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अमेरिका चीन की मजबूरी है पाक

Posted On: 29 Sep, 2010 Others में

chandravillaविश्व गुरु बने मेरा भारत

nishamittal

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आखिर फिर चलायी दादागिरी अमेरिका ने अपनी”.मुख में राम बगल में छुरी “को चरितार्थ करते हुए अपने छोटे पियादे पाकिस्तान को’ अंतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी’ का अध्यक्ष बना कर.
प्रश्न ये नहीं कि पाक को अध्यक्ष क्यों बनाया गया,आखिर सदस्यों में से ही अध्यक्ष,सचिव चुने जाते हैं. संस्था का मूल उद्देश्य आणविक ऊर्जा के सैन्य दुरूपयोग को रोकनातथा शांतिपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना है.संस्था का गठन १९५७ में हुआ था.आक्रोश जिस मुद्दे को लेकर उत्पन्न होता है ,वह है
संस्था के उद्देश्यों को पाकिस्तान कितना पूरा कर रहा है,क्या ये तथ्य अमेरिका की दृष्टि से छुपा हुआ है?.परमाणु तस्करी के आरोपों को जो कि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर प्रमाणित हैं,पाक का आका अमेरिका उससे अनभिग है?कादिर महोदय की कारगुजारियां सब क्षम्य हैं?भारत को दी जाने वाली धमकियाँ ,प्रायोजित आतंकवाद दिखाई नहीं दे रहा?पाकिस्तान द्वारा एकत्रित धन(सहायता के नाम पर ) कहाँ खपाया जा रहा है,ये सब अमेरिका को नहीं पता ये स्वीकारना तो असंभव है.
> ये सब तथ्य अमेरिका जानते हुए भी अनजान बनता है तो इसका कारण उसका स्वार्थ ही है,जिसके पीछे चीन से हाथ मिलाने में उसे कोई गुरेज नहीं.आखिर “शत्रु का शत्रु ही आपका दोस्त है.”इसी नीति पर चलते हुए एक ओर चीन ने पाकिस्तान को गोद ले लिया है तो दूसरी ओर अमेरिका हमको अपने वाकजाल में उलझा कर एक तरफ तो पाकिस्तान को झूठ-मूठ में डांटता है और दूसरी ओर उसकी पीठं पर थपथपाता रहता है बहकावे में आ जाते है हम, जो सब कुछ जानते हुए भी फिर उसी की ओर तकते हैं.सदा अमेरिका से सचिव,मंत्री पहले भारत आते हैं,और तुरंत पहुँचते हैं इस्लामाबाद,पाकिस्तान को मनाने के लिए अरे हम तो भारत वैसे ही चले गए थे,असली मित्र तो हम तुम्हारे ही हैं
और फिर वही होता है,एक मोटी धनराशी पाकिस्तान पहुँच जाती है विकास के लिए ,और विकास फटे हाल पाकिस्तानी जनता का नहीं परमाणु कार्यक्रम और आतंकवाद का होता है,जिससे सर्वाधिक हानि पहुँचाई जाती है हमको.रहा चीन और अमेरिका,पाकिस्तान को अपनी शरण में रख भारत को आगे न आने देना उनका एकमात्र लक्ष्य है.क्योंकि उनकी संप्रभुता को चुनौती देने वाला भारत ही है.शक्ति संतुलन बनाये रखने के लिए तथा अपनी दादागिरी को बनाये रखने के लिए चीन और अमेरिका पाक के मित्र हैं और शायद बने रहेंगे. आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उनकी अंगुली पकड़ कर चलना छोड़ अपने साधन स्वयं बढ़ाएं .जय भारत

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