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प्यार के चार रंग(अध्याय- मेरा प्रमोशन और मेरे चरित्र में बदलाव-11)

Posted On: 12 Jul, 2010 Others में

मैं कवि नहीं हूँ!मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

Nikhil

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आगे….

चित्रलेखा ने जैसे ही मुझे देखा, शर्मा कर एक तरफ सिमट गयी. मैं मन ही मन अपने भाग्य पर खुश होने लगा. हाँ, पहली बार मुझे ऐसा महसूस हो रहा था की मेरी किस्मत, उतनी भी बुरी नहीं जितना की मैं सोचता था. चित्रलेखा, एक अच्छी नौकरी, एक अच्छा परिवार और तीन अच्छे दोस्त. एक इन्सान को इससे ज्यादा क्या चाहिए? अब तो बस उस दिन का इन्तेजार था, जब मैं और चित्रलेखा साथ-साथ होंगे. दुनिया से बेखबर, अपने हसीं पलों को याद करते हुए, एक दुसरे की आँखों में खोये. हाँ, उस दिन का इन्तेजार है मुझे जब, हाथों में चाय की प्याली और आँखों में जहाँ भर का प्यार लिए, चित्रलेखा, धीरे से कमरे में आएगी और मेरी आँखों में देख कर कहेगी ‘निक्स चाय’, और में बस उसके खबसूरत चेहरे की मिठास से ही तृप्त हो कहूँगा ‘एक मिठास तेरी आँखों से पी, एक चाय की प्याली में है, क्या खूब नसीबा पाया है, के वक़्त ने मुझे तुमसे मिलाया है’.

अभी सपनों को ठीक से समेट भी नहीं पाया था की बिपिन के दोस्त ने कहा ‘निखिल भाई, यूँही खड़े रहोगे की अन्दर भी चलना है’?

उसकी इस बात से जैसे सपने से जागा मैं. उसके साथ, उसके कमरे में जाकर सोचने लगा -अब क्या करूँ? कितना बेबस हूँ मैं, महबूब सामने है और मैं इज़हार-ए-इश्क को तरस रहा हूँ.

दोपहर हो चुकी थी और सर्दी की मीठी धुप, हौले-हौले साड़ी फिजा को गुनगुना कर रही थी. चित्रलेखा ने मुझे अभी तक नहीं देखा था. मैं राजीव के छत पर जा, चित्रलेखा के घर की तरफ देखते हुए, टहलने लगा. चित्रलेखा के घर के नीचे बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे. तभी चित्रलेखा अपने घर से बाहर आ, बच्चों का खेल देखने लगी. उसने मुझे अभी तक नहीं देखा था. अचानक से उसकी नज़र ऊपर उठी, और इस बार मैं बच नहीं पाया. शायद पहली बार उसे अपनी आँखों विश्वास नहीं हुआ, तभी तो एक बार निचे देखने के बाद उसने दुबारा ऊपर देखा, अपने भ्रम को तोड़ने के लिए. मुझे अपनी आँखों के सामने देख, शायद सोच रही थी, कैसा पागल इन्सान है, बस मुझे देखने के लिए दौड़ा चला आया.

अब चित्रलेखा अपने छत पर थी और मैं उसके सामने, राजीव की छत पर. उस कोलोनी में मुझे कोई जानता नहीं था, सो उसके घरवालों के शक करने का सवाल ही नहीं उठता था. एक घंटे तक हम यूँही लोगों की नज़रें बचा कर एक दुसरे को देखते रहे. कभी मैं आँखें मिलते ही मुस्कुरा देता तो कभी वो. शायद हम नैनों की भाषा समझाने लगे थे. हमारी आँखें ही तो थीं, जो हमारे दिल के एहसासों को बयान कर रही थी. नज़रों से नज़रें मिलते ही उसका वो नज़रें झुका लेना. आह! क्या नशा है प्यार है! एक दुसरे की आँखों में यूँही डूबते-उतरते, हम एक ऐसे एहसास को समझने की कोशिश कर रहे थे, जिसे मैं अब प्रेम कह कर परिभाषित नहीं करना चाहता था. ये तो अपरिभाषित था. परिभाषा देने के बाद तो ये सीमित हो जाता. लेकिन मेरा एहसास, या प्रेम, या के फिर कुछ और, हर बंधन से मुक्त, हर परिभाषा से परे, एक अपरिभाषित एहसास था.

कुछ देर यूँही मुझे अपनी भेंगी पलकों से निहारने के बाद चित्रलेखा चली गयी.

“निक्स, मैं बता नहीं सकती की मैं कैसा महसूस कर रही हूँ? एक तरह तुम्हारे आने की ख़ुशी है तो दूसरी तरफ तुम्हारे थोड़ी देर बाद चले जाने का गम. आँखें रोना तो चाहती हैं, लेकिन तुम्हारे कन्धों पर सर रख कर. मैं सारे अनसु बचा कर रखूंगी. निक्स तुम चले जाओ. अब अगर तुम थोड़ी देर और रुके तो मैं सारे रिश्ते, सारे नाते, सारे नियमों को तोड़ तुम्हारी बाहों में सिमटने तुम्हारे पास चली आउंगी.” चित्रलेखा ने मेरे मोबाइल पर फोन कर कहा.

“मैं तुम्हारा दर्द समझ सकता हूँ सिल्कू. लेकिन मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊं, किससे अपनी बात कहूँ? तुम्हें देख लिया बस इतना ही काफी है मेरे लिए. शाम की गाडी से वापस जा रहा हूँ. लेकिन एक वादा करता हूँ मैं,

तुम दूर गर हो भी गए,

बादलों में कहीं खो भी गए,

हर उम्र से तुझे ढूंढ़ लाऊंगा,

हाँ, तुझे मैं अपना बनाऊंगा.” इतना कह कर मैंने फोन रख दिया.

चित्रलेखा के घर से गुजरते वक़्त उसकी नम आँखें मुझे बता गयीं, उसके ह्रदय की पीड़ा को. उदास मन और भरी क़दमों से मैं स्टेशन पहुंचा. इंसानों के भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस कर रहा था मैं. आँखों में मुलाकात की तस्वीर और चित्रलेखा को देखते हुए बिताये उन पलों के एहसास के साथ मैं दिल्ली पहुंचा.

आज ऑफिस में बहुत प्रमोशन का रिजल्ट आना था. सारे लोग फ्लोर पर जमा थे. मैंने भी प्रमोशन के लिए टेस्ट दिया था. नीरज कुनाल, हमारे सी.ई.ओ ने सबसे पहले टीम लीडर के रिजल्ट की घोषणा की. अभिषेक और अनिल टीम लीडर बन गए. फिर बिलिंग अनालिस्ट के लिए अपने नाम को सुनते ही आँखों में आंसू आ गए. मेरी मेहनत जीत गयी थी. एक साल से दिन-रात अपनी तरक्की के लिए मैंने जो मेहनत की उसका फल मेरे सामने था. अपन प्रमोशन लेटर लेने की लिए मैं आगे बाधा, मेरे साथी कर्मचारियों ने तालियों से मेरा स्वागत किया. एक पल के लिए तो मुझे ऐसा लगा की मैं विश्वविजय कर लौटा हूँ और लोग तालियाँ बजा कर मुझे कह रहे हैं, वीर योद्धा रुको मत, चलते जाओ, आसमान को छूना अभी बांकी है. शायद जीवन में पहली बार इतना सम्मान पाना, विश्वविजेता बनने के समान ही था मेरे लिए.

अभिषेक बहुत खुश था मेरी सफलता पर. मेरा अच्छा दोस्त जो था. ऑफिस से घर लौटते वक़्त उसने बताया की वो मुझे अपना छोटा भाई मानता है. मेरी सफलता के लिए उसने मुझे बधाई दी.

घर पहुंचाते ही मैंने बिपिन को अपनी तरक्की के बारे में बताया. मुझे उठा कर वो चिल्लाते हुए कहने लगा “तू सच में हमारा हीरो है. आजतक हर चीज़ जो तुने पाने का सोचा, उसे पाया. आगे भी अपनी हिम्मत ऐसे ही बरक़रार रखना मेरे भाई. मुझे तुझपर गर्व है.”

“ये सब तुमलोगों के साथ का ही तो असर है दोस्त. तुम तीनों के बिना तो मैं बिलकुल अधुरा हूँ. हर वक़्त तुमलोगों ने ही तो मेरा हौसला बढाया. जब कभी मैं उदास हुआ, तुमलोग हंसी बन कर आये. मेरे आंसुओं को तुमलोगों ने ही तो अपने कंधे दिए. बस ऐसे ही मेरे साथ रहना. मुझे ज़िन्दगी से और कुछ नहीं चाहिए.” मैंने कहा.

सुबह उठा तो शिव के मिस्कोल को देख उसे फोन लगाया. बिपिन ने उसे मेरे तरक्की के बारे में बता दिया था. वो बहुत खुश था. उसने बताया की निष्ठां की बड़ी बहिन की शादी हो गयी है. जल्द ही वो भी निष्ठां से शादी करेगा. उसने कहा की वो अच्छी सी नौकरी तलाश रहा है, नौकरी मिलते ही निष्ठां के घरवालों से उसका हाथ मांगने उसके घर जाएगा वो. अपने हर तरफ, प्यार के रंगों को देख मन ख़ुशी से फुला नहीं समां रहा था. एक तरफ माधवी और बिपिन, दूसरी और शिव और निष्ठां और एक प्यार जो हमारी दोस्ती में था.

शिव से बात ख़तम करके मैं निष्ठां को मेल लिखने चला गया. अभी थोड़ी दूर ही गया था की उसका फोन आ गया. मैं कुछ बोल पाता इससे पहले ही उसने कुछ ऐसा कहा जिससे मेरी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा. उसके एक-एक शब्द मेरे दृदय में नश्तर की तरह चुभते चले गए.

“निक्स, मैं, हमारे प्यार को थोडा विराम देना चाहती हूँ. मैं चाहती हूँ की हम दोनों एक दुसरे को थोडा समय दें. ऐसा नहीं है की मैं तुमसे कह रही हूँ हम अपने रिश्ते को कहातम कर दें. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकती, मुझे पता है. लेकिन मैं कुछ दिन और तुम से दूर रहना चाहती हूँ. पापा को मुझसे बहुत उम्मीदें हैं, मैं उनकी उम्मीदों को पूरा करना चाहती हूँ. मैं चाहती हूँ की तुम मेरा साथ दो. मैंने ये बात तुमसे अबतक छिपाई, लेकिन मैं अब और तुमसे इस बात को नहीं छुपा सकती. पापा को मेरे लिए आई.ए.एस लड़का चाहिए, मैंने सोचा कम से कम मैं कोई ऊँचा काम कर लुंगी तो शायद वो मान जाएँ. और मैं न तुम्हारा दिल तोड़ सकती हूँ, न ही पापा का. तुम मेरी बात समझ रहे हो न” चित्रलेखा के शब्दों के प्रहार को सुना मैंने.

“हाँ, मैं सब समझ गया. सिल्कू, मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ था और रहूँगा. लेकिन एक दुसरे को दो साल तक जानने के बाद मुझे तुमने ऐसे मोड़ पे खड़ा कर दिया जहाँ से मैं न वापस जा सकता हूँ, न ही आगे जाने की कोई गुंजाईश है. मैं इसमें तुम्हें दोष नहीं दूंगा, ये तो बस मानसिकता की बात है, आई.ए.एस न सही, एक इन्सान तो ज़रूर हूँ मैं. खैर, अब इन बातों का कोई फायदा नहीं. मैं अभी तुम्हें मेल ही करने जा रहा था, एक खुशखबरी देनी थी तुम्हें. उससे पहले तुमने ही खुश कर दिया मुझे” मैंने नम आँखों से हँसते हुए कहा.

“अच्छा ये बताओ, की मुझे करना क्या है? अभी तक हर बात तुम्ही बताती आई हो. इस बार भी बता दो. वैसे मेरा प्रमोशन हुआ है.”

” सच, तुम्हारी तरक्की की खबर से मन बहुत खुश हुआ. मैं तुमसे कुछ कहना नहीं चाहती. मैं बस इतना कहूँगी, की आज से मैंने हमारे प्यार को किस्मत के भरोसे छोड़ दिया है. अगर किस्मत में मिलना है तो मिलेंगे. मैं नहीं चाहती की मैं तुम्हें एक ऐसे मोड़ पर छोड़ दूँ जहाँ से तुम वापस न आ सको. तुम्हें मेरा साथ देना होगा निक्स. वादा करो की आज के बाद उसदिन तक, जबतक मैं फिर से तुम्हारे पास न आ जाऊं, तुम मुझसे प्यार भरी बातें नहीं करोगे. आज के बाद हम अछे दोस्त हैं.”

“मैं फोन रखता हूँ”

फोन रखते ही जैसे सब बदल गया. फिर से किस्मत दगा दे गयी. इस बार मैं कुछ समझ नहीं पाया. आखिर क्यूँ ऐसा हुआ? क्यूँ चित्रलेखा मुझसे दूर जाने की बात भी कर गयी और मेरे पास आने की बात भी कर गयी. मुझे उससे कोई शिकवा नहीं था, गिला था मुझे अपनी किस्मत से. चित्रलेखा बार-बार फोन करती रही, मैंने नहीं उठाया. मेरा दिल और विश्वास दोनों टूट गया था. मौन हो गया मैं. कसम खा ली की अब कुछ न बोलूँगा. कभी फिर दुबारा प्यार न करूँगा. प्रेम शब्द से ही नफरत सी होने लगी थी मुझे. दिल और दिमाग, दोनों पर काले बादलों का घेरा आ गया था. कुछ सोच नहीं पा रहा था मैं. बोझिल क़दमों से घर लौट कर एक कोने में लेट गया. बिपिन ने मुझे चुप-चाप लेता देख कई बार मुझसे प्रश्न किया. मैं चुप रहा कुछ न बोला.

अगले दिन भी मेरे मोबाईल पर चित्रलेखा ने कई बार फोन किया. हार कर मैंने फोन उठा ही लिया.

“क्या है, क्यूँ परेशान कर रही हो? मैंने कहा न मैं ठीक हूँ. मैं तुम्हारे साथ हूँ. मुझे पता चला, तुम एन.एल.एस के लिए सिलेक्ट हो गयी हो. तुम्हें तुम्हारे भविष्य की शुभकामनाएं. जब भी मेरी ज़िन्दगी में आना हो बता देना. क्यूंकि मेरे ह्रदय में किसी और को कभी जगह नहीं मिलेगी. और हाँ, एक एहसान करना, मेरे पास ही रहना लेकिन दूर-दूर. प्लीज मुझसे तबतक बात मत करना जबतक तुम ये निश्चय न कर लो की तुम्हें मेरे पास आना है या नहीं. रखता हूँ”

इतना कहने के बाद मैंने फोन रख दिया. क्यूँ हुआ, उसने ऐसा क्यूँ किया, सोचना व्यर्थ था? एक पल मैं ज़िन्दगी ने एक और करवट बदली, और उस करवट ने मुझे भी बदल दिया. मैं किसीसे कुछ कह तो नहीं पाया लेकिन, एक बदलाव जरुर महसूस किया मैंने खुद मैं. मेरी सोच अब बदलने लगी, प्रेम की जगह घृणा ने लेली, करुना की जगह वासना ने लेली. कल तक किसी और की तरफ देखना एक गुनाह हुआ करता था. आज हर जिस्म पर मेरी निगाह अटकने लगी. क्यूँ हुआ ऐसा, मैं नहीं जानता लेकिन कुछ तो बदला था. मैं या समय?

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