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असम दंगा: क्या सोशल मीडिया बना हिंसा का मुख्य जरिया?

Posted On: 23 Aug, 2012 Hindi News में

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assamपिछले महीने असम में हुई सांप्रदायिक हिंसा से किसी को अंदेशा नहीं था कि यह देश के दूसरे हिस्सों में भी आग की तरह फैल जाएगी. कुछ शरारती तत्व इस खबर का इस्तेमाल करके सोशल मीडिया और मोबाइल के जरिए लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करेंगे. असम में बोडो हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष जुलाई के महीने में कोकराझार से शुरू हुआ और जिसने धीरे-धीरे असम के कई क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया जिसमें चिरांग, धुबरी तथा बकसा जिले शामिल हैं. इस हिंसा में कई लोगों ने अपनी जान गंवाई तो कईयों का घर जलकर राख हो गया तो कई असम राज्य छोड़ कर दूसरे राज्यों को जाने के लिए मजबूर हो गए.


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यह हिंसा इतना बड़ा था कि इसकी चपेट में दूसरे राज्य भी शामिल हो गए. इसकी बानगी उस समय देखने को मिली जब महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में पूर्वोत्तर राज्य असम में हुए दंगों के विरोध में विरोध-प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया. इस हिंसा में दो लोग मारे गए और कई वाहनों को भी जला दिया गया. इस घटना के बाद मुंबई और पूरे राज्य में हाई-अलर्ट घोषित कर दिया गया और सुरक्षा-व्यवस्था बढ़ाई गई. इस हिंसा की गूंज संसद में भी सुनाई दी जहां नेताओं ने अपने-अपने तरीके से इसकी भर्त्सना की.


इस घटना के बाद पूर्वोत्तर राज्य के लोगों को एक साजिश के तहत इस्तेमाल किया जाने लगा. कुछ शरारती तत्व सोशल मीडिया और मोबाइल के माध्यम से पूर्वोत्तर के लोगों को भड़काने लगे. उत्तेजक और आपत्तिजनक तस्वीरों का सहारा लेकर यह शरारती तत्व देश में अफरातफरी और दहशत का महौल खड़ा करने लगे. एसएमएस और वेबसाइटों के जरिए फैली अफवाहों के चलते बैंगलौर और हैदराबाद जैसे शहरों में बसे पूर्वोत्तर के लाखों लोग वापस लौटने को मजबूर हुए थे. अफवाह का स्तर इतना गहरा था कि सरकार के लाख प्रयास के बाद भी पूर्वोत्तर के लोग पलायन पर मजबूर हो गए. अंत में सरकार ने मजबूरन अफवाह फैलाने वाली 254 वेबसाइटों पर पाबंदी लगा दी और जबकि इससे पहले ही सरकार ने 15 दिन तक थोक एसएमएस और एमएमएस पर पाबंदी लगा दी थी.


ऐसा माना जा रहा है कि असम में दंगे और बंगलौर से पूर्वोत्तर के लोगों के वापस लौटने में कहीं न कहीं सोशल मीडिया का बड़ा हाथ है. सरकार का मानना है कि भय और अफवाह फैलाने के लिए शरारती तत्वों ने फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों का जमकर प्रयोग किया. अगर आप फेसबुक पर हैं तो आपने ज़रूर ऐसी तस्वीरें देखी होंगी जो भड़काऊ और उत्तेजक हैं और जिन्हें अचानक देखने पर लगता है कि ये तस्वीरें बिल्कुल सच्ची हैं. लेकिन जांच से पता चला कि यह तस्वीरें भारत की नहीं हैं और विदेशों से अपलोड किया गया था. यह तस्वीरें इतनी भड़काऊ हैं कि आम लोग इसे शेयर किए बिना रह ही नहीं सकते.


जिस तरह से दहशत फैलाने के लिए मोबाइल, सोशल मीडिया और वेबसाइटों का इस्तेमाल किया जा रहा है उसमें माना जा रहा है कि इसमें कहीं न कहीं पाकिस्तान का हाथ है. हम सब जानते हैं कि पाकिस्तान को भारत की तरक्की और शांति कभी रास नहीं आई. वह हर समय फिराक में रहता है कि कैसे भारत में दो समुदायों के बीच हिंसा फैलाई जाए.


एक जरूरी सवाल जिस पर आप अपने विचार टिप्पणी या स्वतंत्र ब्लॉग के रूप में लिख कर जारी कर सकते है

तकनीक के अच्छे पक्ष को किस तरह से एक बुरे उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया गया, असम मामला और पूर्वोत्तर के लोगों का पलायन इसका एक ज्वलंत नमूना है. इसलिए आज सबसे जरूरी सवाल यह है कि क्या भारत में भी चीन की तरह सोशल मीडिया के लिए मानक नियंत्रण प्रणाली स्थापित करके उसे बाध्य किया जाए ताकि देश के खिलाफ प्रचार सामग्री पर लगाम कसी जा सके?


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