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भारतीय समाज और वर्ण व्यवस्था (Indian Society and Varna Vyavastha)

Posted On: 18 Aug, 2012 Others में

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अजय सिंह नागपुरे

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वैसे तो मै जाती धर्म पर आज की परिस्तिथियो में अपना मत नहीं रखना चाहता, क्योकि आज ये हमारे समाज को जोडती नहीं तोड़ रही है. परन्तु यह भी सच है अगर समाज किसी बात लेकर गलत अवधारणा रखता हो, तो हमे उस पर अपने विचार जरूर प्रस्तुत करने चाहिये. मै आज हिन्दू समाज और वर्ण वयवस्था पर बात करना चाहुगा. क्योकि वर्ण वयवस्था को लेकर आज हमारे बीच काफी भ्रान्तिया है, चाहे वो हिन्दू हो या किसी और धर्म का वह आज हमारे समाज में दिख रही जातीय संरचना को देखकर इस वयस्था का विवेचना करता है. परन्तु आज मै आप सभी भाइयो को बताना चाह रहा हु, की आज आप जो देख रहे हो, वो इस वयवस्था को बिगड़ा हुआ स्वरुप है. मै आज इस लेख के माध्यम से हिन्दू धर्म और वर्ण वयवस्था पर आधारित कुछ तथ्य प्रस्तुत करना चाहुगा. हिन्दू धर्म के चार वेदों में सबसे पुराने वेद ऋग्वेद में जन्म के आधार पर किसी भी प्रकार की वर्ण वाव्स्था का उल्लेख नहीं है. और महाभारत के शांति पर्व में के पेज नंबर १० में १८८ नंबर श्लोक में लिखा है

ना विशेषो अस्ति वर्णाना सर्वम ब्राम्हमिद जगत।
ब्रहांण पूर्व सष्ट हि कर्मभि वर्णतान्गतम ॥
॥१८८ -१० ॥

अर्तार्थ जन्म से तो हम सभी ब्राह्मण होते है तत्पश्चात हमारे कर्म के हिसाब से हमारा विभाजन होता है. और जो व्यक्ति सिर्फ अपने किसी जाती विशेष में पैदा होने के कारन गर्वित महशूस करता है या हिन् भावना से ग्रसित होता है, वह इश्वर का अपमान करता है. क्योकि इश्वर ने तो हमे एक सा बनया है और हम अगर इश्वर की बनाई चीज का अपमान करते है तो हम उनका अपमान करते है. मैंने अक्सर देखा है की लोग हमसे हमारी जाती पूछते है, जो की सर्वथा गलत है, और हम, जिसमे मै अपने आप को भी शामिल करना चाहुगा, अभी इस मानसिकता से नहीं निकले है. अब दूसरा पहलु, हममे से कुछ लोग अपनी जाती बताने से शरमाते है, तो मै उनसे कहना चाहुगा की अगर आप इस तरह की भावना रखते है तो यहाँ ये सर्वथा गलत है. आप को किसी भी तरह से हिन् भावना महसूस करने की जरूरत नहीं है, क्योकि आपने दुनिया के किसी कोने में, किसी जाती या किसी धर्म में जन्म लिया, ये सब इश्वर की मर्जी है, आपकी नहीं. और जो व्यक्ति इस आधार पर आपसे भेदभाव रखता है वह न सिर्फ इश्वर का मजाक उडाता है बल्कि साथ ही साथ अपनी शंकिर्ण मानसिकता का परिचय भी देता है. ब्राम्हण के बारे में महाभारत के शांति पर्व में लिखा है, की जो ज्ञानी है, और जो इश्वर की हर कृति का सम्मान करता है, उन्हें जानता है वह ब्राम्हण है. और जो व्यक्ति वर्ण वयवस्था को जाती के आधार पर बाटते है वो वास्तविक रूप में हमारे इस वयवस्था के शत्रु है. आपको यह बताना चाहुगा की सम्पूर्ण विश्व के हर देश में वर्ण वयवस्था कायम है. और जाती व्यवस्था तो भारतीय समाज में आई एक घ्रणित विक्रती है. और कुछ सवार्थी लोगो ने इस वयवस्था को कलंकित किया है. और यह सिर्फ कुछ सौ वर्षो के अन्तराल में हुआ है. अगर कोई भी व्यक्ति हिन्दू धर्म की विवेचना इन कुछ वर्षो और वर्तमान जातीय वयवस्था के आधार पर करते है तो मेरा उनसे निवेदन है की वो हामरे वेदों का जाकर पड़े. जिनसे आज भी सारा विश्व सिख रहा है. भारतीय दर्शन के लोकप्रिय और व्यवहारिक ग्रन्थ गीता में लिखा है

ब्राम्हण क्षत्रिय विन्षा शुद्राणच परतपः।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभाव प्रभवे गुणिः ॥
गीता॥१८-१४१॥

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
गीता॥४-१३॥

अर्तार्थ ब्राह्मण, क्षत्रिया , शुद्र वैश्य का विभाजन व्यक्ति के कर्म और गुणों के हिसाब से होता है, न की जन्म के. गीता में भगवन श्री कृष्ण ने और अधिक स्पस्ट करते हुए लिखा है की की वर्णों की व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर होती है. भारतीय आध्यात्म में भागवान को भी वर्ण के हिसाब से बाटा गया है. ब्रम्हा, जिन्होंने हमे इस संसार में लाया, दुसरे विष्णु जिन्होंने हमारा पालन किया और भगवन शिव जिन्हें आज पुरे भारत में सबसे ज्यादा पूजा जाता है, और जिन्हें कल्याण करने वाला या सेवा करने वाला कहा जाता है. और जो शिव लोगो की सेवा करते है या कल्याण करते है , उन्हें सबसे ज्यादा पूजा जाता है. यह बात अनुकरणीय है की वेदव्यास जिन्होंने महाभारत और बहोत सारे ग्रंथो की रचना की उनकी माँ शुद्र वर्ण में थी न की ब्राह्मण. और पुरातन या वैदिक भारतीय समाज में विवाह जाती देख कर कभी नहीं होते थे, ये जो आज आप आज देख रहे है ये हमारे समाज की विक्रति है न की जो हमारे वास्तविकता. मह्रिषी वाल्मीकि जिन्होंने रामायण जैसे महाकव्य की रचना की उनका जन्म सूद्र वर्ण वाले पिता के यहाँ हुआ था, परन्तु वो तो ब्राह्मण कहलाते है. भारतीय समाज में वर्णों के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव कभी नहीं था, जो आज आपको दिख रहा है. आपकी जानकरी के कहुगा की भगवन श्रीराम की माता सुमित्रा के पिता ब्रह्मण वर्ण के और माता सूद्र वर्ण की थी. जिस भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत है उनके पिता दुष्यंत क्षत्रिया थे और माता मेनका रूपी अप्सरा की पुत्री शकुन्तला थी. भगवन श्री क्रष्ण की माता असुर वंस की थी जबकि पिता वासुदेव क्षत्रिया थे.ये सब बाते यह चरितार्थ करती है की भारतीय समाज या हिन्दू दर्शन में किसी जातीगत भेद का उल्लेख कभी नहीं रहा, और वर्ण व्यवस्था आज हर जगह है , सिर्फ नाम बदल गय है. और जो व्यक्ति विकृत ग्रंथो के आधार पर हिन्दू दर्शन को परिभाषित करते है उनसे मेरा निवेदन है की. भारतीय समाज के आधार स्तम्भ चार वेदों जिनका अनुसुरण विश्व के सारे देश कर रहे है और श्रीमद भगवत गीता का ध्यान पूर्वक अध्यन करे.

धन्यवाद्
अजय सिंह नागपुरे

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