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यदि मेरे पास भगवान का मोबाईल नम्बर हो तो ...............

Posted On: 29 Oct, 2011 Others में

chandravillaविश्व गुरु बने मेरा भारत

nishamittal

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ये  आलेख मैं अपने अभी कुछ दिन पूर्व प्रकाशित लेख “मंदबुद्धि बच्चे( विधि की विडम्बना”) के संदर्भ में मिले एक बहुत ही दुखद व्यक्तिगत पत्र के उत्तर में लिख रही हूँ .

परिवार में शिशु जन्म की प्रतीक्षा व्यग्रता से हो रही थी ,अंततः वो घड़ी आ गयी और नवजात शिशु ऩे जन्म लिया,परन्तु घर आँगनमें खुशी की झलक भी नहीं दिख सकी, क्योंकि बच्चे के शरीर में कुछ ऐसी गंभीर शारीरिक विकृतियाँ थीं जिनके कारण वो चिकित्सकों के अनुसार कभी सामान्य जीवन व्यतीत करने योग्य नहीं हो सकता था.अतः सबके चेहरों पर एक विषाद की छाया ही दृष्टिगोचर हो रही थी,पता न होने पर यदि कोई अन्य व्यक्ति पुत्र जन्म की बधाई भी दे रहा था तो भी बुझे मन से ही परिवार वाले धन्यवाद दे पाते.ऐसे एक दो नहीं अनेकों प्राणियों से हमारी संसार में भेंट होती रहती है जिनके लिए प्राय आमजन यही कहते सुनायी देते हैं,कि इसने या इसके माता-पिता ऩे कुछ ऐसे दुष्कर्म किये होंगें जिनका परिणाम भुगतना पड़ रहा है.
ऐसे समस्त संवाद सुनकर एक प्रश्न क्रौंधता है कि जन्म लेता बच्चा कैसे कोई दुष्कर्म कर सकता है,और उसके माता-पिता ने यदि कुछ पाप या अनुचित कर्म किया भी है जिसकी सजा प्रभु उनको देता, तो सजा उस नादान को क्यों? निस्संदेह संतान की ऐसी विकृतियाँ माता-पिता के लिए किसी सजा से भी बढ़कर हैं परन्तु स्वयं वह शिशु इन दुश्वारियों या बोझ स्वरूप जीवन के कष्टों को आजीवन कैसे सहे.
इसी प्रकार एक वाक्य हम प्राय सुनते है पूर्वजन्म के कर्मों का दंड भुगत रहा है अमुक व्यक्ति.अपने आसपास,अपने परिचितों या मित्रमंडली में हम बहुत से ऐसे व्यक्तियों से मिलते हैं,जो एक से बढ़कर एक पापकर्मों में लिप्त हैं,चोरी,भ्रष्टाचार ,अनैतिक कार्यों और इन सबसे बढ़कर न जाने कौन कौन से पापकर्म ……………..और फिर भी वो चैन की वंशी बजा रहे हैं.और इसी प्रकार न जाने कितने दुखियारे ऐसे भी हैं जो असत्यवादन भी नहीं करते ,किसी का दिल भी दुखाना नहीं चाहते परन्तु उनपर दुखों का पहाड़ टूटता रहता है ,और फिर भी ईश्वर में उनकी आस्था कम नहीं होती तो फिर ऐसा अन्याय क्यों होता है?
अपनी इस समस्या मैंने बहुत से लोगों से विचार विमर्श किया तो उन्होंने मुझको समाधान सत्कर्म और भाग्य बताया और अग्रलिखित कथा सुनायी
दो भाई थे विपरीत स्वभाव युक्त.एक ने सदाचार को ही अपना धर्म मान लिया था और परोपकार आदि कार्यों में लीन रहता था .इसके सर्वथा विपरीत दूसरा भाई पूर्णतया दुराचारी था कोइ भी पापकर्म उसकी पहुँच से दूर नहीं था.परन्तु विधि का विधान सदाचारी बेचारा भोजन को भी तरसता था अन्य सुख की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती थी,उसके लिए,जबकि दुराचारी वैभवशाली था और कोई भी कष्ट उसको नहीं था.दुराचारी अपने भाई को सदा पाठ पढता कि वह अपनी संतई छोड़ दे और ऐश की जिंदगी जिए,परन्तु उसने अपना मार्ग नहीं छोड़ा.एक दिन दोनों साथ साथ जा रहे थे ,अचानक ही सदाचारी को ठोकर लगी और वह गिर पड़ा और उसके चोट लग गई ,उधर दुराचारी को ठोकर लगी तो उसका पैर एक थैली से टकराया जिसमें कुछ धन था.दुराचारी भाई ने फिर अपने भाई का मजाक उडाया और कहा पुनः अपने विचार बदलने का उपदेश दिया.प्रकट में सदाचारी ने कुछ नहीं कहा परन्तु उसके मन में ये घटना गहन प्रभाव छोड़ गई.वह अपने ज्ञानी मार्गदर्शक गुरु के पास पहुंचा और अपना सारा दुःख उनके समक्ष .व्यक्त किया.गुरु ने समझाया कि तुम्हारे पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण आज तुमको प्राणदंड मिलने वाला था जो तुम्हारे वर्तमान श्रेष्ठ कर्मों के कारण चोट तक सीमित रह गया और तुम्हारे भाई के पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार उसका सम्राट बनने का योग था जो उसके वर्तमान कर्मों के कारण मात्र चंद सिक्कों तक सीमित रह गया. साथ ही कहा कि अब तुम्हारे दुखों का अंतिम चरण समाप्त हो गया है,अतः अब तुम सुखपूर्वक रह सकोगे.
ये कथाएं हमको सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होने का उपदेश देती हैं,सन्मार्ग पर चलकर ही व्यक्ति अपने मानवजीवन को सार्थक बना सकता है.
‘ यदि ईश्वर के सेलफोन का नम्बर मुझको मिल पाता तो मैं उनसे ये निवेदन अवश्य करती कि संसार की व्यवस्था को सुचारू बनाये रखने हेतु निन्दित कर्मों का फल व्यक्ति को उसी जन्म में दें और सद्कर्मों का फल भी ,तभी तो व्यक्ति सद्कार्यों की ओर प्रेरित हो सकेगा.अन्यथा पाप,अनाचार और भ्रष्टाचार कभी कम नहीं होगा और धीरे धीरे कलियुग क्या कल कलि कलि कलि…………………….युग का ही प्रभाव बढता रहेगा. साथ ही मेरा एक निवेदन ये भी है कि जिस बच्चे को पृथ्वी आना है उसके जीवन को नर्क न बनाएँ कम से कम ऐसा अत्याचार उस पर न करें जन्म लेते ही ऐसे दंड क्यों ?

और हाँ भ्रष्टाचार उन्मूलन का यही रामवाण उपाय हो सकता है कि साथ साथ दंड मिले ऐसा दंड जिससे आत्मा भी काँप जाय तो भ्रष्टाचार तो कुछ पल भी नहीं रह पायेगा आज सर्वत्र अव्यवस्था,दुराचार ,हाहा कार मचा है,अतः हे प्रभु आप अपना सारा लेखा जोखा किसी सुपर कंप्यूटर के हवाले कर दें जिससे भारतीय न्यायिक व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप के सर्वथा विपरीत व्यक्ति को उसके कर्मों का परिणाम अविलम्ब मिल सके..यदि आपका भगवन से कोई लिंक हो बतो या तो स्वयं उनतक मेरी नहीं आम आदमी की विनती पहुंचा दें या फिर उनका नम्बर मुझको दे दें.

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