blogid : 13246 postid : 1326458

वो जो नज़रों में समाये बैठे हैं

Posted On: 1 May, 2017 Others में

कुछ कही कुछ अनकहीसुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

mrssarojsingh

185 Posts

159 Comments

वो जो नज़रों में समाये बैठे हैं
हमसे ही नज़रे चुराए बैठे हैं

राहों में आँख बिछाये बैठे है
आस का दीपक जलाये वैठे हैं

है एतमाद तुझी पर हम को तो बस
हम तो तुझसे लौ लगाये वैठे है

ले के हम तो बस अपने आँचल में
माँ की हम हज़ारों ही दुआयें बैठे हैं

हर धर्म ने दिए पैगाम फ़क़त प्यार के
हम क्यों नफ़रत फैलाये बैठे है

अच्छे वक्त की उम्मीद में ही हम तुम
कितने अरमान सजाये बैठे हैं

वो इक आंगन जो था साँझा सबका
उसमें दीवार बनाये बैठे हैं

पाठ सभी को अमन का देने वाले
गीता का ज्ञान भुलाये बैठे हैं

खुशियों के तो कोई आसार नही
हाँ गम कबसे मगर आये बैठे है

हैं चिराग ये अब शायद बुझने वाले
क्यों ये अपनी लौ बढ़ाये वैठे है

कौन हुआ है अपना अपनों के सिवा
राज ये दिलको समझाए बैठे है

रहती है फलक पर नजरें तो हमारी
हाँ ज़मी पर पैर जमाये बैठे है

अब है क्या जो न मिलता हो बाज़ार में
हर शै का मोल लगा ये बैठे हैं

यादें हैं कुछ कुछ तन्हाईयाँ भी
प्यार में हम ये सिला पाये बैठे हैं

कुछ दर्द भरे अफसानों का यारब
हम इक दीवान लिखाये बैठे है

.
(c )सरोज सिंह
१ मई २०१७

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग