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पर्यावरण संरक्षण सबका दायित्व (पर्यावरण दिवस पर विशेष आग्रह )

Posted On: 3 Jun, 2016 Others में

chandravillaविश्व गुरु बने मेरा भारत

nishamittal

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Save-The-Environment विश्व पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण के संरक्षण के लिए एक निवेदन अपने सभी साथियों व पाठकों से.(पूर्व प्रकाशित लेख )

तन को जला डालने वाली दाहक गर्मी,भीषण ठण्ड, नवम्बर दिसंबर में भी चलते पंखे वो भी उत्तर भारत में, अतिवृष्टि ,बाढ़ों का प्रकोप,पूर्णतया सूखा,आग उगलती धरती ! कभी कभी तो लगता है जो हमने भूगोल पढ़ते समय प्रकृति की देन मनोहारी ऋतुओं ,कलकल करती नदियों, हिमाच्छादित पहाड़ों, हरित वन्य प्रदेशों के विषय में पढ़ा था वो आज पूर्णतया परिवर्तित रूप में हमारे समक्ष है.क्या प्रकृति का चक्र गड़बड़ा गया है?आज वैज्ञानिक , मौसम विज्ञानी सब चकित हैं,नित नवीन आकलन होते हैं,परन्तु प्रत्यक्ष रूप में परिणाम कुछ दूसरे ही रूप में दृष्टिगोचर होता है..यदि नयी पीढी को ये कहा जाय कि अभी कुछ ही समय पूर्व की बात है,कि मसूरी,नैनीताल तथा शिमला आदि पर्वतीय पर्यटन स्थलों पर पंखें,कूलर होते ही नहीं थे,तो क्या वो विश्वास कर सकेंगें.विश्व में किसी स्थल पर सुनामीभूकंप,,कभी जंगलों में लगती आग का भयावह दृश्य,वन्य पशु-पक्षियों की लुप्त होती या घटती प्रजातियाँ,, अनिष्ट की आशंकाएं जो आज पंडितों द्वारा नहीं अपितु आधुनिकतम विज्ञानं वेत्ताओं द्वारा की जा रही हैं.

वर्षा कब और कितनी होगी ,गर्मी कितनी पड़ेगी ,शीत कम रहेगा या अधिक ,कभी घाघ भड्डरी कवि अपने आकलनों से ही बता देते थे,कब क्या बोना चाहिए ,फसल काटने का सही समय आदि.प्रकृति का रूप इतना सरल था कि स्वयं निरक्षर कृषक प्रकृति के रूप को पहचान कर अपना कर्म पूर्ण करता था,और आज मौसम विभाग जहाँ पूर्ण शिक्षित व विषय विशेषज्ञ उपस्थित हैं ,को अपनी गणनाओं तथा अनुमानों पर भरोसा नहीं जाता पाता.मौसम विभाग घोषणा करता है अति वृष्टि की, पता चला मानसून राह में ही अटक गया और वर्षा हुई नहीं.ग्रीष्म ऋतु में गर्मी न हो कर बाद में होती है,अर्थात अनिश्चितता .इस सब परिवर्तन के लिए कोई और नहीं हम ही उत्तरदायी हैं.. carbon-emissions-fuelling-atmosphere_5106-28kn1rs

पर्यावरणविद अध्ययन कर ,अनुसन्धान के रूप में नित नूतन निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं,परन्तु कभी सत्य तो कभी मिथ्या उनके अनुमान, तथ्य निराशाजनक चित्र प्रस्तुत करते हैं.पर्यावरण अर्थात हमारे चंहूँ ओर का आवरण हमारी कृत्यों के कारण हमारे लिए विपदाजनक बन गया है.हमारी ओजोन परत जो हमारी रक्षक है स्वयं उस पर खतरा मंडरा रहा है.

पर्यावरण के सम्बन्ध में यूँ तो चिंता विश्वव्यापी है परन्तु आज हम अपने देश के संदर्भ में विचार करें तो स्थिति बहुत अधिक विस्फोटक दिखाई देती है.कारण हमारी निरंतर बढ़ती जनसँख्या और सीमित साधन.आज जब हम दुनिया में जनसँख्या के दृष्टिकोण से बस चीन से पीछे हैं और अनुमान है कि २०५० तक हमारा देश विश्व में जनसँख्या का दृष्टिकोण से शीर्ष पर होगा. विश्व के क्षेत्रफल का मात्र २.४% और विश्व की जनसँख्या का १८%!………… संसाधनों के मामले में हम आज भी विकासशील हैं.इतनी विशाल जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूर्ण करना बहुत दुष्कर है.परिणामस्वरूप हमारे उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर दवाब बढ़ रहा है पेय जल का अभाव,ऊर्जा की कमी,कंक्रीट के जंगलों में परिणित होते हरे-भरे वन्य प्रदेश,भोज्य पदार्थों की कमी तथा उपलब्ध साधनों का समान वितरण न हो पाने के कारण अव्यवस्थाएं बढ़ती जा रही हैं.हमारी कृषि भूमि बंजर बन रही है,मिटटी की उपजाऊ ऊपरी परत १२ अरब टन मिटटी बह कर नष्ट हो रही है मिटटी का ६०% भाग कटान,लवणता,खनिज(हानिकारक)औरजनसँख्या के अनुपात में पेयजल की उपलब्धता संकट में है. . बढ़ते औद्योगीकरण के दुष्परिणाम भी आज प्रदूषण,ग्लोबल वार्मिंग आदि के रूप में अपने जौहर दिखा रहे हैं. तूफ़ान,चक्रवात,.बाढ़ें,सुनामी ,भूकम्प आदि धन-जन का जो विनाश करते हैं वो सभी पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन का परिणाम है.

.जल.वायु,मिटटी सभी प्रदूषण की गिरफ्त में हैं ध्वनी प्रदूषण के कारण हमारी श्रवण शक्ति प्रभावित हो रही है.श्वास लेने के लिए महानगरों में ऑक्सीजन चेम्बर्स की व्यवस्था विशिष्ठ प्रभावित लोगों के लिए व्यापार का माध्यम बन रही है,पीने के पानी के लिए मध्यम वर्ग तथा उच्च वर्ग घरों में जल शुद्धिकरण यंत्र का प्रबंध करने या मिनरल जल पीने को विवश है और निर्धन वर्ग वही प्रदूषित आर्सेनिक तथा अन्य विषैले पदार्थ मिश्रित जल पी पी कर घातक रोगों की चपेट में है. .गर्मी व प्रदूषण बढाते वाहन अब कष्टदायक लगते हैं.आग उगलती चिमनियाँ श्वास लेना दूभर बना रही हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार .हमारी पवित्र जीवन दायिनी,मोक्षदायिनी गंगा यमुना आज आचमन के व स्नान के योग्य नहीं रह गयी हैं.पर्यावरण के संतुलन के नियंताओं में प्रमुख “हरित वन” कंक्रीट के जंगलों में बदल रहे हैं,बहुमंजिला इमारतें,शोपिंग माल्स उनका स्थान ले रहे हैं.landfill1

पर्यावरण के लिए सर्वाधिक घातक पोलीथिन को आज हमने अपने लिए अपरिहार्य बना लिया है.इस पोलीथिन के कारण नदी नाले अवरुद्ध हो रहे हैं और यही ,पशुधन के लिए प्राणघातक सिद्ध हो रही है.जिस गौमाता को बचाने के लिए हम पुकार कर रहे हैं,उसका जीवन भी इसी पोलिथीन के कारण संकटग्रस्त हो रहा है.धरती की उर्वराशक्ति को भी यही नष्ट कर रही है.

पतितपावनी नदियाँ,सागर सभी को प्रदूषित हम कर रहे हैं.उद्योगों के कारण बड़े छोटे सभी उद्योगों का विषैला उच्छिष्ट ,सीवर पम्प ,दाहसंस्कार के बाद शव भी यही बहाए जा रहे हैं

.जो जल हमारा जीवन है,जिस धरती के बिना हमारा अस्तित्व नहीं है,जो वायु हमारी प्राणदायिनी है,उसका अनुचित दोहन विनाश का दृश्य तैयार कर रहा है और हम हैं कि सो रहे हैं,विपदा अपने विनाशकारी स्वरूप में आती रही है तब जरा हमारी तन्द्रा भंग होती है और हम अपना दोष दूसरों पर डालकर स्वयं को निर्दोष मान लेते हैं. .

सरकारी प्रयास उस सीमा तक नही हो रहे है जितने वांछितहैं.,इन मुद्दों पर सोच-विचार का.योजनायें बनती हैं,कागजों पर बेतहाशा धन पानी की तरह बहाया जाता है,पंचतारा होटलों में मीटिंग्स करते हुए मिनरल वाटर शीतल पेय पीते हुए तथा एयर कंडीशनर्स की हवा खाते हुए.

अब भी समय है,आवश्यकता है,हमारे स्वयं के चेतने की तथा सरकार के सजग होने की.,उचित नीति निर्माण की,और उससे अधिक उन नीतियों के क्रियान्वयन की.प्रयास किये गये हैं यथा दिल्ली में मेट्रो का चलाया जाना,एल पी जी से वाहनों का सचालन आदि.परन्तु भारत केवल दिल्ली में नहीं बसता.और इतने कम प्रयास इतनी भीषण समस्या का समाधान के लिए ऊंट के मुख में जीरे के समान ही हैं .वनों को बचाने के लिए प्रयास सरकारी स्तर पर ही संभव हैं.नदियों में गिरने वाले दूषित पदार्थों को रोकने की व्यवस्था सरकार ही कर सकती है.विशिष्ठ कृषि उत्पादन पद्दतियों को अपना कर उत्पादन की गुणवत्ता तथा मात्रा बढाया जाना जरूरी है.पोलिथींस पर प्रतिबंध लगाया जाना अपरिहार्य बन चुका है.

सरकार द्वारा जनसँख्या वृद्धि को रोकने के लिए सकारात्मक योजना बनाना तथा सभी पूर्वाग्रहों को त्याग कर,वोट राजनीति को छोड़ कर उसको युद्ध स्तर पर लागू करना आवश्यक है.जब तक जनसँख्या वृद्धि पर रोक नहीं लगेगी,संसाधन वृद्धि के सभी प्रयास अपर्याप्त ही सिद्ध होंगें.

सरकारी प्रयासों के साथ स्वयं हमारी जागरूकता बहुत आवश्यक है,यदि हम चाहे तो पोलीथिन के प्रयोग को स्वयं रोक सकते हैं.पेपर बैग या कपडे की थैलियों को साथ रख कर इस समस्या से बचा जा सकता है.ठेले आदि पर बिकने वाले सामानों को पोलिथीन में बेचने से बचाने में हम स्वयं योगदान दे सकते हैं.यदि हम पोलिथीन बेग में सामान नहीं लेंगें तो विक्रेता उसका प्रयोग स्वयं ही बंद कर देगा.

नवीन भवनों के निर्माण के समय पेड़ लगाने की नीति को कठोरता से लागू किया जाना आवश्यक है,.इन पेड़ों के संरक्षण का उत्तरदायित्व समझना भी आवश्यक है.कुछ शहरों में ऐसी व्यवस्था की गई है कि अपना घर बनाते समय   वृक्ष सरकार लगाकर देगी और उनके संरक्षण का दायित्व गृह स्वामी का होगा. ऐसा नियम सभी स्थानों पर कम से कम नए घरों के निर्माण पर कठोरतापूर्वक  लागू  किया जाय तो निश्चय ही धरती हरी भरी हो सकेगी.

बहुमंजिला भवनों के निर्माण के कारण विकास की अंधी दौड़ में  धरती को वृक्ष विहीन बनाने से पूर्व ये अनिवार्य नियम बनाया जाय कि जितने वृक्ष कटेंगें उतने वृक्ष लगाना और उनकी देख रेख का उत्तरदायित्व सम्बन्धित संस्थान का हो.

एक निवेदन और यदि बच्चों के जन्मदिवस आदि पर या विशिष्ठ अवसरों पर बच्चों में वृक्ष लगाने की भावना को जागृत किया जाय साथ ही किसी एक वृक्ष का उत्तरदायित्व यदि एक परिवार ले सके तो निश्चित रूप से पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान होगा.इसी प्रकार किसी की मृत्यु के पश्चात भी उसकी स्मृति में पेड लगाने का निश्चय हम लें और उसकी देख भाल परिवार के सदस्य के रूप में करें.उपहार आदि देने में भी परिस्थिति के अनुसार पेड पौधे उपहार में दे. और इस अभियान से जुड़े रहें  और  उसका परिणाम सामने अवश्य आएगा.स्कूल्स आदि में यद्यपि पर्यावरण को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का कार्य किया गया है.परन्तु स्कूल्स में अध्यापक तथा विद्यार्थी सभी उसको मात्र औपचारिकता समझते हैं.इसी प्रकार खानापूर्ति के लिए कभी कभी माननीयों द्वारा भी वृक्षारोपण किया जाता है,परन्तु शायद कुछ दिन बाद वही पौधा कूड़े में ढूँढने से भी नहीं मिलता.इसी प्रकार “राष्ट्रीय सेवा योजना” आदि के शिविरों में भी वृक्षारोपण कार्यक्रम को कभी कभी सम्मिलित किया जाता है,परन्तु लगाने के बाद उसकी देखभाल का उत्तरदायित्व किसी का नहीं होता.अतः पौधे लगाने के कार्यक्रम में व्यय हुआ धन व्यर्थ हो जाता है.

नीति निर्धारण में हम पीछे नहीं बस आवश्यकता है,उन नीतियों के क्रियान्वयन की.

इसी प्रकार बहुत तीव्र आवाज़ में संगीत आदि नहीं बजायेंगें ऐसा निश्चय हम सभी को लेना हमारे लिए ही फलदाई होगा.अतः आईये हम इस पर्यावरण दिवस पर हम सभी शपथ लें पर्यावरण के संरक्षण की.शपथ कागजी नहीं वास्तविक रूप में.अपने स्तर पर पोलिथीन के प्रयोग को बंद करने व करवाने की,वृक्षों की देखभाल की,तथा ध्वनी प्रदूषण से बचने की.यदि यह निश्चय कर हम उसका पालन कर सकें तो स्वयं को तथा आगे आनेवाली पीढ़ियों को जीवन प्रदान करने में सक्षम होंगें.

दिए गए आंकडें व चित्र नेट से साभार.

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