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आज से महिलाओं के लिए खुल गए सबरीमाला के द्वार, एक फिल्म अभिनेत्री की एंट्री से शुरू हुआ था विवाद

Posted On: 17 Oct, 2018 Hindi News में

Pratima Jaiswal

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सबरीमाला मंदिर के कपाट पारंपरिक मासिक पूजा के लिए खुल रहे हैं। सबरीमाला पर महिलाओं की एंट्री पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद महिलाओं की एक लड़ाई तो जीत हुई, लेकिन इस फैसले का विरोध करने के लिए खुद महिलाओं का एक वर्ग सड़कों पर उतर आया है।
मंदिर परिसर के बाहर विरोध-प्रदर्शन और तनाव की स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने भी पूरी तैयारी कर ली है और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। अब देखना ये है बिना किसी और विवाद के मंदिर में महिलाओं की शांतिपूर्वक एंट्री हो पाती है या नहीं। महिलाओं के प्रवेश के अलावा इस मुद्दे से जुड़ी हुई ऐसी कई बातें हैं, जिसे जानने के लिए लोगों की दिलचस्पी अचानक ही बढ़ गई है।

 

 

 

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में बना है सबरीमाला मंदिर
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किमी की दूरी पर पंपा है, वहाँ से चार-पांच किमी की दूरी पर पश्चिम घाट से सह्यपर्वत श्रृंखलाओं के घने वनों के बीच, समुद्रतल से लगभग 1000 मीटर की ऊंचाई पर सबरीमला मंदिर स्थित है। मक्का-मदीना के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है, जहां हर साल करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
शबरीमला शैव और वैष्णवों के बीच की अद्भुत कड़ी है। मलयालम में ‘शबरीमला’ का अर्थ होता है, पर्वत। वास्तव में यह स्थान सह्याद्रि पर्वतमाला से घिरे हुए पथनाथिटा जिले में स्थित है। पंपा से सबरीमाला तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है। यह रास्ता पांच किलोमीटर लंबा है।

 

कब खुलता है सबरीमाला मंदिर
दूसरे हिंदूं मंदिरों की तरह सबरीमाला मंदिर सालभर नहीं केवल मलयालम कैलेंडर के मुताबिक हर महीने के पांचवे दिन खुलता है. मंदिर को मलयालम थुलाम महीने में पांच दिन की मासिक पूजा के बाद 22 अक्टूबर 2017 को बंद कर दिया गया था.

 

 

मंदिर से जुड़ी व्यवस्था और नियम
सबरीमाला में स्थित इस मंदिर प्रबंधन का कार्य इस समय त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड देखती है. जो केरल सरकार से मान्यता प्राप्त है. थाजामोन मोडोम यहां के पारम्पिक पुजारियों का परिवार है, जिसे तंत्रियों का परिवार कहा जाता है. जो यहां के धार्मिक मामलों के फैसले लेते हैं.

 

मंदिर में अभिनेत्री के प्रवेश को लेकर मचा था बवाल
2006 में मंदिर के मुख्य ज्योतिषि परप्पनगडी उन्नीकृष्णन ने कहा था कि मंदिर में स्थापित अयप्पा अपनी ताकत खो रहे हैं और वह इसलिए नाराज हैं क्योंकि मंदिर में किसी युवा महिला ने प्रवेश किया है। इसके बाद ही कन्नड़ ऐक्टर प्रभाकर की पत्नी जयमाला ने दावा किया था कि उन्होंने अयप्पा की मूर्ति को छुआ और उनकी वजह से अयप्पा नाराज हुए। उन्होंने कहा था कि वह प्रायश्चित करना चाहती हैं। अभिनेत्री जयमाला ने दावा किया था कि 1987 में अपने पति के साथ जब वह मंदिर में दर्शन करने गई थीं तो भीड़ की वजह से धक्का लगने के चलते वह गर्भगृह पहुंच गईं और भगवान अयप्पा के चरणों में गिर गईं। जयमाला का कहना था कि वहां पुजारी ने उन्हें फूल भी दिए थे।

 

 

अभिनेत्री के खिलाफ दर्ज किया गया था केस
जयमाला के दावे पर केरल में हंगामा होने के बाद मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होने के इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान गया। 2006 में राज्य के यंग लॉयर्स असोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दायर की। इसके बावजूद अगले 10 साल तक महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का मामला लटका रहा।

 

 

महिलाओं के प्रवेश की अनुमति को लेकर 2006 में एक संस्था ने दायर की याचिका
जयमाला के दावे पर केरल में हंगामा होने के बाद मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होने के इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान गया। 2006 में राज्य के यंग लॉयर्स असोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दायर की। इसके बावजूद अगले 10 साल तक महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का मामला लटका रहा।

 

इसी साल सितम्बर में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला
11 जुलाई 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर रोक का यह मामला संवैधानिक पीठ को भेजा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसा इसलिए क्योंकि यह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का मामला है और इन अधिकारों के मुताबिक महिलाओं को प्रवेश से रोका नहीं जाना चाहिए। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने मामला संविधान पीठ को सौंप दिया था और जुलाई, 2018 में पांच जजों की बेंच ने मामले की सुनवाई शुरू की थी।

 

 

फैसले की खास बातें

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर अंत में आदेश दिया कि हर उम्र की महिला केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर सकती है।
28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने 4-1 के बहुमत से इस पर फैसला सुनाया। कहा कि “सबरीमाला में महिलाओं को गैर-धार्मिक कारणों से प्रतिबंधित किया गया है, जो सदियों से जारी भेदभाव है। पितृसत्ता के नाम पर समानता के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पीरियड्स की आड़ लेकर लगाई गई पाबंदी महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है”।

लेकिन अलग रही महिला जस्टिस की राय जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ ने चीफ जस्टिस के इस फैसले का समर्थन किया। मगर संविधान पीठ में शामिल एकमात्र महिला जस्टिस इन्दु मल्होत्रा का फैसला विपरीत रहा। उन्होंने कहा कि “सती जैसी सामाजिक कुरीतियों से इतर यह तय करना अदालत का काम नहीं है कि कौन- सी धार्मिक परंपराएं खत्म की जाएं”।अंत में 4-1 के जजों के मत से अनुसार महिलाओं के हक में फैसला हुआ…Next

 

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