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ये नक्सली और आतंकी नहीं, जल्लाद हैं

Posted On: 1 Jun, 2010 Others में

मैं कवि नहीं हूँ!मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

Nikhil

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रोज अख़बार की सुर्ख़ियों को देखते ही मन गद गद हो जाता है. अपने देश की सफलता के लिए मैं तहे दिल से आम आदमी को बधाई देता हूँ. आज हमारे देश की विकास गति ८.५% हो गयी है. जब पूरी दुनिया अपने अर्थव्यवस्था के लचर स्थिति को सुधरने मैं लगी है, हमारा विकास दर ८.५% होना हमारी ताकत को दर्शाता है. विद्यार्थियों के 10th और 12th के परिणाम विगत सपताह मैं घोषित हुए. परिणाम काफी उत्साहवर्धक रहे. छोटे छोटे शहरों और गाँवों के बच्चों ने एक बार फिर से ये साबित कर दिया की प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं. हमने तो अपने हर काम मैं अपना शत प्रतिशत सहयोग दिया और उसे सफल बनाया. लेकिन जिन्हें हमने अपनी और देश की सुरक्षा का भर सौंपा है शायद वो उस पद के लायक नहीं हैं.
मुझे आज भी याद है वो दिन, २६/११/२००८, अपने ऑफिस का काम ख़तम कर के जब घर पहुंचा तो घर के लोग टी.वी पर नज़रें गराए बैठे थे. पूरा परिवार डर और आतंक के साए में दिखाई दिया मुझे. सर्कार ने त्वरित करवाई करते हुए सैकरों लोगों की जान की परवाह किये बिना, मुठ्ठी भर आतंकियों को मार गिराया. इतना ही नहीं, उन्हें तो अपनी पीठ थपथपाने के लिए भी किसी की जरुरत नहीं पड़ी. कंधार के घाव को हरा करते हुए सर्कार के लोगों ने उस वक़्त के शाशन की जम कर आलोचना की और कहा की उनकी सर्कार निर्भय और निर्भीक है. वो आतंकियों के सामने नहीं झुकेगी. जनता की बात भी सर्कार ने स्वयं ही कह डाली. हमारी जनता मौत से नहीं डरती, वो तो अपनी जान गँवा कर भी देश का मन रखने से नहीं हिचकती. बात भी सही थी, क्यूंकि हमारे कानों में आज भी “जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर, जान देने की रुत रोज आती नहीं”, की गूंज मौजूद है. हमने भी अपने देश के योधाओं के बलिदान पर खुद को गौरवान्वित महसूस किया और देश के तरक्की में जी जान से जुड़ के गए.
मुंबई की घटना के बाद भी कई आतंकी हमले हुए. हम डरे नहीं, हम देश की तरक्की के लिए हमेशा जी जान से जुटे रहे. लेकिन इस वर्ष जिस तरह से नक्सलियों ने भारत की अस्मिता और अहम् को चोट पहुँचाया है, उससे हम आहत हैं. कभी दंतेवाडा में मासूम लोगों अपनी जान से हाथ धोना पड़ा तो कभी मिदनापुर में मासूमों के लाशों के ढेर लगे. लेकिन सर्कार मौन है. प्रधानमंत्री कहते हैं की ये एक निंदनीय अपराध है.
निंदा और आश्वासन, यही सब तो देखते सुनते आये हैं आजतक. और अपने देश में इन वहशी दरिंदों के समर्थकों की कतार में कुछ बुध्धि जीवी लोग भी हैं. जो उनपर लेख लिखते हैं और उनके लिए सहानुभूति जुटाने की कोशिश करते हैं. वो लोग मासूम कैसे हो सकते हैं जिन्हें मासूमों की जान लेने में तनिक भी संकोच नहीं होता. हम भारतीय हैं और हमने हमेशा ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का पाठ पढ़ा है. जो मासूमों की जान ले वो तो भारतीय कहलाने के लायक भी नहीं है. ये नाक्साली नहीं जल्लाद हैं. और सर्कार को भी इनसे वैसा ही सलूक करना चाहिए. अब बात करने का समय नहीं रहा. अब जरुरत है युद्ध की. आमने सामने के युद्ध की. हम अपने लोगों की जानें देने को राजी नहीं हैं अब. अब नक्सालियों का दमन चाहिए हमें.

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