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मौत के मुहाने पर विश्व .... हिरोशिमा दिवस 6 अगस्त पर विशेष

Posted On: 4 Aug, 2014 Others में

chandravillaविश्व गुरु बने मेरा भारत

nishamittal

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निर्दोष  मृत नागरिकों के प्रति श्रद्धांजली हिरोशिमा और नागासाकी दिवस पर(6 अगस्त और 9 अगस्त को)

6 अगस्त और   9 अगस्त विश्व के इतिहास में सर्वाधिक काले दिनों में से हैं, इन दो दिनों में  ऐसी भयंकर और विनाशकारी खूनी होली   खेली गयी , जिसके छींटों से आज भी मानवता रक्त रंजित है..इस  कलंक से स्वयम को सभ्य मानने वाली मानवता कभी  मुक्त नहीं हो सकती ,द्वितीय विश्व युद्ध का अंतिम चरण तो  यही    घटना   बनी,  जब अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी नामक दोनों नगरों को ( 6 अगस्त और   9 अगस्त  1945  ) को परमाणु बम गिराकर ध्वस्त करते हुए  लाशों का नगर बना दिया. द्वितीय विश्व युद्ध 1939  से 1945  तक चलने वाला विश्व-स्तरीय युद्ध था.लगभग 70  देशों की थल-जल-वायु सेनाएँ इस युद्ध में सम्मिलित  थीं.- मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र. विश्व दो भागों मे बँटा हुआ था.  इस युद्ध के समय..-   सामूहिक पूर्ण युद्ध का स्वरूप  प्रचलन में आया क्योंकि इस युद्ध में भाग लेने वाली  समस्त  महाशक्तियों ने अपनी आर्थिक, औद्योगिक तथा वैज्ञानिक क्षमता इस महायुद्ध में  झोंक दी थी. इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के लगभग 10  करोड़ सैनिकों ने भाग  लिया,  यह मानव इतिहास का सर्वाधिक विनाशकारी और    घातक युद्ध था.

युद्ध का प्रारम्भ जर्मनी द्वरा पोलेंड पर आक्रमण से हुआ  और अंत  हुआ अमेरिका द्वारा  प्रलयंकारी विभीषिका के साथ हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने और  जापान को घुटने टेकने के लिये विवश करने के बाद . जापान के 14 अगस्त को  पराजय स्वीकार की.यद्यपि युद्ध का अंतिम चरण तो  जर्मनी की पराजय के  साथ मई में प्रारम्भ हो गया था,परन्तु पूर्ण विराम जापान के पराजय स्वीकार करने के साथ अगस्त में  हुआ.

सत्ता,सामर्थ्य, साधन सम्पन्नता,अहंकार और  महत्वाकांक्षा के अतिरेक का चरम कितना घातक हो सकता है,इसका ज्वलंत उदाहरण है मित्र राष्ट्रों में प्रमुख अमेरिका और पीड़ित  हिरोशिमा -नागासाकी ,(जापान के दो प्रमुख नगर.)हिरोशिमा दुनिया का पहला ऎसा शहर है जो  महाशक्तियों की महत्वाकांक्षा का शिकार बना . अमेरिका ने  6 अगस्त 1945 को यहाँ  यूरेनियम बम लिटिल बाय गिराया था और इसके तीन दिन बाद ही  अर्थात  9 अगस्त को नागासाकी पर फैटमेन परमाणु बम गिराया गया. इस बमबारी के बाद  हिरोशिमा में लगभग 1 लाख 40 हजार और नागासाकी में  लगभग 74 हजार  लोग हताहत हुए थे. . जापान परमाणु हमले की त्रसदी झेलने वाला दुनिया का  पहला और अकेला देश है. यह परमाणु प्रहार  मानवता के नाम पर सबसे बड़ा कलंक है .

इस घोर विनाश के परिणामस्वरूप हुई क्षति का  तो आज तक  भी अनुमान नहीं लगाया जा सका है. बम को जिस  अमेरिकी  जहाज बी-29  इनोला द्वारा  गिराया गया था .,उस जहाज के चालक दल ने बताया था  कि धुंए का बड़ा सा गुबार और आग के दहकते  गोले ऊपर की तरफ उठे थे.हिरोशिमा पर गिराए गए इस बम ने द्वितीय  विश्व युद्ध का  सम्पूर्ण नक्शा ही बदल दिया था. लिटिल बम  के गिराए जाने के बाद 13 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र  में पूरी तरह उजड़ गया था ओर शहर में मौजूद 60 प्रतिशत भवन तबाह हो गए थे. शहर की साढ़े तीन लाख जनसंख्या  में से एक लाख चालीस हजार लोग मारे गए थे, बड़ी संख्या  में लोग  विकिरण के कारण मौत का शिकार हुए. अमेरिका की खून की प्यास यहीं शांत नहीं हुई और  तीन दिनों के बाद अमरीका ने जापान के दूसरे शहर नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया जिसमें 74 हजार लोग मारे गए थे. जापान ने 14 अगस्त, 1945 को हथियार डाल दिए थे. इस परमाणु हमले ने इंसानी बर्बरता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे , बच्चों और औरतों की हजारों लाशें, शहरों की बर्बादी ने मानवता को कलंकित  कर दिया था . वास्तव में इस बर्बरता को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है.

निम्न चित्रों में जापान का विनाश और आज तक भी विकिरण प्रभावित

hiroshima2hiroshima8 आज इस त्रासदी   को  घटित हुए 69 वर्ष हो गए हैं लेकिन जापान का ये हिस्सा आज भी उस हमले से प्रभावित है। आज भी यहाँ पर उत्पन्न हो रही संतानों पर इस हमले का दुष्प्रभाव  साफ देखा जा सकता है.

यथार्थ तो यह है कि  इस परमाणु आक्रमण के पीछे अमेरिका का उद्देश्य विश्व में स्वयम  को सर्वोपरि  सिद्ध करते हुए अपनी चौधराहट स्थापित करनी थी.  इस परमाणु हमले से छह महीने पहले तक अमेरिका ने जापान के 67 शहरों पर भारी भीषण बमबारी की थी. उसी  समय जापान का पलड़ा कमजोर पड़ने लगा था,और  जापान की हार निश्चित हो गयी थी लेकिन फिर भी अमेरिका ने जानबूझकर परमाणु बम का  प्रयोग  किया ,जबकि इस परमाणु बमबारी का कोई सैन्य महत्व नहीं था. इन  दोनों ही शहरों में युद्ध सामग्री  बनाने वाले कारखाने  नहीं थे और  न ही वहाँ कोई बड़ा सैन्य जमाव था.  अमरीका रूस को यह दिखाना चाहता था कि युद्ध के बाद दुनिया के भाग्य का निर्णायक  वही  बनेगा  और इसके लिए उसने लाखों जापानी नागरिकों के जीवन की बलि ले ली.

दुर्भाग्य तो यह है कि इतने बड़े विनाश के बाद भी कोई शिक्षा नहीं ली गयी और आज भी विश्व के छोटे -बड़े देश अपनी भूखी नंगी  जनता की आवश्यकताओं  की कीमत पर परमाणु अस्त्रों के संग्रह में लगे हैं. जब इस  बम का प्रयोग किया गया था तो इसकी क्षमता मात्र 12से 15 किलोटन थी और अब उससे कई गुना प्रभावशाली हैं ये बम जिनकी क्षमता 50 से 100 किलोटन है,साथ ही आधुनिकतम तकनीक ,सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस बार यदि घटना की पुरावृत्ति हुई तो क्या परिणाम होगा. और वो दुष्परिणाम   बस रिमोट के एक बटन पर या कम्प्यूटर के एक संकेत की दूरी पर है.

recttt(आंकडें गूगल से साभार )

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