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कभी कभी ये ज़िंदगी

Posted On: 31 Aug, 2011 Others में

सफर ख्वाबों का........मासूम ख्वाहिशें खुद से खुदा से

नंदिनी

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कभी कभी ये ज़िंदगी

सूनापन दे जाती है

हँसते मुस्कुराते चेहरे को

सूना सूना सा कर जाती है

खिलते है हर सू गुल जब

आंगन में पतझड़ का मौसम लाती है

कभी कभी ये ज़िंदगी

बैचेन बड़ा कर जाती है

गुनगुनाते लबो को

रुखा सूखा सा कर जाती है

गीत सजते है  महफिलों में जब

दरो दीवारों को में मेरी

रुआंसा सा कर जाती है

कभी कभी ये ज़िंदगी

बेगानापन ले आती है

रिश्ते नातो कि इस भीड़ में

बेगाने चेहरे कई दिखाती है

अपनों के बीच में भी

तन्हा अकेला कर जाती है

कभी कभी ये ज़िंदगी

ख्वाबो कि दुनिया में ले जाती है

सोता है जब ये जहां

परियां मेरे आंगन में उतर आती है

दरो दीवारों को मेरे सजाती है

गीत नए गुनगुनाती है

रिश्ते नए निभाती है

कभी कभी ये ज़िंदगी

ख्वाबो में ही सही

सुन्दर सलोनी हो जाती है

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