. भारत ही की तरह यहाँ हड़ताल और बंद चलते रहते हैं. फ़्रांस के लोगों का स्वभाव लेखक के अनुसार आलसी किस्म का है. भारतीयों की मौजूदगी फ़्रांस में है तो, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं है, इस प्रकार की विभिन्न जानकारियां आपको पुस्तक के माध्यम से प्राप्त होती हैं.

अपने तीसरे लेख ‘स्विट्जरलैंड की हसीन वादियाँ’ में डॉ. बब्बर ने स्विट्जरलैंड के प्राकृतिक सौंदर्य और वहां की सरकार द्वारा उसको संरक्षित किये जाने के प्रयास की दिल खोलकर सराहना की है. वैसे स्विट्ज़रलैंड पर्यटन, स्विस घड़ियाँ और काले धन का संरक्षक होने के नाते पूरे विश्व में प्रसिद्द है. इस देश को धरती का स्वर्ग भी कहा जाता है. दुनिया भर में सबसे ज्यादा पर्यटक और हनीमून बर्ड्स यहाँ की पहाड़ियों पर राफ्टिंग, क्लाइम्बिंग, पैराग्लाइडिंग और स्कींग करने पहुँचते हैं, जबकि लेखक के अनुसार भारत में हिमाचल, कश्मीर, शिलांग इत्यादि जगहों पर अभी तक यातायात और पर्यटन की सुविधा ही न के बराबर है, दुसरे आकर्षणों की बात ही कौन करे. यहाँ तक कि स्विट्ज़रलैंड में दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे स्टेशन बने हुए 100 साल का समय हो चुका है, जो 3454 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है. इस प्राकृतिक देश में स्विस, जर्मन, फ्रेंच और इटेलियन भाषा प्रयोग में लाई जाती है और आधुनिक समय में यह अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है. स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न एक मध्ययुगीन शहर है, जबकि ज्यूरिख यहाँ का प्रमुख व्यापारिक शहर है. लगभग सभी बैंकों का मुख्यालय ज्यूरिख में स्थित है. लेखक ने इस लेख में अपने विभिन्न अनुभवों का रोचक वर्णन किया है, जो आपको यह किताब पढ़ने के बाद ही मिलेगा, जिसमें हास्य और रोमांच सहित अनेक भावों का मिश्रण आप अनुभव कर पाएंगे. स्विट्जरलैंड के एक अन्य प्रमुख शहर ल्यूक्रेन मेंजो के ‘लायन मोमेंट’ का वर्णन करते हुए लेखक यह बताना नहीं भूलता कि स्विस सैनिकों को दुनिया भर में सबसे वफादार माना जाता है और इसीलिए ईसाइयों के प्रमुख धार्मिक स्थल वेटिकन सिटी के सुरक्षा की जिम्मेवारी स्विस सैनिकों के हवाले की गयी है. यूरोप के सबसे ऊँचे रेलवे स्टेशन जंगफ्रोज जाते हुए लेखक रेलवे की तीन पटरियां होने की जानकारी देता है, जिसमें तीसरी पटरी किसी चेन जैसी है, जिसमें ट्रेन के नीचे लगी गरारी के दांते चलते हैं, ताकि सीधी ऊंचाई पर चढ़ते हुए ट्रेन फिसले नहीं. इस पुस्तक में दिए गए अनुभवों में लेखक द्वारा वर्णित जंगफ्रोज स्टेशन का अनुभव पढ़कर आप निश्चय ही रोमांच और आनंद का अनुभव करेंगे.

पुस्तक में अगला लेख ‘क्रिस्टल सा चमकदार आस्ट्रिया’ है. इस छोटे देश के राजकुमार सेराजेवो की 28 जून, 1914 की हत्या प्रथम विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण बनी थी. एक सर्वे के अनुसार ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना दुनिया के 123 बड़े शहरों में जीवन की गुणवत्ता के मामले में सर्वोत्कृष्ट स्थान रखती है और डेन्यूब नदी के किनारे बसी यह नगरी प्राचीनता और आधुनिकता का सुन्दर संगम है. लेखक का मन मस्तिष्क यहाँ भारत के अमरनाथ गुफा से तुलना करती हुई इस्रिसनवेल्ट और स्लोवलिया में डिमेनोवस्का की गुफाओं का वर्णन करता है, जहाँ अमरनाथ के शिवलिंग की तरह वहां भी बर्फ-निर्मित शिवलिंग का दर्शन होता है. ऑस्ट्रिया में पशुओं के प्रति क्रूरता को बेहद गंभीरता से लिया जाता है. ऑस्ट्रिया के वाटन्स नगर में स्थित क्रिस्टल म्यूजियम हरी घास से ढका पहाड़ीनुमा मानव चेहरे के नीचे स्थित है. इस दो मंजिला म्यूजियम के प्रथम कक्ष में रंग-बिरंगे क्रिस्टल से बनी महाराणा प्रताप के स्वामिभक्त घोड़े चेतक की विशाल मूर्ती अद्वितीय कला का नमूना है. भारत से हजारों मील दूर भारत के शानदार इतिहास को देखकर लेखक को सुखद अनुभूति होती है. इसके अतिरिक्त म्यूजियम में क्रिस्टल से बनी अनगिनत चीजें देखने योग्य हैं. ऑस्ट्रिया के बारे में लेखक जब यह जानकारी देता है कि वहां पर्यावरण के लिहाज से एसी चलाना वर्जित है, तो स्वाभाविक रूप से पर्यावरण के प्रति उनकी संवेदनशीलता का पता चलता है.

ऑस्ट्रिया के बाद लेखक की कलम ‘विश्व की अनूठी नगरी वेनिस’ का वर्णन करती है. शेक्सपियर के बहुचर्चित नाटक ‘दी मर्चेंट ऑफ़ वेनिस’ अधिकांश लोगों ने पढ़ी होगी. 117 छोटे-छोटे द्वीपों से बने शहर वेनिस जिसे वेनेजिया भी कहते हैं, उत्तरी इटली में स्थित है. यहाँ घूमने जाने वाले पर्यटकों को बाजारों में आक्रामक अफ़्रीकी हैकरों से सावधान रहने की सलाह लेखक देते हैं, हालाँकि वेनिस पुलिस की आसमानी रंग की वर्दी देखकर अफ़्रीकी और बांग्लादेशी हाकर गलियों में गायब हो जाते हैं. पुराने काल में वेनिसवासी बहुत समृद्ध थे. इस शहर में सेंट मार्क ब्रजीलिका कैथीड्रल चर्च एक हजार साल पुराना होते हुए भी असाधारण है. वेनिस शहर में पुरानी दिल्ली की तरह घुमावदार तंग है, किन्तु साफ़-सुथरी गलियों में अनेक दुकानें तथा रेस्टोरेंट आपको मिल जायेंगे. इस शहर में आपको बेहतरीन भारतीय व्यंजन भी मिलेंगे.

वेनिस शहर के बाद ‘प्राचीन रोम के जीवांत अवशेष’ लेख में लेखक आपको अतीत की गहराइयों में ले जायेगा. मशहूर शायर इक़बाल की पंक्तियाँ भला कौन हिंदुस्तानी नहीं गुनगुनाता होगा ‘यूनान, मिश्र, रोमां सब मिट गए जहाँ से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’. रोम को इतिहास में बेहद सम्मानित दर्जा प्राप्त है. इसके साथ रोम के बारे में एक और कहावत प्रचलित है, जिसका लेखक उल्लेख करता है कि ‘जब रोम जल रहा था तो नीरो बंशी बजा रहा था’. इस कहावत का उदाहरण आज भी किसी लापरवाह शासक के लिए प्रयोग किया जाता है. लेखक के अनुभव से प्राचीन रोम के गौरव से अलग आज के रोम में चोरी और उठाईगिरी आम हो गयी है. वैसे, रोम का निर्माण ईसा से 700 साल पहले हुआ था. इस शहर की आबादी तब केवल तीस हजार थी. 70 – 75 ई. में वेस्पेसियन राजा के काल में कोलोसियम (एक तरह का प्राचीन स्टेडियम) का निर्माण शुरू हुआ था. इसी कोलोसियम में अफ्रीका से लाये गए शेर, हाथी, हिप्पोपोटाइमस, शुतुरमुर्ग इत्यादि से गुलामों को लड़वाया जाता था. इन गुलामों को ग्लेडिएटर के नाम से लोग जानते हैं, जिनपर हॉलीवुड में मशहूर फिल्में बन चुकी हैं. लोगों की उत्सुकता का केंद्र और भारी भीड़ उमड़ने के कारण इसके आसपास का क्षेत्र व्यापारिक स्थल के रूप में स्थापित हुआ होगा. इसी कड़ी में लेखक रोम में मिलने-जुलने की जगहों के बारे में बताता है, जिसे फोरम कहा जाता था. इन फोरमों में सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक गतिविधियाँ हुआ करती थीं. रोम के पैनेथियोन में सबसे प्रसिद्द और पुराना स्मारक है. ईसा से 27 वर्ष पूर्व बने इस स्मारक को 608 वीं सदी में एक चर्च के रूप में परिवर्तित कर दिया गया. सौंदर्य की दृष्टि से अपूर्व इस ईमारत में महान कलाकार राफेल और इमानुएल चिरनिद्रा में सोये हुए हैं. रोम में अनेक गार्डन हैं, तो फव्वारे भी कम नहीं हैं. यहाँ लगभग 300 स्थानों पर फव्वारे बने हुए हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्द त्रेवी नामक फव्वारा है. हालाँकि लेखक ने यहाँ भी भारत की नदियों में सिक्के डालने और उसके बदले में मनोकामना पूरी होने के तर्ज पर व्याप्त अन्धविश्वास को रेखांकित किया है. इस उद्धरण के साथ ही लेखक ने अपने देशप्रेम की मनोकामना भी बताई है, जिसका अंदाजा आपको पुस्तक पढ़ने के बाद ही लगेगा.

अगले लेख का शीर्षक ‘सबसे छोटा देश वेटिकन सिटी’ है, जो इटली की राजधानी रोम में बसा है, लेकिन पोप का मुख्यालय होने के कारण सम्मान स्वरुप इसे अलग देश का दर्जा दिया गया है. इसका क्षेत्रफल मात्र 44 हेक्टेयर एवं जनसंख्या एक हजार से भी कम है. 1929 में वेटिकन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता मिली, जिसका अपना कानून, डाकघर, अपनी राजभाषा इत्यादि हैं. वेटिकन स्थित इस रोमन कैथोलिक चर्च से दुनिया भर के कैथोलिक चर्चों को संचालित किया जाता है. चर्च के नियमानुसार प्रत्येक विशप का कार्यकाल उनकी 75 वर्ष की उम्र तक ही होता है, इसके बाद उन्हें रिटायर होना पड़ता है. हालाँकि भारतीय संस्कृति में भी सन्यास आश्रम की उम्र यही निर्धारित की गयी है, किन्तु तमाम क्षेत्र जिनमें राजनीति से लेकर घर तक सम्मिलित हैं, के बुजुर्ग सत्ता से अपना मोह त्याग ही नहीं पाते हैं. भारत वर्ष की मजबूत संयुक्त परिवार परंपरा का टूटना और देश में सक्षम युवा नेतृत्व के न उभरने का यह एक बड़ा कारण दिखता है. वेटिकन के बाहर भिखारियों को देखकर लेखक इसकी तुलना अपने देश के तिरुपति जैसे मंदिरों से करते हुए विचार करता है कि आखिर परमपिता के भक्तों का यह कैसा न्याय है.

अपने अगले लेख ‘सांतवा आश्चर्य पीसा की झुकी मीनार’ में लेखक इसे एक चर्च (कैथेड्रल स्क्वायर) का घंटाघर बताता है, जिसका निर्माण पूरा होने में 200 साल का समय लगा. उस समय पीसा धनवानों की नगरी थी. वास्तव में यह दो नगरों पीसा और फ्लोरेंस के बीच प्रतिद्वंदिता का नतीजा थी, जिसे फ्लोरेंस के लोगों को नीचा दिखाने के लिए बनाना शुरू किया गया. इसका टेढ़ा होना शुरूआती ‘असावधानी’ का नतीजा था, जिसे वास्तुशिल्पी बोनानो पीसानो ने शुरू में ही पहचान लिया था, किन्तु तब तक मीनार की तीन मंजिलें बन चुकी थीं. हालाँकि विश्व में यह इकलौता ऐसा स्थान नहीं है, बल्कि उड़ीसा के संभलपुर जिले के हुमा गाँव में एक शिव मंदिर है और उसके आसपास कई और मंदिर भी हैं, जो प्राकृतिक रूप से झुके होने के साथ वास्तुकला के बेजोड़ नमूने भी हैं.

इसके बाद ‘विश्व फैशन नगरी मिलान’ में यूरोपीय संघ के व्यापार और वित्त के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र के बारे में लेखक ने अपने अनुभव व्यक्त किये हैं. अंतर्राष्ट्रीय फैशन में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले मिलान को नई दिल्ली से मिलता जुलता बताया है डॉ. विनोद बब्बर ने, वह चाहे कनॉट प्लेस जैसी मार्किट हो अथवा किसी दूकान पर ‘सेल’ का बोर्ड लगा हो, या फिर प्रदूषण का बढ़ा स्तर ही क्यों न हो. अपने इस लेख कि अंतिम लाइनों में लेखक ने साफ़ कहा है कि अपनी मातृभूमि की गोंद से बढ़कर दूसरा कुछ और नहीं.

सच कहा जाय तो ‘इंद्रप्रस्थ से रोम’ किताब सिर्फ यूरोप के बारे में नहीं बताती है, बल्कि बीच-बीच में कई बार यह भारत में व्याप्त बुराइयों को तुलनात्मक रूप से उठाते हुए उसका समाधान भी प्रस्तुत करती है. यात्रावृत्त के उद्देश्यों को पूरा करते हुए यह पुस्तक यूरोप जाने वाले यात्रियों के लिए आवश्यक गाइड भी है, जिसमें घूमने के स्थानों से लेकर, सामाजिक परिवेश और लोगों के व्यवहार के बारे में आपको न सिर्फ जानकारी मिलती है, बल्कि कई बार सावधान भी करती है. पुस्तक में प्रयुक्त भाषा आम जनमानस की समझ में आ सकने योग्य है. इस पुस्तक का आकर्षण इसके आखिरी पृष्ठों में छपे हुए रंगीन चित्र हैं, जिसमें ऊपर वर्णित सभी स्थानों पर डॉ.विनोद बब्बर की उपस्थिति आपको दिखेगी. लेखक का सौंदर्य प्रेम इन चित्रों में साफ़ झलकता है. इस अनुपम कृति के लिए डॉ. विनोद बब्बर साधुवाद के पात्र है.
– मिथिलेश कुमार सिंह

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