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बेरहम लहरों के बीच डूबता उतराता मन ...................

Posted On: 6 Jul, 2013 Others में

कुछ कही कुछ अनकहीसुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

mrssarojsingh

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जिन्दगी के झंझावातों  में उलझा /
लहरों के बेदर्द थपेड़ों से जूझता तन मन /
किसी नई राह की तलाश में हर दिशा की ओर ताकता मन /
बेरहम लहरों के बीच डूबता उतराता मन /
कभी सागर की गहराइयों से घबराता मन /
कभी न खत्म होने वाले /
असीम अनंत सागर के /
किनारों को खोजता मन /
और कभी धैर्य खो कर बेसब्र होता मन/
कभी आंसूं तो कभी दुआओं को पतवार बनाता मन /
बहुत दूर हो जाता जब किनारा /
डूबने को ही होता जब मन बेचारा /
तभी ……………

अचानक …………..
अपने अंदर कहीं छुपी हुई /
अब तक अनदेखी अनचीन्ही सी रोशनी की इक किरन को बना अपना साथी /
कड़े संघर्ष से लड़कर किनारा आखिर पा लेता मन /

कुछ पलों के लिए ही सही /
पैरों की थकन से मुक्ति पा लेता मन /

फिर से किसी नई उलझन /
नई चुनौती के लिए खुद को तैयार करता मन /
क्योंकि ………………
हर पड़ाव के बाद एक नई मंजिल /
और हर मजिल के बाद एक नया सफर /
जब यही है जीवन की सचाई तो /
तो फिर क्या डरना ?
इन तूफानों से /
इन लहरों से
है जब तक यह जीवन /
मिलते रहेंगे तूफान राहों में /
और चलता रहेगा /
यह सिलसिला यूँ ही /
और डूबता उतरता रहेगा मन मेरा बेरहम लहरों के बीच बस यूँ ही /
बस यूँ ही ……………..

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