blogid : 1669 postid : 670

क्या दूँ तुझे मैं मेरी माँ!

Posted On: 14 Aug, 2011 Others में

मैं कवि नहीं हूँ!मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

Nikhil

119 Posts

1769 Comments

क्या दूँ तुझे मैं मेरी माँ, तेरे इस नव जन्म-दिवस पर? क्या दूँ, क्या है ही मेरे पास तुझे देने कों? बिखरी जिंदगियां और सिसकियों में सुलगता भारत, कभी बस के टुकड़ों के साथ मांस के लोथड़ों में लिपटा भारत, गरीबों कि पेट कि आग के साये में दुनिया कि सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभरता भारत, अपनी मर्यादा के उलंघन पर अट्टहास लगाकर मंद-मंद मुस्काता भारत. क्या दूँ तुझे मैं मेरी माँ, क्या दूँ? सडकों पर रेंगती जिंदगी कों आलिशान गारियों से निहारता भारत, जो कहता है भारत कों इन रेंगती जिंदगियों कि ज़रूरत नहीं. आँखें बंद कर उन रेंगती जिंदगियों कों अपने अहम तले कुचलता भारत. कभी बूढों कि धंसी हुई वो भयावह आँखें, जो मुझे कहती हैं, ये कैसा भारत? कभी बचपन के बसंत के गोद से उठकर कर जीवन के भागम-भाग में अपने अस्तित्व के लिए पिसता भारत. क्या दूँ तुझे मैं, तुने मुझे सीता के दर्शन कराये. चरित्र का हिमालय, सुंदरता कि गंगा, जो नारी कि परभाषा थी. नारी और पुरुष के संबंधों कों परिभाषा देने वाली राधा और कृष्ण से सजी तेरी ये धरती थी कभी. लक्ष्मी बाई के कर में सूर्य कि किरणों कों भी देहला देने वाले खडग से कांपती अंग्रेजों कि फ़ौज, तेरा अतीत है. सबरी के जूठे बेर कों खाकर स्वयं भगवन ने ऊँच-नीच और जात-पात से ऊपर उठकर नव-निर्माण कि प्रेरणा दी. किसे याद है, कृष्ण और सुदामा कि मित्रता. पृथ्वी राज कि एक ठोकर से नतमस्तक हुए गोरी का समय अब कहाँ है? ना सत्य कहीं दिखता और ना अहिंसा कि तलाश में ही दिख रहा है इंसान. मर्म की पहचान किये बिना तत्त्व कि तलाश में दीवानों कि तरह बदहवास, भागती एक भीड़ हर जगह दिखाई देती है. क्षमा और दया ये तो बस किताबों कि शोभा बढ़ा रहे हैं. नग्नता के लिबास में लिपटी नारी बाजार लगाकर बैठी है. इसे कहाँ भान है अपने स्त्रीत्व का. अपना सर्वांग लुटाकर स्वयं के अस्तित्व कि तलाश में हैं बेटियां. शिक्षा कों ढाल बना कर अपनी ही संस्कृति पर लिखे चुटकुले में मजे लेता भारत हर जगह आम है. कहीं बंदूकों कि आवाज़ और बम के धमाकों ने तेरे बच्चों के सुनने कि शक्ति छीन ली. अब तो डर और आतंक के साये में जीने कि आदत हो गयी है तेरे बच्चों कों.हमसे कहा जाता है हम वीर हैं, हम दुखों का सामना दिलेरी से करते हैं. कौन केहता है, हम दिलेर हैं. भय के साये में जीने वाले बच्चे दिलेर नहीं हुआ करते. हम रोटी कि मज़बूरी के तले दबे हुए मजबूर लोग हैं. नेताओं के आलिशान कोठियों से वादों के सैलाब में बहता भारत. कभी टी.वी पर कभी रेडियो पर, कभी इंटरनेट पर अपनी ही खबरें पढता भारत. बम के धमाकों और भूख की पीड़ा कों सिर्फ टी.वी पर देख कर समझने कि कोशिश करता भारत.
क्या दूँ तुझे मैं मेरी माँ क्या दूँ. नैतिकता कों बोझ समझ कर अपने कन्धों से दूर फेंकता भारत. अपने शहीदों के मजारों पर देशभक्ति कि बोली लगाता भारत. कभी भूख से, कभी रसूख से, कभी अपनों के हाथों, कभी गैरों के हाथों, अपनों कि हत्या करवाता भारत. गांधी कों नोट तक सीमीत कर इठलाता भारत. एक गांधी वो था, कभी ना रुकने वाला, पतला शरीर और ऊँची मह्ताव्कान्क्षा और लड़ने का जूनून. आज कई गांधी हैं, कोई अपने नाम के पीछे गांधी लगाकर गाँधी बनाने का स्वांग करता है. कैसा भारत? क्रिकेट कि दीवानगी के पीछे राष्ट्र कों भूलता भारत. सुबह मंदिर में शंख का गर्जन करता और रात में अनैतिकता कि हदें पार करता भारत. कैसा भारत, जहाँ आप सिर्फ इसलिए उच्च शिक्षा नहीं प्राप्त कर सकते क्यूंकि आप गरीब हैं. रूपये के बंडलों में बिकती उच्च शिक्षा के दम पर आसमान के खाब छूने और समानता के अधिकार कि बात करने वाला भारत. कहाँ है वो भारत, वो भारत जो इतराता था, अपनी सुंदरता और माधुर्यता पर मंद-मंद मुस्काता था. चंद्रगुप्त और चाणक्य से सजा भारत कहा है?
कहाँ है वो भारत जिसने जंग-ए-आज़ादी के बाद एक नव-भारत निर्माण कि बात की थी. जिसने कहा था सब एक सामान हैं. कौन एक समान हैं, हम या फिर सत्ता के गलियारों में नफरत कि रोटी सकते लोग. जिन्होंने सैकड़ों बार रोटी, कपडा और मकान देने कि बात कि. लेकिन ये कैसा भारत जहाँ दो वक्त कि रोटी के लिए किसान जान देते हैं. जहाँ आम आदमी के जीवन कि कोई एहमियत नहीं. भ्रष्टाचार के पीने दांतों से रक्त-रंजित होता भारत, कैसा भारत?कैसा भारत, चाय कि चुस्कियों में राष्ट्र के भविष्य कों तलाशता भारत या फिर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जन-गन-मन के गीत गाकर अपने उत्तरदायित्व कर निर्वाह करता करता भारत. वो भारत जिसे राष्ट्रीयता कि याद सिर्फ १५ अगस्त कों आती है या वो भारत जो अपने कार्यालयों में लगे अनगिनत पान के छीटों कि तरह ही भ्रष्टाचार और आतंक कों चाँद पर दाग कि तरह देखता है, या वो भारत जो बीच सड़क अपनी बेटियों के हो रहे चीरहरण पर आँखें बंद कर लेता है.
क्या दूँ और है ही क्या मेरे पास तुम्हें देने कों. एक छोटा सा स्वप्न तुझे हीरे-जवाहरात से सजाने का. बस यही प्राण लेता हूँ, तुझे वापस दूंगा मैं वो भारत. वो भारत जो कभी इतिहास के पृष्ठ पर गर्व से खड़ा था. वो भारत जिसने विश्व कों अपने क़दमों पर झुकाया था. वो भारत जहाँ वीर-संवारकर और कुंवर सिंह जैसे बेटे पैदा होते थे. वो भारत जहाँ भगत सिंह और खुद्दी राम बोस हँसते हुए सूली चढते थे, वो भारत जहाँ गांधी ने अहिंसा का पाठ पढ़ा, वो भारत जहाँ गौतम भुद्ध जन्मे थे, वो भारत जिसने महावीर अपने गोद में झुलाया. वो भारत जहाँ मीरा का प्रेम है, वो भारत जहाँ दिनकर और निराला स्याही से इतहास लिखते थे, वो भारत जहाँ सिर्फ शान्ति हो, वो भारत जहाँ जात-पात पर हिंसा ना हो, वो भारत जहाँ राष्ट्र धर्म से बड़ा हो. वो भारत जहाँ शिक्षति समाज हो, वो भारत जहाँ हर बेटी, लक्ष्मी बाई और किरण बेदी हो, वो भारत जहाँ हर गोद सुभाष चंद्र बोस पैदा हों. हाँ वो भारत दूँगा तुझे मैं, माँ वही भारत दूँगा तुझे मैं, तेरे इस नव-जन्म-दिवस पर.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग