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रोता गर ये दिल तो परवाह न थी!

Posted On: 12 Jan, 2012 Others में

मैं कवि नहीं हूँ!मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

Nikhil

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रोता गर ये दिल तो परवाह न थी,
अश्क आँखों से मेरे अब गिरते नहीं
जलती गर ये महफ़िल तो परवाह न थी,
बारिश की बूंदों में भी रंग अब मिलते नहीं,

कर पाता बयां ये मोहब्बत तो परवाह न थी,
होंठ, होंठ मेरे अब कभी हिलते नहीं,
सांसें थम जाती कभी तो परवाह न थी,
अफ़सोस, कब्र पर फूल आशिकों के अब खिलते नहीं

रोता गर ये दिल तो परवाह न थी,
अश्क आँखों से मेरे अब गिरते नहीं
जलती गर ये महफ़िल तो परवाह न थी,
बारिश की बूंदों में भी रंग अब मिलते नहीं,

नमक ज़ख्मों पर मेरे वक़्त ने है मल दिया
ख़ुशी का जाम दोस्तों ने जी भर के पीया,
कसक है सीने में, ज़ख्म अब भी हैं हरे
उठती है टीस जब सीने में, कोई क्या करे

करता तुझे जो याद तो परवाह न थी,
कमबख्त सीने में दफ़न तेरी यादों को हम भूलते नहीं,
करता जो इश्क किसी से तो परवाह न थी,
आह, खुदा की तरह हम उन्हें पूजते रहे,

रोता गर ये दिल तो परवाह न थी,
अश्क आँखों से मेरे अब गिरते नहीं
जलती गर ये महफ़िल तो परवाह न थी,
बारिश की बूंदों में भी रंग अब मिलते नहीं,

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