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अमृतसर में निरंकारी सत्संग पर हुआ ग्रेनेड अटैक, जानें कौन हैं निरंकारी सिख

Posted On: 19 Nov, 2018 Hindi News में

Pratima Jaiswal

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अमृतसर में निरंकारी सत्संग पर हुए ग्रेनेड अटैक ने न केवल पंजाब सूबे को हिला दिया है बल्कि कुछ बड़ी आशंकाएं भी खड़ी हो गई हैं। रविवार को धार्मिक डेरे के कार्यक्रम में हुए इस हमले ने 1980 के दशक की उस पंजाब की याद दिला दी है जब निरंकारियों व सिखों के बीच हिंसा ने खालिस्तान आंदोलन का उग्र रूप देखा था और पंजाब में आतंकवाद चरम पर पहुंच गया। फिलहाल राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इस मामले की जांच अपने हाथों में ले ली है।
ऐसे में सभी के मन में सवाल उठ रहा है कि निरंकारी सिख कौन हैं?

 

 

गुरु ग्रंथ साहिब नहीं, जीवित गुरुओं को मानते हैं निरंकारी
निरंकारी समुदाय को रूढ़िवादी सिखों द्वारा विधर्मी माना जाता है क्योंकि वह गुरु ग्रंथ साहिब के बजाय जीवित गुरुओं पर यकीन करते हैं। इस वजह से ये कट्टरपंथियों का मुख्य निशाना होते हैं। 13 अप्रैल 1978 में जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में हुई एक हिंसा में 13 लोग मारे गए थे, जिसके बाद तबके अकाल तख्त जाठेदार साधु सिंह ने सभी सिखों को निरंकारियों से संबंध तोड़ने का फरमान सुनाया था।

 

ऐसे हुई थी निरंकारी की शुरुआत
निरंकारी मिशन की शुरुआत सिख धर्म के भीतर ही एक पंथ के रूप में हुई थी। 1929 में पेशावर (अब पाकिस्तान में) में बूटा सिंह ने निरंकारी मिशन की शुरुआत की थी। निरंकारियों ने सिखों के गुरुग्रंथ साहिब को गुरु मानने की पंरपरा का बहिष्कार करते हुए जीवित गुरु को मानने की बात कही। बंटवारे के बाद दिल्ली में निरंकारियों का मुख्यालय बना। बूटा सिंह, अवतार सिंह, बाबा गुरबचन सिंह, बाबा हरदेव सिंह, माता सविंदर हरदेव और माता सुदीक्षा निरंकारियों के 6 गुरु हुए। फिलहाल माता सुदीक्षा ही निरंकारियों की गुरु हैं।

 

 

 

निरंकारियों और सिखों के बीच ऐसे शुरू हुआ हिंसा दौर
13 अप्रैल 1978 को अमृतसर में ही निरंकारी मिशन के एक कार्यक्रम के दौरान निरंकारियों और सिखों के बीच हिंसक संघर्ष में 16 लोग (3 निरंकारी, 13 सिख) मारे गए। इस घटना के बाद अकाल तख्त ने हुकमनामा जारी कर निरंकारियों को सिख धर्म से बाहर कर दिया, लेकिन हिंसा का यह दौर यहीं नहीं थमा। इस बीच सिखों ने प्रतिशोध लेने के लिए रणजीत सिंह नाम के एक कार्यकर्ता के नेतृत्व में 24 अप्रैल 1980 को निरंकारी गुरु गुरबचन सिंह की हत्या कर दी। इन दोनों हिंसाओं में आरोप भिंडारवाले पर लगे और उसके समर्थकों पर कई मुकदमे दर्ज हुए। इसके बाद पंजाब में आतंकवाद का खूनी दौर शुरू हो गया…Next

 

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