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सर्विलांस बनाम मौलिक अधिकार

Posted On: 27 Dec, 2018 Politics में

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mukesh87

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हाल ही में सरकार ने IT act 2000 में संशोधन का मन बनाया है, क्योंकि उन्हें लगता है कि राष्ट्र की सुरक्षा के नज़रिए से लोगों की ऑनलाइन गतिविधियों पर और निगरानी रखने की आवश्यकता है और इसके लिये IT actमें नियमों को सरकार के पक्ष में बदलना पड़ेगा। इसी समाचार के साथ मौलिक अधिकारों के पक्षकार फिर से सरकार के विरुद्ध मोर्चा लेकर डट गए हैं, इनमें से ज़्यादातर ऐसे हैं जो एक राष्ट्र और उसके नागरिकों के मध्य अधिकार और कर्तव्य के विनिमय के दर्शन को नहीं समझते और सिर्फ अधिकारों का रोना रोते रहते हैं।
इन्हें इनके कर्तव्यों का ध्यान दिलाते ही आप फासिस्ट घोषित कर दिये जाते हैं, ये स्वयं अपनी तानाशाही माँगों का कभी मूल्यांकन नहीं करते जिन्हें ये लगता है कि संविधान के निर्माता इतने मूर्ख थे कि उन्होंने बस अधिकारों को ही महत्व दिया।
ये हर अधिकार को ‘पूर्ण अधिकार’ अर्थात absolute right समझते है जो कि उन्हें हर हाल में मिलने ही चाहिये भले ही राष्ट्र पर या समाज पर उसका प्रतिकूल असर ही क्यों न हो।

सरकार के फैसले से इनका ‘निजता का अधिकार’ खतरे में आ गया है। अधिकारों के लिये लड़ना अच्छी बात है लेकिन बवाल खड़ा करने से पहले आवश्यक है कि हम तार्किक ढंग से ज़रा अपने अधिकारों की सीमा पर विचार कर लें।
निस्संदेह मौलिक अधिकार बहुत ही महत्वपूर्ण हैं लेकिन हर मौलिक अधिकार absolute नहीं है।
यदि उदाहरण से समझें तो अनुच्छेद 17 के तहत दिया गया ‘छुआछूत के विरुद्ध अधिकार’ तो absolute है जिसपर किसी भी दशा में अंकुश नहीं लगाया जा सकता किन्तु ,
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) जो भारतीय नागरिकों को विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है और अनुच्छेद 21 जो तहत प्राण और देह की स्वतंत्रता का अधिकार देता है,ध्यातव्य है कि 2017 में पुत्तुस्वामी मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने ‘निजता के अधिकार’ जो इसी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत है, एक मौलिक अधिकार माना है।

इन दोनों ही अनुच्छेद के अंतर्गत प्रदत्त अधिकार absolute नहीं हैं अर्थात इन अधिकारों पर युक्तियुक्त निर्बंधन (reasonable restriction) लगाया जा सकता है , जैसे कि वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भारत की एकता एवं संप्रभुता,राज्य की सुरक्षा,विदेशी राज्यों से मित्रवत संबंध,नैतिकता, जैसे आधारों पर कम किया जा सकता है और प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ अर्थात कानून द्वारा सीमित किया जा सकता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संसद कोई भी कानून बनाकर इस अधिकार पर अंकुश लगा सकेगी, मेनका गांधी बनाम भारत संघ मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसा कानून ‘उचित व न्यायपूर्ण’ होना चाहिये। अब कौन सा कानून ‘ उचित और न्यायपूर्ण’ है या नहीं इसका निर्धारण कैसे हो?
याद होगा कि आधार की अनिवार्यता के मामले भी ‘निजता के हनन’ का मुद्दा गरमाया था। आधार मामले की सुनवाई करते समय माननीय उच्चतम न्यायालय ने इस बात को स्पष्ट किया कि यदि राज्य किसी ऐसे लक्ष्य की प्राप्ति के लिये कोई कार्य करना चाहती है जिसमें आनुपातिक रूप से एक बड़ी जनसंख्या लाभान्वित होती है तो उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये उपलब्ध विकल्पों पर विचार किया जाएगा और उन विकल्पों में वह विकल्प उचित व न्यायपूर्ण कहा जाएगा जो कम से कम मौलिक अधिकारों का हनन करता हो। इसी आधार पर सरकार को कल्याणकारी योजनाओं के लिये आधार की अनिवार्यता को चालू रखने की छूट भी मिली थी और अधिकारों के अंध समर्थक और राजनीतिक शृगाल शांत हो गए थे।
अब सर्विलांस के मुद्दे पर फिर वही बहस छिड़ी है।

क्या सरकार को यही छूट सर्विलांस का दायरा बढ़ाने के लिये भी दी जा सकती है? चूंकि मामला ‘निजता के अधिकार’ से जुड़ा है तो इससे संबंधित कानून भी ‘उचित व न्यायपूर्ण’ और अनुपातिक रूप से लोकमंगलकारी होना आवश्यक है।
हमारे देश मे इस समय दो कानून हैं जिसके आधार पर किसी भी निवासी का फ़ोन टैप किया जा सकता है या इंटरनेट से जुड़ी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की निगरानी की जा सकती है ,
एक तो है टेलीग्राफ एक्ट 1885 और दूसरी IT एक्ट 2000 ।

1997 में कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि जॉइंट सेक्रेटरी रैंक का अधिकारी ही सर्विलांस के लिये आदेश दे सकता है। कोर्ट ने तो ये सोचा कि जितना बड़ा पद होगा उतनी ही जिम्मेदारी और गंभीरता से सर्विलांस के मुद्दे पर विचार के बाद ही आदेश दिया जाएगा । किन्तु 2014 में एक RTI से खुलासा हुआ कि जॉइंट सेक्रेटरी महोदय औसतन रोज 250 लोगों के सर्विलांस के आदेश देते हैं, अब वो सिर्फ यही काम तो करते नहीं होंगे अन्य काम भी करते ही होंगे और सिर्फ यही भी करते हों तो भी 250 ऐसे प्रस्तावों पर विचार किसी महामानव के लिये भी सम्भव नहीं हो सकता। स्पष्ट है कि सिर्फ़ हस्ताक्षर करके खानापूर्ति की जाती है।
यदि एक काल्पनिक स्थिति में ये मान भी लिया जाए कि ऐसे सभी मामलों पर वो भली भाँति विचार करते भी होंगे तो एक अन्य समस्या खड़ी होती है। समस्या यह है कि जॉइंट सेक्रेटरी साहब जिन आधारों पर सर्विलांस के मामले का निर्धारण करते हैं वे वही आधार हैं जो अनुच्छेद 19(2) में दिये गए हैं । ये आधार जो अनुच्छेद 19(2) में दिये गए हैं ये बहुत स्पष्ट नहीं हैं, जैसे कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’, ‘विदेशी राज्यों से संबंध’ आदि । इन्हें परिभाषित नहीं किये जाने के कारण सर्विलांस का आदेश लगभग यादृच्छिक ही कहा जा सकता है। ऐसा जानबूझ कर किया गया होगा क्योंकि किसी विषय को परिभाषित कर देने का अर्थ होता है उसका दायरा कम करना,जैसा कि दार्शनिक स्पिनोज़ा कहता है “to define is to limit” । हर राज्य इन मामलों में गेंद अपने पाले में रखना चाहता है , और इसी वजह से इसका दुरुपयोग भी होने की संभावना रहती है।
किन्तु इसके बावज़ूद सर्विलांस बहुत उपयोगी हथियार है जिसकी मदद से हम आतंकवादियों, उग्रवादियों, व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरनाक तत्वों से मुकाबला कर सकते हैं, इसके अतिरिक्त दंगों, आंतरिक उपद्रव, व विभिन्न अपराधों से निपटने में भी यह सहायक है। आनुपातिकता की दृष्टि से देखा जाए तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये आवश्यक ख़ुफ़िया सूचना एकत्र करने में सर्विलांस उपलब्ध विकल्पों में एक ऐसा विकल्प है जिससे न्यूनतम अधिकारों का हनन होता है।

लोकतंत्र में हमने अपनी और अपने राष्ट्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी संसद के माध्यम से सरकार को इसीलिये दी है कि वो हमारे हित में निर्णय ले सके और सरकार यदि समझती है कि सर्विलांस का दायरा बढ़ाए जाने की आवश्यकता है, अन्य एजेंसियों को भी यह अधिकार दिया जाना चाहिये तो बेशक दिया जाना चाहिये किंतु सर्विलांस के मामलों के निर्धारण के लिये आधार और वस्तुनिष्ठ होने चाहिये जिससे निर्णयन त्वरित हो , प्रभावी हो, और न्यायपूर्ण हो। इसके साथ ही इस बात का भी ख्याल रखा जाए कि सर्विलांस का निर्धारण खानापूर्ति न हो जाए, हर मामले का मेरिट के आधार पर परीक्षण किया जाए, यह कार्य किसी एक अधिकारी द्वारा नहीं किया जा सकता अतः अधिकारियों का पैनल मामले की संवेदनशीलता के आधार पर निर्णय ले। लेकिन सरकारों को भी नैतिक रूप से इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जनता जनार्दन ने उन्हें ये अधिकार इसलिये दे रखे हैं जिससे वे राष्ट्रहित में कार्य कर सकें, व्यक्तिगत या राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिये ऐसे अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये।

– मुकेश मिश्र

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