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झील में तारों की परछाइयाँ ......

Posted On: 7 Mar, 2014 Others में

कुछ कही कुछ अनकहीसुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

mrssarojsingh

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झील में तारों की परछाइयाँ
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अहसान है तेरा ऐ चाँद /
रोशन कर दी तूने /
काली स्याह रातें /
समाकर रोशनीसूरज की खुद में /

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साँझ ढली तो चल दिया सूरज /
अपने आशियाने को /
नन्हे नन्हे दीयों ने ही तब /
बनाई पूनम /
वो अमावस की रात /

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बैठे हैं परिंदे पेड़ों पर /
इस उम्मीद में /
झील में तारों की परछाइयाँ /
करेंगी रोशन उनका घोंसला /

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रोशनी के लिए तो दिए ही जलाने होंगे /
जंगल की आग से भी कभी हुई है रोशनी ????????

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