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दास्ताँ अपनी सुनानी है ?

Posted On: 12 Dec, 2017 Others में

कुछ कही कुछ अनकहीसुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

mrssarojsingh

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दास्तां अपनी सुनानी है

दास्ताँ अपनी सुनानी है
आग दामन में लगानी है ?

सरासर तेरी नादानी है
हर कोशिश जब बेमानी है

दिखाए वो राह मुश्किल में
उसके होने की निशानी है

साहिलों की कश्तियों से बस
ख़त्म अब रंजिशें करानी हैं

आ कहीं से रंगो – बू लाये
सूनी बगिया फिर सजानी है

गुनगुनाती सी जो गुजरे
बस वही तो जिंदगानी है

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