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चमन है यह वो /जाने कितने कवियों ,शायरों की /रूहें यहाँ बेदार होती हैं /

Posted On: 1 Nov, 2013 Others में

कुछ कही कुछ अनकहीसुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

mrssarojsingh

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कुछ महीने पहले अपने लम्बे से अध्यापन कार्य से इस्तीफ़ा दे दिया …एक बहुत व्यस्त जीवन और भाग दौड़ भरे साल शायद एक गहरी थकन दे गये थे ….और कुछ पारिवरिक जिम्मेदारियां भी पूरी हो गई थी . इसलिए यह निर्णय लिया कि अब थोड़ा आराम का जीवन जी लिया जाये . और कुछ अधूरी रह गई ख्वाहिशों को भी थोड़ी तवज्जो दे दी जाये ……
वैसे तो सब का जीवन संघर्षों से भरा होता है पर एक सैनिक अधिकारी की पत्नी के जीवन में यह संघर्ष थोड़ा ज्यादा हो जाता है ..बहुत बार अकेले रहना …हर दो ढाई साल में ठिकाना बदलना ….बच्चों की पढाई ,कोचिंग के साथ अपनी नौकरी और पति का हर अच्छी बुरी स्थिति में साथ देना ….सैनिक की पत्नी को केवल थकाता ही नहीं बल्कि उसके मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी काफी गहरा प्रभाव डालता है . अक्सर अपने भय या आशंकाओं को अपने मन में छुपा कर रखते हुए बाह्य रूप से एक मजबूत आवरण ओढ़े रखना होता है ,,और वो भी हमेशा होंठो पर हंसी के साथ ………..ताकि परिवार से दूर अकेले रहने वाला सैनिक कमजोर हो कर अपनी जिम्मेदारियों में चूक न जाये या फिर बच्चे अपने जीवन में उनके जन्मदिन ,,स्कूल के फंक्शन ..या PTA मीट आदि में पिता की अनुपस्थिति पर उदास न हो जाएँ …इन सब की भावनाओं का ख्याल रखते रखते फौजी की पत्नी अपनी भावनाओं को बस दिल किसी के कोने में छुपाये हुए चलती जाती है…बस चलती जाती है ………..
सच भी है …………. पिछले कुछ वर्षों में कुछ ऐसा इत्तिफाक हुआ कि पति को फील्ड एरिया में कुछ लम्बे अर्से तक रहना पड़ा…. नतीजा यह हुआ कि घर सँभालने के साथ साथ बाहर के सारे काम भी करने होते थे …….बाजार के काम , बीमारी में अस्पताल के चक्कर हों या बस स्टैंड /रेलवे स्टेशन से किसी को लाना या छोड़ना सब मेरे जिम्मे आ गए ……..शुरू मेरे में तो कार चलाना बहुत अच्छा लगा ..पर धीरे धीरे जब कई कई घंटे सड़कों पर गुजरने लगे ,तब थकान महसूस हुई तो कभी कभी खुद को टैक्सी ड्राईवर की पदवी देने का मन भी करता था खैर ……………
यह सब भी और ,,,और भी बहुत सारी बातें कहनी सुननी है .पर वो फिर कभी..
आज कुछ और है जो साझा करना है …………
हाँ तो आराम से जिंदगी जीने का सपना और कुछ अधूरी ख्वाहिशों को मन में संजोयें हम एक नये शहर में आ गये ………
बहुत चाव से अपने नये घर को सजाया सवांरा …………..
दो तीन हिंदी , इंग्लिश के समाचार पत्र और कुछ पत्रिकाएं लगवा ली .
हर सुबह फुर्सत के साथ चाय पीते हुए समाचार पत्र पढ़ना किसी सपने जैसा ही लगता था ……………
अब अगला कदम था अपनी उस इच्छा को साकार करने का जो अब तक किताबों कापियों और बहुत सारी डायरियों में दबी रह गई थी ……..
लिखने का शौक स्कूल कॉलेज से ही था हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकारों की किताबें पढ़ रखी थी …शिवानी ,,महादेवी वर्मा ,मन्नू भंडारी का प्रभाव मन पर कहीं बहुत गहरे समाया हुआ था …………
जब भी मौका मिला , लिखने का सिलसिला बनाये रखा ……..
फिर जीवन ने एक मोड़ लिया और साहित्य का स्थान विज्ञान ने ले लिया …..
पहले रसायन शास्त्र की अध्यापिका और फिर फौजी पति के साथ खानाबदोशों का जीवन ………ऐसे में कुछ कविता, कहानी , संस्मरण लिखे जो कभी कभी छपते भी रहे कभी नहीं …………..
क्योंकि उस ज़माने में इंटरनेट या इ-मेल जैसी सुविधाएँ तो थी नहीं ……..और डाक से रचनाएं भेजना फिर स्वीकृति ,…अस्वीकृति का इन्तजार ………और छपने के बाद पत्रिका का हाथ में आना ….इतना समय ले लेता था कि कभी कभी तो अपने लेख देख पाने का सौभाग्य भी नहीं मिलता था क्योकि कई बार पत्रिका हम तक पहुंचे उस से पहले ही हम उस शहर को अलविदा कह चुके होते थे …….
और नये शहर में फिर से कुछ कठिन दिन ……………
सो जितना वक्त देना चाहती थी उतना नहीं दे पाई और मेरा वो शौक थोड़ा बैकग्राउंड में चला गया …………

पर अब नहीं …………अब जब लिखना और उसे छपते हुए देखना बस एक क्लिक का खेल हो गया है …………
तो .. एक नई आशा ने अंगड़ाई ली और ………
और ..एक ………नई शुरुआत हुई ……..

आज हम जिस दुनिया का हिस्सा हैं उसने हमारे हाथों में वो जादुई चिराग भी दे दिया जिससे हम दूर रहते हुए भी बहुत करीब भी हो गये हैं.इंटरनेट ने हमें ज्ञान का भंडार देने के साथ साथ अपने विचारों को सब के सामने रखने का वो मौका दिया है जिसकी कल्पना भी कुछ साल पहले असम्भव थी . कविता कहानी लिखना और उसे छपते हुए देखना इतना मुश्किल काम था कि बहुत सारे लेखक और कवियों की रचनाये उनकी डायरियों में ही लिखी रह जाती थी ……….

जी हाँ वो हमारे जैसे भाग्यशाली जो नहीं थे ………….. तब ब्लॉग्गिंग जैसी सुविधा जो नहीं थी …………………………………

और वो भी हिंदी ब्लॉग्गिंग ………………………
अभी कुछ साल पहले की बात है जब कंप्यूटर और हिंदी का ऐसा मेलजोल नहीं था जैसा आज है ………..
हिंदी टाइपिंग इतनी आसान नहीं थी और ब्लॉग की दुनिया ने अभी अभी ऑंखें खोली थी ….
पर धीरे धीरे ……तकनीक की दुनिंया ने हमे नये पर दिए और आज हम बहत दूर निकल आये हैं ……

जी हाँ हिंदी में अपने ख्यालों को एक कविता /कहानी का रूप देना और बिना डाकिये का इंतजार किये … प्रकाशित होता हुआ देखना एक सपने जैसा ही तो है …….. …………….वो दिन मैं आज भी नहीं भूल पाती (और शायद कभी भूल भी नहीं पाऊँगी )जिस दिन मैंने अपनी पहली कविता को ब्लॉग के रूप में जागरण जंक्शन पर देखा था .
अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं कर पा रही थी …किसी छोटे बच्चे की तरह बार ब्लॉग खोल कर देख लेती थी ………..और खुद ही मोहित हो लेती थी ……….
…………….. लेकिन कहानी तो अभी बाकी है …………….
अगला चमत्कार तब हुआ जब उसी कविता पर कमेंट्स आये ………………..
जी हाँ वो एक अद्भुत पल था …………….मेरा ब्लॉग इतने लोगो ने पढ़ा और सराहा भी ? विश्वाश नहीं हो रहा था …….अद्भुत अनुभव था वो ………..
इसी पल के साथ एक नया सफर शुरू हुआ …………..
ब्लॉग लिखना और ब्लॉग पढ़ना मेरे लिए मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है ……………
वर्षों पुरानी इच्छाओं को एक साकार रूप जो मिलने लगा है आजकल ………..
कल्पनाओं को एक नया आकाश जो मिल गया है ……..
मेरे शौक को सुबह की रौशनी जो मिल गई ………
और ब्लॉग की अद्भुत कला को इतना आसान और लोकप्रिय बनाने का सारा श्रेय जाता है जागरण जंक्शन को …………………..
जी हाँ सृजन कला को नये आयाम देकर जागरण जंक्शन ने हम उन लोगो का कितना भला किया है इसका अंदाजा बस उन्हें ही हो सकता जो यह सोच कर परेशां थे कि चलो इस जन्म में न सही अगले जन्म में ही अब अपनी इच्छा पूरी कर लेंगे ……………
वैसे भी इस दुनिया में इंसान की हर अभिलाषा पूरी हो जाये यह जरूरी तो नहीं ……………….
पर ………पर नहीं ………………….
अब मेरी अभिलाषा तो इसी जन्म में पूरी हो रही हैं …………..
और क्या खूब हो रही है …………………….
अपने विचारों को इतने विशाल मंच पर साझा करना ……………..
इतने सारे ब्लॉग मित्रों से बना यह रिश्ता ……..कितना अनोखा अहसास देता है………….
इस सिलसिले ने अब थोड़ी हिम्मत भी और बढ़ा दी है ………….जिसके बारें में चर्चा फिर कभी ……..

बहरहाल …………….
एक बार फिर हिंदी ब्लॉग्गिंग को हम तक पहुंचाने के लिए जागरण जंक्शन को कोटि कोटि धन्यवाद के साथ अपनी बात समाप्त करती हूँ ………………
कुछ पंक्तियों के साथ………..

एक अर्से से तमन्ना थी …….

ख्याल मेरे ,लफ्जों के गुल बन कर किसी गुलिस्तां में खिलें ……..
बरसें बूँदें बन कर नगमें ,गजलें ,गीत ,,ऐसा कोई जमीं कोई आसमां मिले…….

देर से सही मिल ही गया आखिर ऐसे एक गुलशन का पता मुझको ….
ख्वाहिशें ऐसे सच हो जाएँगी मेरी ,यकीं अब तक नहीं आता मुझको …….

यही है वो चमन गीत .,गजल ,कविता, कहानी .जहाँ गुलजार होती हैं …..
न जाने कितने कवियों, शायरों , लेखकों की रूहें यहाँ बेदार* होती हैं ………..

तेरी मेरी उसकी ,,सबकी बात होती हैं …इस मंच पर रोज नये मुद्दों से मुलाकात होती है ………..
मंच है यह सभी का अपना , तेरा भी मेरा भी .. यहाँ न कोई भेद भाव की बात होती है ………..
*बेदार –मुक्त

सरोज सिंह…
द्वारा कर्नल बलबीर सिंह
इ/५/३०२/gh ७९
सेक्टर-२०
पंचकुला –

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