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वो आये बहार आई /महक उठे दरो दीवार /खिल खिल हंसी अंगनाई ..........

Posted On: 6 Nov, 2013 Others में

कुछ कही कुछ अनकहीसुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

mrssarojsingh

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माफ़ कीजिये शीर्षक पढ़ कर आप के मन में जिस “वो ” का ख्याल आ रहा होगा और जिसके कसीदे कविता ,गीत और ग़जलों में पढ़े जाते हैं यहाँ उस “वो” का जिक्र कतई नहीं होने वाला है. . बल्कि यह तो वो “वो” जो अगर एक दो दिन या कभी इससे भी ज्यादा दिन हमारे या आपके घर की घंटी न बजाये तो खतरे की घंटी बज जाती है उस गृहिणी के लिए जिसे यह समझ नहीं आता कि अब मेरा क्या होगा ?
सुबह की चाय और अख़बार का मजा लेते हुए भी कान तो बस उस घंटी की ओर ही लगे रहते हैं जो काफी नियमित समय, पर हर दिन जब बजती है तो दिल में कहीं तसल्ली और ख़ुशी की धुन भी लहरा उठती है और दिन के कामों की एक सुहानी सी शुरुआत हो जाती है .. वरना ….वरना तो फिर ..हम सब वाकिफ हैं …….इस वरना से …….
जी हाँ अब तो हम सब बखूबी यह समझ गये हैं कि यह “वो ” और कोई नही बल्कि हमारे आपके घरों में सुबह शाम दस्तक देने वाली महरी /आया /बाई /अम्मा आदि नामों से बुलाई जाने वाली वो संकट मोचक है जो हर हिंदुस्तानी घर का अटूट हिस्सा हैं .
छोटे बड़े हर परिवार की खुशियों का सारा दारोमदार इन्ही के नाजुक कन्धों पर छोड़कर हर भारतीय गृहिणी चैन की बंसी बजाते हुए अपने दिन गुजारती है फिर चाहे वो हाउसवाइफ बन कर रहे .. ब्लॉग्गिंग करें ,.किसी समाचार पत्र ,मैगज़ीन के लिए लेख लिखे ,, या कोई भी नौकरी करें या फिर बड़े से संयुक्त परिवार के ढेरों काम निपटाने के साथ साथ सास ससुर, देवर ननदों ,को भी खुश रखना हो …मेहमान आ जाएँ . बड़ा छोटा कोई बीमार हो जाये ,,,,,.. घर में शादी ,सगाई का कोई फंक्शन हो … साल में आने वाले अनेकों त्यौहार हों या फिर घर में नन्हे मुन्ने के आने जैसी बड़ी खुशखबरी हो ………….सब शांति से निपट जाते हैं ………….इन्ही के दम पर ………..

कोई समस्या नहीं …..हर मर्ज़ की दवा है हमारी यह काम वाली बाई …………..जो इतने प्यार से आपको , आपकी और उसकी अपनी उम्र के हिसाब से दीदी या भाभी या आजकल तो आंटी जी भी बुलाती है और …………
हर दिन सुबह घर का हर कोना झाड़ पोंछ कर चमका देना ………
रसोई की उदासी और बासीपन को दूर कर स्वादिष्ट खाना बनाने के लिए तैयार कर देना ………..
घर के बरांडे, आँगन ,,छत सीढ़ियां सब को बुहार कर या धोकर महका देना ……

हमें जिंदगी का हर सुख देती है ….घर की साफ़ सफाई , बर्तन ,,कपड़े धोना तो है ही साथ ही खाना बनाना या सब्जी काटना ,,आटा गूँदना ,,बच्चों को सम्भालना ..
बहुत लम्बी फेहरिस्त है उन कामों की जो हम इन के हवाले कर खुद सज धज कर .. एक अच्छी सी आरामदायक जिंदगी गुजार पाते हैं …………

पर हम कभी यह नहीं सोचते कि हम हिंदुस्तानी बहुत किस्मत वाले हैं जो हमें अपने रोजमर्रा के कामों के लिए इस तरह की मदद मिल रही है …
और हमारे यह सहायक उतने किस्मत वाले क्यों नहीं हैं ?
यह सच है कि हम हिंदुस्तानी अपने इन सहायकों के बारे में अपने स्तर पर सोचते हैं … उन्हें अपने घर का हिस्सा बना कर रखते हैं और गाहे बगाहे त्योहारों पर या अन्य ख़ुशी के अवसरों पर बख्शीश के रूप में नये कपड़े ,मिठाई या कभी पैसे भी देते रहते हैं …..कुछ नरम दिल मालिक बच्चों की पढ़ाई किताबों आदि का जिम्मा भी ले लेते हैं ,बीमार होने पर दवा आदि का खर्च भी उठाते हैं ….कुछ लोग कई वर्षों तक घर का काम करने वाली लड़कियों की शादी का खर्च उठाने जैसा नेक काम भी करते हैं …
यानी हमारे देश में philanthropy को अपना धर्म समझने वाले समाज सेवकों की कमी नहीं है और कभी रही भी नहीं ………….
परन्तु इतना ही और इस स्तर पर किया गया काम देश की जनसँख्या को देखते हुए कुछ भी नहीं है ……..
यह राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं के ध्यान देने वाला मुद्दा है ………….
हम यह जानते है कि हमारे देश में गरीब अमीर की एक बड़ी खाई है ……जनसंख्या अधिक है …..और गरीबों को रोज़ी रोटी की तलाश में यह सब काम करने पड़ते हैं ……….गरीब आदमी को अच्छी नौकरी न मिल पाने के कारण परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए ही गरीब स्त्री काम वाली बाई बनती है …..उसका पति शायद दिहाड़ी मजदूर होगा …..सब्जी की दूकान लगाता होगा या रिक्शा चलाता होगा ….. उसके बच्चे स्कूल न जा कर अमीरों के बच्चों की बेबी सिटिंग करते होंगे ……या हमारी आपकी कार साफ करते होंगे ……..
हमारे जीवन को आसान बनाने वाले यह लोग उस दिन के इंतजार में सारी जिंदगी गुजार देते है जब इनके लिए भी देश के कर्णधार सिर्फ वादे नहीं ,बल्कि सच में कुछ कर दिखाएंगे परन्तु ……….
राम राज्य का सपना दिखाने वाले नेताओं ने इस ओर ध्यान देने की बजाय अपने स्वार्थ को ही पूरा किया है अब तक …….यदि ईमानदारी से देश चलाया जाये तो हर देशवासी को रोटी ,कपड़ा मकान मिल सकता है …संसाधनों की कोई कमी नहीं है इस देश में …..कमी है तो अच्छी नीयत की …………..
भ्रष्टाचार को अलविदा कहने की ……………
. नित नये कानून बन रहें हैं.. कई प्रगतिशील देशों की तर्ज़ पर घरेलू कामगारों के लिए बीमा योजना ,,,minimum wage पालिसी,,छुट्टियों का प्रावधान , बीमारी में सहायता भत्ता आदि उपलब्ध कराने जैसे कई क़ानून लागू करने के नाम पर ज्यादा सफलता मिलती नजर नहीं आ रही है ……..
बाल श्रमिक कानून के तहत चौदह साल से कम उम्र के बच्चों से घरों में या फैक्ट्री आदि में काम कराना अवैध है …
पर सच्चाई हम सब जानते हैं ……….
बल्कि अब तो घरेलू कामकाज करने वालों के साथ हिंसा की घटनाएं रोज ही अख़बारों और मीडिया में छाई रहती हैं …..
और सबसे ज्यादा दुःख की बात यह कि हिंसा करने वाले यह लोग या तो राजनीति से जुड़े लोग हैं या फिर डॉक्टर ,,एयरहोस्टेस आदि उस तबके के लोग हैं जिनसे हम ऐसी अपेक्षाएं हरगिज़ नहीं करते……..यह लोग पढ़ लिख कर भी इतने संवेदन हीन क्यों हो गये है यह निश्चित ही चिंता का विषय है क्योंकि यह हमारे आज के समाज की एक बहुत ही कुरूप तस्वीर पेश करता है और यह अपने आप में एक शोध का विषय बनता जा रहा है…….
यहाँ हमारे इतनी प्राचीन और अपने आपको महान सभ्यता का दर्ज़ा देने वाले भारतीय अपने समाज के एक तबके को जहां इतना नजरअंदाज कर रहें हैं वहीं बाहर के देशों में जैसे अमेरिका,यूरोप के कई देश , ऑस्ट्रेलिया आदि में इस प्रकार की अमीर गरीब की खाई को वहाँ की सरकारों ने काफी सफलतापूर्वक मिटाने के प्रयास किये हैं
एक classless सोसाइटी ने सब को बराबर का दर्जा देते हुए हर किसी को जीवन की मूलभूत सुविधाएँ देने के साथ साथ हर छोटे बड़े काम को सम्मान देने के रवैये ने एक ऐसे खूबसूरत खुशहाल समाज का निर्माण किया है जिसका हम अभी सपना ही देख रहें हैं …………….
इसी सन्दर्भ में एक खूबसूरत वाक़या आप सब के साथ बाँटना चाहूंगीं ………
कुछ साल पहले मैं अपने बेटी के पास मेलबर्न गई ,,वहाँ देखा कि मेरी वही बेटी जो घर के काम से कोसों दूर भागती थी , अपना क्लिनिक चलाने के साथ साथ घर का और बाहर का काम भी बखूबी कर रही है … शायद वहाँ टेकनोलॉजी का इस्तेमाल घर के हर काम में इतनी अच्छी तरह किया गया है कि घर की सफाई ,,बर्तन आदि सब बहुत आसान लगता है. साथ ही घर का सारा काम केवल गृहिणी के जिम्मे नही है …पति ,बच्चे और सभी बड़े बूढ़े घर के रोज के काम में हाथ बटाते हैं…
और महीने के महीने या कभी पंद्रह दिनों के बाद खास सफाई आदि के लिए क्लीनर को बुला लिया जाता है तो ………
एक दिन क्लिनिक जाने से पहले बेटी ने बताया कि मम्मा आज क्लीनर आयेगी . आपको कुछ करना नहीं है ,,वो अपना सफाई में काम आने वाला सब सामान साथ लाएगी और सामान हटाना लगाना सब कुछ खुद ही करेगी ..आप आराम से बैठकर मैगज़ीन आदि पढ़ते रहना ……
खैर तय समय पर सफाई करने के लिए अपनी ट्राली ले कर जिसने घर में प्रवेश किया उसे देख कर मैं स्तब्ध रह गई …….
बिलकुल मॉडल की तरह दिखने वाली उस किशोर वय की लड़की ने अभिवादन करने के बाद पूरे दो घंटे तक बाथरूम ,किचन समेत सारे घर को इतनी मेहनत और तल्लीनता के साथ साफ किया कि मैं दंग रह गई ……..न चाय की फरमाइश न बीच में आराम,,, बस काम खत्म किया और ट्राली के साथ बाहर ………..
अब मुझे समझ में आया कि क्यों यह देश हमसे हर चीज में इतने आगे हैं ………..
काम करने का यह अंदाज ही तो उन्हें प्रगति की उन ऊंचाइयों पर ले गया जहां वो आज हैं ………..

वैसे पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में भी कुछ बदलाव की किरणें चमकने लगी हैं ……….
कंप्यूटर ..इंटरनेट ,,मोबाइल ने बहुत कुछ बदल दिया है ……….
समाज के हर वर्ग में जागृति आई है ……
टेकनोलॉजी ने हमें भी बहुत सी सुविधाएँ दे दी हैं ,,,

घर के काम में भी हमारे सहायक अब डिशवाशर ,,,वाशिंग मशीन ,,माइक्रो …फ़ूड प्रोसेसर ,फ्लोर mop आदि ने ट्रेडिशनल आया की जगह ले ली है …………और ख़ुशी की बात यह है हमारी बाई ,आया maid ,या अम्मा बेरोजगार नहीं हुए हैं बल्कि उनके लिए भी नये काम इज़ाद हुए है ..उनके काम के स्वरूप जरूर थोड़े बदल गए हैं पर इसके साथ ही आय भी बढ़ी है ….जिसके साथ उनके जीवन का स्तर भी बढ़ा है………
जी हाँ ,,,,,उनके जीवन में भी एक नया सवेरा दस्तक दे रहा है ……….
वो अब ब्यूटी पार्लर में , फ़ोटोस्टेट की दूकानों में ,.स्टोर्स या स्कूलों में बाकायदा वर्दी पहन कर काम कर रहीं हैं …और ……
और जो अभी भी घरेलू काम कर रही हैं उनके बच्चे ,,पढ़ भी रहें हैं और कूरियर कंपनी ..सुरक्षा एजेसियों आदि में काम कर रहें हैं ……..कुछ बच्चे जो दसवीं पास कर लेते हैं उनके लिए हर शहर में रोज नये खुल रहे मॉल ,,और supermarkets नौकरी का नया स्त्रोत बन रहें हैं ……
हर मोड़ पर खाने पीने के नये नये ठिकाने खुल रहें हैं जहाँ काम तो मिलता ही है इसके आलावा बहुत से डिलीवरी बॉयज भी चाहिए ….
किसी भी वक्त फ़ोन पर आर्डर करने के बीस मिनट के अंदर पिज़्ज़ा पहुचाने का दवा करने वाली डोमिनोज़ ,,मैकडोनाल्ड या पिज़्ज़ा हट जैसे अंतर्राष्ट्रीय नाम हमारे इन बच्चों को नौकरी दे रहें हैं …………….
कॉल सेंटर्स में दिन रात की शिफ्ट में कर्मचारियों को पहुँचाने के लिए पिक एंड ड्रॉप जैसी सेवा के लिए ड्राईवर चाहिए..और एक बड़े वर्ग को यहाँ काम मिल रहा है ….
नयी सड़के ..फ्लाई ओवर … एक्सप्रेसवे बनाने के लिए श्रमिक चाहिए ….
रोज नये होटल खुल रहें हैं …अस्पताल खुल रहें हैं …….
इनको चलाने के लिए अनगिनत कर्मचारी चाहिए …..
और सरकार ने भी जो मनरेगा योजना शुरू की है उसका भी व्यापक असर देखने को मिल रहा है ..
यानी तस्वीर उतनी भी धुंधली नहीं है ……….
बदलाव की लहर आ तो रही है आहिस्ता ही सही ,,,,,,,,,

और इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रमाण है …….MOBILE ……

जी हाँ आज के दिन मोबाइल एक ऐसी चीज है जिसने अमीर गरीब की खाई को मिटा दिया है ……….
मोबाइल तो अब सभी के पास है ….
हर वर्ग के परिवार की अब यह एक जरूरत बन कर उभरा है ….
कितने ही लोगो का तो काम धंधा ही इससे चल रह है ..
plumber ,,इलेक्ट्रीशियन ..और कारपेंटर हो या रद्दीवाले को बुलाना हो तो उनका मोबाइल नंबर आपके पास जरूर होगा …..
कार धोने वाला हो ,,,मोची हो ,,,सब्जी वाला हो …टेलर हो , धोबी हो या हमारी आपकी आया …………
सब के पास यह जादुई चिराग है ……..जब चाहे बात कर ली ,,,,जो चाहिए घर पर हाजिर ….
बस एक कॉल सबको एक प्लेटफार्म पर खड़ा कर देती है जब आप की बाई आप को कॉल करके कहती है कि ” आंटी /मैडम आज घर पर मेहमान आ गये हैं छुट्टी चाहिए ”

और एक बदलाव देखिये … हम भी तो अब “मेम साहिब से मैडम या आंटी बन गये हैं ……..

जी हाँ ……… क्या पता आने वाले कुछ दशकों के बाद हमारे देश में भी हमारे घरेलू काम करने वाले लोग पश्चिमी देशों की तर्ज़ पर सूट बूट पहन कर कार में बैठकर आयें ….
और अमीर गरीब का भेद सदा के लिए समाप्त हो जाये ………..
तब तक हमें भी बदलना होगा ..अपने घर के सारे काम खुद करने की आदत जो डालनी पड़ेगी …
और यही आदत हमें टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल ,,,हर छोटे बड़े काम को गरिमा के साथ करना और आत्म निर्भर होना तो सिखा ही देगी इसके साथ ही हमें स्वस्थ रहना भी सिखा देगी हर सुबह उस घंटी का बेसब्री से इंतजार करने का सिलसिला भी खत्म हो जायेगा …
और खत्म हो जायेगी वो दहशत जो ,,जब जब “वो” नहीं आते थे तब तब छा जाती थी घर की मालकिन पर और असर पड़ता था सारे परिवार पर ….
और तब “वो “कोई और न होकर बेशक ,,सौ प्रतिशत वही होंगे जिनका जिक्र फ़िल्मी गानों में ,,गीतो में और गजलों में अक्सर हुआ करता है ..
बस चार पंक्तियाँ और ………….

कुछ कुछ बदल रहा है जब यह समां………
तो क्यों न एक अहद हम भी करतें चलें ………..
राहों को रोक रहें जो उन्ही पत्थरों से नई राहें बनाते चलें
बदलाव के इस नये युग को नाम नया ,इक आयाम नया देते चलें …………

आमीन …………..

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