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इमोशनल अत्याचार (हास्य-व्यंग्य)

Posted On: 19 Jun, 2010 Others में

मैं कवि नहीं हूँ!मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

Nikhil

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जैसे ही जवानी की गाडी में सवार हुए, नज़रें चार करने की हमारी इक्षा का संचार हमारी रगों में बैक्टीरिया बनकर दौड़ने लगा. जब भी बाज़ार निकलते, या मंदिरों में जाते, स्वप्न्सुन्दारियों की तलाश में निगाहें भटक ही जाती थीं. इंतजार का दौर ज्यादा लम्बा नहीं रहा, सब्जी लेने के लिए बाज़ार गए वही उस कातिल अदाओं के दर्शन हो गए. देखते ही दिल में बाल्टी भर-भर के प्यार आने लगा. मन ही मन उस हसीना के हुस्न की तारीफ करने लगे. बोला कुछ नहीं, डरते थे, प्यार के बदले मार न पड़ जाए. अब उपाय तो कोई ढूँढना ही था हसीना के दिल में जगह बनाने को. उस सुन्दर बाला की नज़रों से बचते हुए उसके पीछे हो लिए. ससुराल का पता जानने का तो हक़ बनता था अपना. हिरनी सी चाल से चलते हुए, मेरी सपनों की रानी ने अपने घर के गेट को खोला और मेरे प्यार की गाडी पर ब्रेक लगाते हुए अन्दर चली गयी.

हम भी कहाँ हार मानाने वाले थे. घर पहुंचते ही दोस्तों को उसके बारे में बताया. अब दोस्त तो होते ही हैं लव गुरु. सो सबने अपने-अपने सुझाव मेरे सामने प्रस्तुत कर दिए. सुझावों की फेहरिस्त इतनी लम्बी हो गयी, याद करना मुश्किल हो गया.
इतने सारे सुझाव तो आज तक संसद भवन भी नहीं पहुंचा. लगता है आज का दिन हमारे लिए ख़ास है. तभी तो सुझावों के मामले में हमने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनते हुए देखा. दोस्तों से उनके विचारों को लिख कर छोड़ जाने को बोला. सोचा पढ़ कर देखेंगे कौन सा सुझाव टांका फिट करने में काम आएगा. सुझावों में से अपने लिए लाभदायक मंत्र का चुनाव करने में हमें ज्यादा देर नहीं लगी. हमारे एक मित्र ने उस अनुपम सुंदरी का मोबाइल नंबर और नाम कागज़ पर लिख छोड़ा था. हमने सुंदरी को फोन लगाने से पहले अपने लव गुरु का नंबर डायल किया. पूछने पर पता चला की मेरी फुलझरी उनकी पड़ोसन है. हम तो फुल के गुब्बारा हो गए. खोजा पहाड़ मिला हिमालय, हमने टकाटक अपनी प्रेम की कथा लिखने की तयारी शुरू कर दी.

“हेल्लो, आप बहुत खुबसूरत हो. आपको बाज़ार में सब्जी खरीदते देख अपना दिल हार गए हम”, हमने प्यार के मैदान पर बैटिंग शुरू की.
हमारा तो मन किया की आपकी तस्वीर को अपने पूजाघर में लगा कर, सुबह-शाम आपकी आरती उतरून. लेकिन क्या करता, आँखों के कैमरे से ली हुई तस्वीर कागज़ पर नहीं उतरती. आपने जब टमाटर खरीदा, हाथों से उसको छुआ, मन किया टमाटर बन जाऊं . आपके कोमल हाथों में आकर आपको दिल की बात बताऊँ. मेरे हर शब्द पे हमारी बिल्लो का हँसना, मेरे दिल में हारमोनियम बजा रहा था. हँसते-हँसते उन्होंने मिलने की बात कह दी. कहा दुर्गा रेस्तरां में आईये, वहीँ दिल के तार छेड़ेंगे. हमने मन ही मन अपने सेंचुरी पर खुद की अपनी पीठ ठोंक अपना हौसला बढाया. अब पहले दिन का खेल समाप्त होने की बारी थी. अपने बैट, मेरा मतलब अपने मोबाइल को अपनी जेब में रख हम खाना खाकर सो गए. सपनो में भी ज़ालिम ने पीछा नहीं छोड़ा. आनेवाले कल की बात से मन में एक साथ दो-दो लड्डू फुट रहे थे.

“हाय जान, कैसी हो? आज तो करीना कपूर लग रही हो. देखना कहीं पूरा दरभंगा तुम्हारे पीछे-पीछे, मेरे ससुराल न चला जाये”, स्ट्राइक सँभालते ही पहली बाल पर चौका मरने का प्रयास किया हमने.
हमारी जान ने स्लो बाल डाली और कहा की मुझे देख कर बस मुझे ही देखते रहना चाहती है. बातों और इज्हरों का दौड़ शुरू हुआ. बातें करते-करते उनकी निगाह घडी पर गयी. लेट होने की बात कह वो जाने को उठी. मैंने घडी बनाने वाले वैज्ञानिक को जमकर गालियाँ दी. जब बिल की बारी आई, जेब में हाथ डाला तो हजार रूपये थे. सोचा ३००-४०० में कम बन ही जाएगा. महंगे रेस्तरां में खाने का हमारा पहला अनुभव था. अपने जानेमन को रिक्शे पे बिठा हम काउंटर पर वापस आये. बिल देखते ही माथे पे पसीना आ गया. १५०० रूपये. किसी तरह कल दे जाने की बात कह हम वहां से निकले. प्यार का बुखार चढ़ा ही था सो महंगाई का ख्याल दूर-दूर तक नहीं था. धीरे-धीरे मुलाकातों और बातों का सिलसिला बढ़ता गया.
हर दुसरे दिन, मोबाइल रिचार्ज करना पड़ता था. बिल्लोरानी को हमसे बात किये बिना नींद नहीं आती थी. फ़ोन नहीं करने पे उनका इमोशनल अत्याचार शुरू हो जाता.
“तुम्हें पता है कितना मिस किया तुम्हें मैंने. तुम्हें मेरी बिलकुल परवाह नहीं. तुमतो मुझसे प्यार ही नहीं करते. जाओ में तुमसे बात नहीं करुँगी”, एक दिन फोन क्या नहीं किया, सुंदरी ने गुस्से में फोन काट दिया.
मन ही मन सोचा, फोन कर ही लेता तो अच्छा था. महंगाई की मार से पीड़ित अब हो ही चूका था. इस बात की चिंता सताने लगी की मानाने में १०० का रिचार्ज और प्यार की बात करने के लिए १५० का रिचार्ज. शनिवार को डेट पर भी जाना है. पॉकेट की तो बैंड पहले ही बजी हुई थी. दोस्तों से पैसे उधार लेकर मैडम के गुस्से को शांत किया. मन ही मन उस दिन को कोस रहे थे जब उनके दर्शन हुए थे. न बात होती, न मुलाकात होती, न उधारी के पहाड़ तले हम दबते.

इतना सब मैं इस लिए कह रहा हूँ की मेरी इस तपस्या का फल मैडम ने कुछ इस अंदाज़ में दिया की हमें लगा हम इमोशनल फुल हैं.
आखरी बार फोन पर बात करते हुए मेरी सपनो की रानी ने कहा की मेरे कम फोन करने और मेरे कम मिलने से उनके दिल की पीड़ा बढ़ गयी है. मेरा दोस्त, जिसने उनका नंबर मुझे दिया था, वो मुझसे अच्छा है. उसकी बहुत केयर करता है. हमारा तो दिल ही बैठ गया. आने वाले खतरे को पहले ही भांप हमने पूछ डाला, कहीं तुमने रोंग नंबर तो डायल नहीं कर दिया.
मैडम तुनक कर बोली, “तुम्हारी बैटिंग में अब पहले वाली बात नहीं रही. बात-बात पे रन-आउट हो जाते हो. आज एक युवा खिलाडी की जरुरत है मुझे और तुम तो रिटायर होने के कगार पर हो”
घोर अपमान! इमोशनल अत्याचार के इस खेल में हम स्टंप हो गए. कसम खायी की प्रेम के गीत गाने की गलती अब दुबारा नहीं करेंगे. राजेश खन्ना की फिल्में देखना छोड़ हमने अमरीशपुरी की तरफदारी शुरू करदी.

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