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युवा और कुछ जानवर-२,( सभी मर्द एक जैसे आखिर क्यूँ?, का जवाब)

Posted On: 27 Jul, 2010 Others में

मैं कवि नहीं हूँ!मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

Nikhil

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प्रश्न, फिर एक प्रश्न! ये प्रश्न मेरे मन और मस्तिष्क पर अपने आखेटों को नहीं रोकेंगे. जागरण जंक्शन, जनता की आवाज़, एक ऐसा मंच जहाँ कोई भी अपनी बात रख सकता है. और ये प्रश्नों का रोग मेरा अकेले का रोग तो है नहीं, कई पीड़ित हैं बाज़ार में. अपने प्रश्नों के साथ उत्तर की तलाश में इस मंच से जुड़ते हैं. फिर एक प्रश्न उठता है और कई सवाल खड़े होते हैं, फिर जवाब भी आते हैं. प्रश्न, वहीँ का वहीँ. अनुत्तरित, अपरिभाषित प्रश्न.

कभी मर्दों ने औरतों से प्रश्न किये, कभी औरतों ने पुरुषों से उत्तरों की मांग की, तो कभी पुरुष और औरत दोनों से उत्तर मांगे गए. कभी नारी पर होते ज़ुल्म की बात उठी, तो कभी पुरुषों ने अपने स्वाभिमान के लिए हाथ खड़े किये. लेकिन औरत और पुरुष से ऊपर उठ कर मनुष्यता की बात कम ही लोग करते हैं. हमेशा विवाद यही होता है की दोषी कौन है, पुरष, या फिर औरत. कभी पुरुष दोषी ठहराए जाते हैं तो कभी महिला. मैं मानता हूँ की नैतिकता का पतन हुआ है, लोग सांसारिक भोग विलासिता में संलग्न हैं , लेकिन इनकी संख्या अभी भी बहुत कम है.

सभी मर्द एक जैसे कैसे हो सकते हैं, और सभी महिलाएं एक जैसी कैसे हो सकती हैं. कभी सोचा है किसी ने, इश्वर, या कोई और ताकत, कोई तो है, जिसे आप मानते हो की वही इस ब्रह्माण्ड का मालिक है. हिम, हिम के कणों को गौर से देखिये, हर कण, एक दुसरे से भिन्न, क्या जद्दुगरी है बनाने वाले की हाथों में, हर कण अपने आप में पूर्ण और अद्वितीय, स्वर्गीय सुन्दरता लिए हुए. जब उस ताकत ने एक छोटे से कण को इतनी सम्पूर्णता दी, तो क्या हम मनुष्यों में कोई खोट छोड़ा होगा उसने? नहीं, मनुष्यों में खोट हो ही नहीं सकता, ये तो अमानवीय लोगों द्वारा मनुष्यों के अन्दर पैदा किया हुआ भ्रम है.

कहीं भी किसी भी ग्रन्थ में ये नहीं लिखा है की जब कोई हिंसक जानवर आप पर वार करे तो आप उसके सामने हाथ जोर कर खरे हो जाएँ और कहें, मुझे मत मारिये, मैं अहिंसक हूँ. इश्वर ने आपको आत्मरक्षा करने का अवसर दिया है. अगर कोई जानवर आप पर वार करता है, और आप उसका विरोध नहीं करते हैं तो आप नपुंसक हैं, न की अहिंसक हैं. अहिंसा का मतलब ये नहीं होता की हम अन्याय सहें. अहिंसा सिखाती है, निडर बनो, मृत्यु से भयभीत मत हो, अन्याय और जुल्म करने वालों का विरोध करो. कोई आपका साथ दे या नहीं दे, आप अपने कर्तव्यों से पीछे मत हटो. आपका कर्त्तव्य बनता है की आप अन्याय के विरोध की शुरुआत करें.

इन्सान अहिंसा का मतलब समझ नहीं पाता और अपना पूरा जीवन डर कर गुजार देता है. अगर आप शोषित होते हैं, कोई आपका शोषण करता है तो इसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार हैं. आपको इस बात को समझाना होगा की इन्सान भयभीत हो गया है, जानवरों द्वारा हो रहे अत्याचारों से. इश्वर ने आपको लिखने की कला दी है, बोलने की कला दी है, अपना विरोध जताने की पूरी आजादी दी है.

औरत, महिला या नारी, हर शब्द सम्मान और प्रेम का प्रतीक है. पुरुष, मर्द या नर, हर शब्द साहस और बलिदान का प्रतीक है. बिना साहस के सम्मान नहीं मिलता, और बिना बलिदान तो प्रेम की कल्पना भी व्यर्थ है. नारी पर हुए अत्याचार का जिम्मेदार, पुरुष हो ही नहीं सकता. अपने स्वयं के सम्मान पर अत्याचार और अपने बलिदान से पाए प्रेम को कोई कैसे कष्ट दे सकता है. ऐसा काम, हिंसक जानवर ही कर सकता है, जो अपनी जीभ की ज्वाला को शांत करने के लिए अन्य जानवरों को मारता है. अत्याचारी और नारियों का शोषण करने वाले जानवर, अपने किस्म के सबसे खूंखार जानवर हैं, इन जानवरों का विरोध, सामूहिक होगा तभी सार्थकता सिद्ध हो पाएगी.

ऊपर लिखे गए सारे शब्द मैं अनीता पॉल जी के ब्लॉग पर टिपण्णी में पोस्ट कर रहा था, फिर मुझे लगा की एक पुरुष को भी, एक कोशिश करनी चाहिए, नारी के मन मैं उसके विरुद्ध उपजे भ्रम को तोड़ने का प्रयास करना चाहिए. मैंने इस विषय पर पहले भी लिखा था, उसी बात को दोहरा रहा हूँ. नारी को नारी, और पुरुष को पुरुष रहने दीजिये, इन्हें एक दुसरे का दुश्मन मत बनाइये. आपकी नकारात्मक सोच कई मस्तिष्कों पर प्रभाव डाल सकती है. मैं अगर ये कहूँ की मैं आपके ह्रदय की पीड़ा को समझ सकता हूँ तो ये अतिश्योक्ति होगी. मैं क्या, कोई भी पुरुष मन, नारी की पीड़ा और नारी की शक्ति दोनों का अनुमान नहीं लगा सकते. नारी सिर्फ शोषित ही नहीं, शाषक भी है, शक्ति भी है. सोनिया जी से प्रतिभा पाटिल तक जब राजनीति के मंच के कमान को संभल रही हैं, सायना नेहवाल से लेकर करनम मल्लेश्वरी तक खेल-कूद में अपना परचम लहरा रही हैं, जब लड़कियों को फ़ौज में स्थायी कमीशन देने की बात की जा रही है, जब लड़कियां शोभा अहोतकर, किरण बेदी और अमिता पॉल जैसी कर्मठ पुलिस अधिकारी बन रही हैं,नारियों ने पुनः अपना विश्वास पाया है, इस प्रकार की नकारात्मक सोच, अहितकर है.

अगर आप पर अत्याचार हुआ है, या आप अत्याचार होते देख रहे हैं तो आवाज़ उठाइए, पूरा हिंदुस्तान आपके साथ है. एक दुसरे पर दोषारोपण करने से न पुरुष का भला होगा न स्त्री का. आपको समानता का अधिकार प्राप्त है, आप स्त्री हैं, आपको हर वो हक़ है जो एक पुरुष को है. अगर आप फिर भी आवाज़ नहीं उठाती हैं तो गलती आपकी है. मनुष्य सो रहे हैं, उन्हें आवाज़ लगा कर जगाना पड़ता है. कानों में हुंकार भरनी पड़ती है, तभी लहू उबलता है और परिवर्तन आता है. कदम उठाइए, अपने कलम को दीजिये वो ताकत जो आपको इस मंच के हर साथ का साथ दिला सके. बेबाक और निडर हो आप हर बात बोलकर इस परिवर्तन को लाने की पहल कर सकते हैं. आइये हम युवा, अपने बुजुर्गों के आशीर्वाद मांग कर उन्हें ये वचन दें की हम उन्हें उनका भारत लौटा कर देंगे.

जय हिंद!

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