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खिलता बचपन और बढ़ता बोझ

Posted On: 26 Sep, 2010 Others में

chandravillaविश्व गुरु बने मेरा भारत

nishamittal

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घर के आँगन को गुलज़ार करतेमासूम नन्हे मुन्नों का निश्चिंत जीवन कभीउन सब के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता था,जिनको फुर्सत के चंद पलों का आनंद लेना दुर्लभ रहता है”.खाओ, पीयो, खेलो- कूदो,मौज मस्ती करते बच्चे दादा दादी, बुआ चाचा या अन्य परिवार जनों से कहानियाँ सुन कर कब बड़े हो जाते थे पता भी नहीं चलता था.उसके बाद प्रारंभ होती थी उनकी स्कूली शिक्ष.वहां भी समवेत स्वर में गिनती-पहाड़े बोलते ,जोड़-घटा, गुना-भाग के सवाल करते अपने महापुरुषों के विषय में प्रेरक प्रसंग सुनते व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त कर अगली सीढी पर कदम रखते थे.परन्तु शिक्षाके साथ उनका अपना बचपन उनके साथ रहता था.
आज समय ने,आपा- धापी,भागमभाग के चक्र में नयी करवट ली है.सर्वप्रथम तो एकाकी परिवारों के चलते दादी दादा ,नानी नाना तथा अन्य परिवारजनों के स्नेही सानिद्ध्य से वंचित हुए बच्चे,कंप्यूटर पर खेलने,टी.वी. पर उल-जलूल (अधिकांश) कार्यक्रम देखने के लिए विवश हैं.और उस पर अब २ वर्ष के बच्चों को प्ले स्कूल के नाम पर स्कूल भेज दिया जाता है.ये तो सत्य है की आज के छोटे छोटे बच्चे कंप्यूटर,इन्टरनेट ,मोबाइल जैसे आधुनिक उपकरणों से भली भांति दोस्ती कर रहे हैं,पर ये भी स्वीकार करना होगा कि वे समय से पूर्व परिपक्व हो रहे हैं.माता पिता के पास समयाभाव,बच्चों की बढ़ती जिज्ञासाओं को शांत करने की असमर्थताबच्चों को टी वी तक सीमित कर रही है,अधकचरा ज्ञान उनके मनोमस्तिष्क कोकिस प्रकार प्रदूषित कर रहा है इसकी कल्पना भी भयावह है.
इन सबसे भयंकर स्तिथि आज एक और है वह है शिशुओं के कोमल नाजुक कन्धों पर भारी भरकम बस्तों का बोझ.आज अधिकांश माता पिता सर्वप्रथम तो परेशान होते है बच्चों के हाई फाई स्कूलों में प्रवेश को लेकर.भारी भरकम धनराशी प्रवेश के नाम पर व्यय करने के बाद स्कूल के स्तर के अनुरूप चलना माता पिता को तनाव में रखता है.पुस्तकों का बोझ,परीक्षाओं को लेकर बच्चे तो अपना हँसना खेलना भूल जातें हैं माता पिता भी तनावग्रस्त रहते हैं.विशेष कर बच्चों पर गृहकार्य का दबाब रहता है.एक परिवार में अनोपचारिक वार्ता के मध्य पता चला कि प्रात ५.३० पर उठने के बाद रात्री में १०.३० तक जा कर बच्चे सो पाते हैं.वाहन व्यवस्था के कारण सुबह ६ बजे घर से निकल कर २बजे तक घर आ पाता है,कहीं traffic कहीं पहले लेने आख़री में घर छोड़ने की समस्या के चलते कई बार इस से भी अधिक देर हो जाती है,भोजन आदि लेते ही थके हारे बच्चे होम वर्क पूरा करने तथा नयी प्रणाली के अनुरूप प्रोजेक्ट आदि पूरा करने में लग जाते हैं,जिसमें अधिक समय माता पिता को ही व्यस्त रहना पड़ता है और यदि उनके पास समयाभाव है या वो असमर्थ हैं तो tutor कि शरण में जा बच्चा२ अतिरिक्त घंटों के लिए व्यस्त हो जाता है. खेलने का समय उसके पास बचता नहीं और अगले दिन इसी रूटीन को सोचता हुआ सो जाता है.
यद्यपि नयी शैक्षिक व्यवस्था के अनुसार बच्चों को बस्ते के बोझ को कम किया गया है परन्तु व्यवहार में स्तिथि जस की तस है.गृह परीक्षाओं को लेकर बच्चों की व्यस्तता और अधिक हो गयी है.
कैसे लोटाया जाये उनका बचपन और कैसे कम किया जाये उनको मशीनी बनने से ,ये एक महत्वपूर्ण प्रश्न है जिस पर विचार अति आवश्यक है.

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