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मुजफ्फरनगर दंगा: दंगों के दाग से सना है उत्तर प्रदेश

Posted On: 9 Sep, 2013 Hindi News में

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उत्तर प्रदेश एक बार फिर दंगों की चपेट में है. मुजफ्फरनगर जिले में दो समूहों में भड़की हिंसा में मरने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. अधिकारियों के मुताबिक अब तक 28 लोगों की जान चली गई है और 40 लोग घायल हुए हैं. मुजफ्फरनगर में भड़की हिंसा अखिलेश सरकार की लापरवाही का नतीजा बताया जा रहा है.


Muzaffarnagar violenceउल्लेखनीय है कि मुजफ्फरनगर में 27 अगस्त को छेड़छाड़ की एक घटना के बाद भड़की हिंसा में तीन लोगों की मौत हो गई थी. इसके बाद से ही पूरे मुजफ्फरनगर में दोनों समुदायों के बीच तनाव बना हुआ था. यह तनाव बाद के दिनों में अखिलेश सरकार की लापरवाहियों के बाद और ज्यादा बढ़ गया. दंगे की आग मुजफ्फरनगर में ही नहीं मेरठ के हस्तिनापुर और रामराज इलाके में भी देखने को मिली.


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बताया जा रहा है कि मुजफ्फरनगर में भड़की हिंसा के पीछे कुछ नेताओं का हाथ है जिन्होंने दोनो समूहों के लोगों को भड़काने का काम किया है. इस मामले में केस भी दर्ज किया गया है और इन नेताओं के खिलाफ भी कार्रवाई की बात कही जा रही है. फिलहाल पुलिस और सेना मुजफ्फरनगर जिले में स्थिति को नियंत्रित करने में जुटी हुई है. ज्यादातर इलाकों में हिंसा पर काबू पा लिया गया है.


वैसे यह पहला मामला नहीं है जब उत्तर प्रदेश की जनता हिंसा का शिकार हुई हो. अब तक के अखिलेश यादव के डेढ़ वर्ष के शासन काल में जनता  कई बार हिंसा देख चुकी है.


पिछले कुछ महीनों पर यदि नजर डाले तो उत्तर प्रदेश मूक प्रशासन और सरकार के ढुलमुल रवैये के बीच मथुरा, बरेली, प्रतापगढ़, इलाहाबाद मेरठ, के साथ-साथ राजधानी लखनऊ कई दिनों तक सांप्रदायिकता की आग में झुलसती रही. एक ओर जहां बरेली और कोसीकलां जैसे शहरों के बाजारों के कई दिन बंद रहने से यहां के रहवासियों को भारी नुकसान झेलना पड़ा, वहीं इन दंगों में कई लोगों ने अपनी जान गंवाई और सैकड़ों जख्मी भी हुए.


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सरकार के आंकड़े ही बताते हैं कि बीते डेढ़ साल में राज्य के अलग अलग हिस्सों में 30 दंगे हुए हैं और इन दंगों के दौरान 58 जानें जा चुकी हैं. इसी साल फरवरी में उत्तर प्रदेश विधानसभा में सरकार ने जो जवाब दिया था, उसमें सपा सरकार के दौरान 27 दंगों की जानकारी दी गई थी. इसके बाद से तीन और दंगे हुए हैं.


जिस उम्मीद के साथ डेढ़ साल पहले उत्तर प्रदेश की जनता ने ‘बदलाव के वाहक’ के तौर पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार को कमान सौपा था उसमे वह पूरी तरह से विफल रहे हैं. इस नौजवान मुख्यमंत्री के शासन काल में न केवल हिंसा बल्कि डकैती, बलात्कार और शारीरिक उत्पीड़न के मामले भी बढ़े हैं. प्रदेश में गुंडाराज की वापसी से एक फिर साबित हो गया कि मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी गुंडों को संरक्षण देने वाली पार्टी है.


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