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“ओम शांति। ओम शांति।“

Posted On: 28 May, 2012 Others में

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yogeshdattjoshi

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“ओम शांति। ओम शांति।“

बहुत दिनो के बाद एक उपयुक्त विषय मिला लिखने के लिए। खैर, दिन प्रतिदिन के वार्तालाप मे घुम फिरकर एक विषय अवश्य आता है भगवान और उससे जुडी हुई कई बातें और किस्से-कहानियाँ।
अलग अलग जाति की विशेष टिप्पणियाँ और मान्यताएँ। विशेष धर्म कि विशेष धारणा और क्रियाकलाप। धर्म में जहां मनुष्य को सीखने के लिए एक उप्युक्त दिशा मिलती है उससे कहीं ज्यादा महत्वपुर्ण मानसिक शांति। दैनिक जीवन में मनुष्य किसी न किसी कार्य में उलझा रहता है। कई बार ऐसे हालात भी आते है जब वो थककर बिस्तर पर सोना चाहता है उसे नींद नहीं आती। क्यों?
दैनिक जीवन में जीने के लिए हमें चाहिए रोटी, कपडा और मकान्। यह जरुरते पूरी होती है पैसे से। अब हम उसके लिए या तो किसी के अधीन होकर कार्य करते है या फिर अपना ही स्वरोजगार करते है। पर दोनो ही रुप में हम इसके लिए दूसरे के अधीन ही है। अगर हम नौकरी करते है तो लोग हमें अपना नौकर समझकर शारीरिक शोषण करते है और मानसिक कष्ट देते है। अगर हम स्वरोजगार करते है तो लोग उधार लेकर और पैसे ना चुकाकर मानसिक कष्ट देते है। फलस्वरुप व्यक्ति का दिन का चैन और रातों की नींद उड जाती है। इस तरह कमाया गया पैसा अगर व्यक्ति अपनी बीमारी पर खर्च करता है तो उस पैसे से तो पैसा ना कमाना अच्छा है।
“स्वास्थ्य ही धन है।“ अगर स्वास्थ्य ही नहीं तो धन का क्या लाभ।
साथ ही रोजगार न होना उससे भी बडा अभिशाप है। बेरोजगार व्यक्ति समाज में कहीं सम्मान नहीं पाता और धीरे धीरे अपने ही परिवार में हीन समझा जाता है।
इस तरह लोग आत्महत्या की ओर कदम बढाते है। और कुछ लोग धर्म की ओर झुकते चले जाते है।
दु:ख में सिमरन सब करे सुख में करे ना कोय।
जो सुख में सिमरन करे तो दु:ख काहे को होय॥

जब किसी कि पहली इच्छा पूरी हो जाती है तो दूसरी जन्म ले लेती है। धन प्राप्ति के उपरान्त हमारी जरूरत क्या है?

शांति।
और अब इस शब्द के साथ एक शब्द “ओम” और जोड दिया जाए तो……………

ओम शांति। ओम शांति।

आनन्द।

परमानन्द।

पर जब धन कमाते कमाते ही शांति नहीं है तो बाद में कहाँ से मिलेगी। भगवान ने तो दे दिया सब कुछ अब आप ही मौका चुकेंगे तो उसका क्या दोष। दो आँखें दी पर आप देख नही पाए, दो पैर दिए आप आगे बढ नहीं पाए, दिमाग दिया पर सोच नहीं पाए, हाथ दिए पर कुछ कर नहीं पाए और मन्दिर में चल दिए झोली फैलाए।

ऐसे मनुष्य को और भी बडा दु:ख झेलना पडता है।

धर्म की राह पर ही शांति है। इसलिए कम से कम दो बार ये शब्द “ओम शांति। ओम शांति।“
जरुर दोहराए और शांति पाए।

एक बात और मैं नास्तिक हूँ। पर जब में यह बात किसी को बताता हूँ तो उसके धार्मिक प्रवचन शुरु हो जाते है। एक दिन सबको मरना है। मौत ही सत्य है।……………………

अगर इतना दु:ख संसार में है तो भगवान क्या गोल गप्पे खा रहा है।

खैर यह मेरी व्यक्तिगत धारणा है। भगवान है या नही पर अगर किसी को कोई अच्छी राह मिलती है इससे बडी और क्या चीज हो सकती है। वैसे नास्तिक आस्तिक से कहीं अधिक भगवान को याद करता है। क्योंकि उसकी हर असफलता पर वो उसे गाली देता है तो सबसे बडा भक्त एक नास्तिक है आस्तिक नहीं।

अगर किसी व्यक्ति विशेष को कष्ट पहुँचा हो तो क्षमा करे।

अंत में कम से कम दो बार ये शब्द “ओम शांति। ओम शांति।“ जरुर दोहराए और शांति पाए।

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