blogid : 1669 postid : 701

ना होती गर ये आँखें मेरी तो क्या होता?

Posted On: 21 Oct, 2011 Others में

मैं कवि नहीं हूँ!मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

Nikhil

119 Posts

1769 Comments

ना होती गर ये आँखें मेरी तो क्या होता
ना ज़मीन होती खूबसूरत,
ना ये आसमानी रंगों कि चित्रकारी होती,
ना होता हुस्न का दीदार,
ना होती दीवाली और ना धुप बयां होताimages


ना होती गर  ये आँखें मेरी, तो क्या होता
तेरे माथे पर आये लटों के अक्स, ना होते दिल के अंदर,
ना तेरे कंपकपाते होंठों कों गज़ल बनाता मैं
ना मिलता सुकून फिर तेरी पलकें झुकाने पर
ना तेरी पलकों से गिरते आंसूं मैं होठों से चुनता


ना होती गर ये आँखें मेरी तो क्या होता

ना रंगों कि पहचान होती
ना मंजिल आसान होती,
ना सूरत होती निगाहों में,
और ना बदसूरती का निशां होता
ना होती गर ये आँखें मेरी, तो क्या होता

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग